अयोध्या विवाद : भारतीय वकालत के पितामह ‘के पराशरण‘ ने लड़ी 90 की उम्र में अहम लड़ाई

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नई दिल्ली। अयोध्या मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का देशभर को इंतजार है। गौरतलब है कि इस पूरे मामले में पांच जजों संवैधानिक पीठ ने 40 दिनों तक रोजाना सुनवाई की थी और फैसला सुरक्षित रख लिया गया था। वहीं इस सुनवाई के दौरान जिस शख्स ने अपनी ओर ध्यान केन्द्रीत किया था। वे थे रामलला विराजमान के वकील के पराशरण, जो 90 वर्ष की आयु में भी घंटांे खड़े रहकर कोर्ट में अपनी दलीलें दे रहे थे और हिन्दुत्व की लड़ाई लड़ रहे थे।

कौन है के पराशरण

के पराशरण तमिलनाडु के अधिवक्ता जनरल रहे हैं। उन्हें हिंदुत्व का ज्ञाता माना जाता है। उनके पिता वेदों के विद्वान थे। पराशरण को धार्मिक पुस्तकों का भी गहन ज्ञान है। वह अदालत में बहस के दौरान भी उनका जिक्र करते रहते हैं। वह इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में ही भारत के अटॉर्नी जनरल रहे हैं। हालांकि उन्होंने 2016 के बाद अदालती कार्यवाहियों में जाना कम कर दिया था और चुनिंदा मामलों में ही कोर्ट जाते हैं।

के पराशरण ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को एंट्री नहीं दिए जाने को लेकर भी वकालत की थी। जिस पर उन्हांेने अदालत में मजबूत दलीलें रखी थी। रामसेतु मामले में भी दोनों ही पक्षों ने अपनी तरफ करने के लिए कई हथकंडे आजमाए थे, लेकिन हिंदुत्व को लेकर संजीदा रहे पराशरण ने रामसेतु के खिलाफ पैरवी करने से इनकार कर दिया था। उन्होंने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट से रामसेतु को बचाने के लिए किया था। उन्होंने अदालत में कहा है कि मैं अपने श्रीराम के लिए इतना तो कर ही सकता हूं।

2012 से लेकर 2018 तक राज्यसभा सांसद रहे पराशरण 70 के दशक के दौरान से ही अधिकतर वकीलों के पसंददीता वकील रहे हैं। अयोध्या मामले पर रोजाना सुनवाई का मुस्लिम पक्षकरों के वकील राजीव धवन ने विरोध किया था। हालांकि कोर्ट ने उनकी इस मांग को ठुकरा दिया था, लेकिन पराशरण का कहना था कि यह मेरी अंतिम इच्छा है कि मरने से पहले मैं इस मामले को अंजाम तक पहुंचा दूं। मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजय किशन कॉल के शब्दों में ‘पराशरण भारतीय वकालत के पितामह हैं, जिन्होंने बिना धर्म से समझौता किए भारतीयों के लिए इतना बड़ा योगदान दिया।‘

अपने इस बयान ने सुर्खियों में आए थे पराशरण

अयोध्या विवाद पर चल रही सुनवाई के दौरान पराशरण कोर्ट में दिए गए एक बयान के बाद भी सुर्खियों में आ गए थे। दरअसल, सुनवाई के दौरान सीजेआई रंजन गोगोई ने पराशरण से पूछा था कि ‘क्या आप बैठ कर दलीलें पेश करना चाहेंगे?‘ लेकिन, उन्होने कहा कि ‘मिलॉर्ड आप बहुत दयावान हैं, लेकिन वकीलों की परंपरा रही है कि वे सुनवाई के दौरान खड़े होकर दलीलें पेश करते रहे हैं और मैं इस परम्परा से लगाव रखता हूं।‘ पराशरण और सीजेआइ्र के बीच हुआ ये कन्वर्सेशन कोर्ट के इतिहास में एक रोचक और अच्छी याद बन कर दर्ज हो गया।