विधानसभा एक अब नहीं रहा भाजपा का अभेद्य किला, 15 महीने में धुआंधार बैटिंग की तैयारी में संजय शुक्ला

विधानसभा एक जिसको भाजपा का अभेध किला कहा जाता है 2003 में उषा ठाकुर 27 हजार वोटो से चुनाव जीती 2008 में सुदर्शन गुप्ता 8 हजार वोटो से जीते 2013 में यही सुदर्शन गुप्ता 55 हजार वोटों से चुनाव जीते और फिर जब अगला चुनाव 2018 में आया

sanjay shukla

विधानसभा एक जिसको भाजपा का अभेध किला कहा जाता है 2003 में उषा ठाकुर 27 हजार वोटो से चुनाव जीती 2008 में सुदर्शन गुप्ता 8 हजार वोटो से जीते 2013 में यही सुदर्शन गुप्ता 55 हजार वोटों से चुनाव जीते और फिर जब अगला चुनाव 2018 में आया और संजय शुक्ला ने 8 हजार वोटों से सुदर्शन गुप्ता को चुनाव हरा दिया तब सुदर्शन की इस हार के बाद भाजपा के नेता और कार्यकर्ताओं द्वारा कहा जाने लगा कि विधानसभा एक मे सुदर्शन गुप्ता चुनाव हारे भाजपा नही हारी है।

ये बात तब सही साबित भी हो गयी जब ठीक 6 माह बाद लोकसभा चुनाव हुए तब विधानसभा एक से शंकर लालवानी एक लाख 10 हजार वोटो से चुनाव जीते और संजय शुक्ला भी ये बात समझ चुके थे कि अगला चुनाव बड़ा कठिन होगा और एक लाख 10 हजार की लोकसभा हार पर उन्होंने मंथन किया और फिर शुक्ला ने अपनी सक्रियता और तेज़ कर दी भोजन भंडारे धार्मिक अयोध्या यात्रा विकाश कार्य करवाना रुद्राभिषेक बोरिंगों की सौगात हर घर मौत मय्यत पर जाना और उनकी आर्थिक मदद करना पूरी विधानसभा में जन्मदिन मनाना हर सुख दुख में अपनी विधानसभा वालो के साथ खड़ा होना कन्या विवाह में आर्थिक मदद के अलावा हर क्षेत्र में शुक्ला की सक्रियता बढ़ने लगी।

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कोरोना काल मे जो काम शुक्ला ने किया उसने पूरे प्रदेश में शुक्ला को एक नई पहचान दिला दी ,इसके बाद जब संजय शुक्ला को कांग्रेस ने महापौर घोषित किया उस समय शुक्ला को उनकी टीम के कई लोगो ने चुनाव लड़ने से साफ मना कर दिया तब शुक्ला ने अपने समर्थकों से कहा कि ये चुनाव बड़ा कठिन है मुझे भी पता है लेकिन पार्टी को इस समय मेरी आवश्यकता है ओर फिर मुझे मेरी विधानसभा का आंकलन भी करना है कि 2019 में एक लाख दस हजार वोटो की हार को अभी तक मैंने कितना कवर किया है।

शुक्ला चुनाव लड़े और 20 हजार वोटों से अपनी विधानसभा हार गए भाजपा बड़ी खुश हो रही कि हमने शुक्ला को उनकी विधानसभा में हरा दिया जबकि सिक्के का दूसरा पहलू भाजपा नही देख पा रही कि शुक्ला ने 3 साल में एक लाख दस हजार वोटो की लीड को 20 हजार पर ला दिया है और अभी भी विधानसभा चुनाव में 15 महीने बाकी है और शुक्ला के लिए 15 माह में 20 हजार की भाजपा की लीड को खत्म करना बड़ी बात नही है क्योंकि पूरे महापौर चुनाव में शुक्ला ने अपनी विधानसभा में बिल्कुल ध्यान नही दिया सिर्फ तीन दिन जनसंपर्क किया जबकि उन्होंने हर विधानसभा में प्रभारी बनाये थे लेकिन एक नंबर में किसी को प्रभारी नही बनाया।

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कोई मीटिंग नही की सिर्फ पार्षदों प्रत्याशियों के भरोसे पूरी विधानसभा छोड़ दी थी इसलिए भाजपा और सुदर्शन गुप्ता ये ना सोचे कि शुक्ला अपनी विधानसभा में कमजोर हुए है बल्कि ये सोचे कि शुक्ला को 2023 के फाइनल मैच जीतने के लिए 15 माह का टारगेट मिल चुका है। और महापौर चुनाव हारने के तीसरे दिन ही शुक्ला अपनी विधानसभा के लोगो को जिस तरह अयोध्या और काशी लेकर निकल गए उन्होंने अपने इरादे ज़ाहिर कर दिए है कि पूरे 15 माह संजय शुक्ला धुंहाधार बेटिंग करेगे।