अयोध्या के अपराध

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एन के त्रिपाठी

9 नवम्बर के ऐतिहासिक निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने डेढ़ सौ वर्ष पुराने अयोध्या विवाद का निपटारा कर दिया।हिंदुओं को उनके द्वारा दावा की गई राम लला मंदिर के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा विवादित भूमि दे दी गई और इसके लिए भारत सरकार को एक न्यास बनाने के लिए दिशा निर्देश दिया । मुस्लिम पक्ष को विवादित भूमि से अतिरिक्त अयोध्या में किसी प्रमुख स्थल पर पाँच एकड़ भूमि नई मस्जिद बनाने के लिए धारा 142 में दिये गये विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए दे दी।भविष्य के भव्य राम मंदिर निर्माण के संबंध में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बहुत विस्तार से समय दिया गया है। मुस्लिम पक्ष द्वारा 5 एकड़ भूमि स्वीकार करने अथवा न करने के ऊपर भी अनेक वाद विवाद हुए।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में जिस बात को सुनकर अनसुना कर दिया गया है वह यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने 1949 एवं 1992 की घटनाओं को आपराधिक कृत्य बताया है। 1949 में अचानक एक रात मस्जिद की केन्द्रीय गुम्बज में रामलीला की मूर्ती रख दी गई जिसे न्यायालय ने ( desecration का ) आपराधिक कृत्य बताया है। यह मामला इतना पुराना है कि इसमें अब कुछ भी नहीं किया जा सकता है। दूसरा 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की घटना को भी स्पष्ट रूप से अपराध की श्रेणी में रखा है तथा इस पर शीघ्र न्याय करने का निर्देश दिया है। आइए देखते हैं इस पर क्या कार्रवाई हो रही है। 1993 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने पर आपराधिक प्रकरण पंजीबद्ध किया गया। वर्षों प्रकरण चलने के बाद ट्रायल कोर्ट ने सभी अभियुक्तों के ख़िलाफ़ आरोप समाप्त कर दिये।

इसकी अपील करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को सही मानते हुए सभी अभियुक्तों के ख़िलाफ़ आरोप समाप्त रखे।इसकी अपील होने पर 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में हाई कोर्ट के आदेश को पलटते हुए ट्रायल न्यायालय में आरोपों पर सुनवाई कर त्वरित फ़ैसला देने के लिए निर्देश दिया । इसके लिए उन्होंने लखनऊ में एक विशेष ट्रायल कोर्ट का निर्माण भी कर दिया।सुप्रीम कोर्ट इस अपराध के इतने दिनों तक लंबित होने पर चिंतित था तथा इसके शीघ्र निराकरण के लिए उसने यह विशेष व्यवस्था की। उल्लेखनीय है कि इस अपराध में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी एवं उमा भारती भी अभियुक्त हैं। प्रकरण में अभी भी ट्रायल जारी है। कुल 21 अभियुक्तों में से अशोक सिंघल सहित आठ अभियुक्तों की मृत्यु हो चुकी है और वर्तमान अभियुक्त भी वयोवृद्ध हो चले हैं। ट्रायलकोर्ट के उपरांत हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील का मार्ग भी खुला हुआ है।क्या अभियुक्तों के जीवन काल में इस आपराधिक प्रकरण का अंतिम निराकरण होना संभव है?

भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत में विधि का शासन ( rule of law) है। परंतु न्याय की अत्यंत सुस्त कछुआ चाल कुछ लोगों के लिए कितनी लाभप्रद हो सकती है !!

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