अष्टविनायक: महड मे जल रहा है 127 वर्षों से अखंड दीप

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Varad_Vinayak

Ashtavinayak: a lamp is continuous burning in Mahad since 127 years.

अष्टविनायक यात्रा में श्री वरद विनायक जी के दर्शन महड में होते है. महड यानि मढ़ ।मनोवांछित वर देने वाले वरद विनायक जी के मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ पर सन 1892 से एक नंदादीप अखंडित रुप से जल रहा है।  पहाड़ों के बिच बसा हुआ महड एक अत्यंत सुन्दर और रमणीय स्थान है। यहाँ पहुँचने के लिए मुंबई पनवेल खापोली मार्ग पर आना होता है। मुंबई से यहा की दूरी 83 किलोमीटर की है।

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महड में विराजीत श्री वरद विनायक जी की मूर्ति को स्वयंभू कहा जाता है और ऐसी कथा है कि 1690 में श्री घोडू पौडकर जी को यह मूर्ति एक तालाब मे मिली थी। इसके बाद 1725 में वर्तमान मंदिर की नींव रखी गई।  तत्कालीन पेशवा के सुभेदार श्री रामजी महादेव बिवलकर जि ने यह पूरा क्षेत्र देवस्थान को खर्चे के लिए दे दिया। श्री वरद विनायाक जी के मंदिर मे गणेश उत्सव के दौरान विनायक जी को नारियल का प्रसाद भेंट कर संतान प्राप्ति के इच्छुक लोगों की भीड़ लगी रहती है और ऐसी मान्यता है कि यहां संतान प्राप्ति कीछह से आने वाले श्रद्धालु निराश नहीं लौटते। वरद विनायक जी के इस मंदिर की एक और विशेषता यह है कि यहा पर कोइ भी व्यक्ति उनकी मूर्ति की पूजा कर सकता है। सच्ची श्रद्धा से विनायक जी पूजा करने पर साक्षात् दर्शन करने का अनुभव भी अनेक भक्तो ने प्राप्त किया है।

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वरद विनायकजी का मंदिर पूर्वी दिशा में स्थित है और मूर्ति भी पूर्वी दिशा मे ही है लेकिन उनकी सूंड बायीं दिशा मे आसनस्थ है। उनके आसपास रिद्धि और सिद्धि विराजमान है।  यहाँ के देवस्थान ट्रस्ट ने भक्तों के लिए एक अनूठी योजना प्रस्तुत की है इसमे जो भी भक्त संस्थान को 31 हजार का स्थायी दान देगा उसे वर्ष मे एक बार स्वयं वरद विनायक जी की पूजा अर्चना करने का अवसर दिया जाएगा।

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महड के इस अत्यंत प्राचीन मंदिर को लेकर एक प्राचीन कथा का उल्लेख हमें शास्त्रों में मिलता है। विदर्भ देश में कौन्डिल्य नगर के भीम राजा को श्री गणेश जी के एकाक्षर मंत्र से एक पुत्र की प्राप्ति हुई  इसका नाम रुक्मागंद रखा गया। बाद मे रुक्मागंद एक दिन आखेट के लिए वन में गया तो वहा उसे प्यास लगने पर वह वाचक्वनि ऋषि के आश्रम मे चला गया। यहाँ ऋषि पत्नी ने उसे पानी पिलाने के साथ एक अजीब सी मांग भी कर दी। रुक्मागंद ने उनकी इस मांग को पूरा करने में असमर्थता व्यक्त की तब ऋषि पत्नी ने उन्हें कोड़ी होने का श्राप दे दिया। शापग्रस्त रुक्मागंद ने अपनी पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए देवर्षि नारद से सहायता मांगी तब नारदजी ने उसे कदंब नगरी में चिंतामणी जी का वरदान प्राप्त हो गया।

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एक अन्य कथा के अनुसार गुत्समव नामक एक बालक ने बरसों तक गजानन जी की तपस्या की। उसकी इस तपस्या से प्रसन्न होकर गजानन जी ने उससे वर माँगने के लिए कहा तब गुत्समव ने कहा की वे उसे ऐसा वरदान दे जिससे उसे न केवल ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हो बल्कि यहाँ क्षेत्र मे अत्यंत सिद्ध बन जाए। गणेश जी उसकी प्रार्थना स्वीकारते हुए कहा की वे अब इसी स्थान पर वास करेंगे।  उनके इस वरदान के बाद गुत्समव की ने गणेश जी की मूर्ति की स्थापना करके उनका नाम वरद विनायक रखा। तब से ही महड का मंदिर श्री वरदविनायक जी के स्थान के रुप में देश विदेश में प्रसिद्द हो गया।

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