महंगी कारों का बेड़ा और चुनाव का बखेड़ा

0
vivek krishna tankha

सियासत का चस्का जिसे भी लग जाए, उससे दूर होना जरा मुश्किल ही होता है। ऐसा ही मामला मध्यप्रदेश के महाधिवक्ता रह चुके सुप्रीम कोर्ट के चुनिंदा वकीलों में शुमार विवेक कृष्ण तन्खा का है। उनका मन भी सियासत में रम सा गया है। इसी कारण खासी प्रैक्टिस में से समय निकालकर सियासत में समय खपाने लगे हैं। पांच साल पहले जबलपुर से लोकसभा का चुनाव ही लड़ डाला। सफलता तो नहीं मिली, लेकिन राजनीति हमेशा के लिए व्यिक्तत्व पर चस्पा हो गई।

उसके दो साल बाद ही कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा में पहुंच गए, यानी सांसद तो बन ही गए। फिर भी चाहत मैदानी राजनीति की बनी रही, लिहाजा जबलपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। उनका मुकाबला राकेश सिंह से ही है, जिनसे पिछली बार हारे थे। इस दौरान सिंह भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी बन चुके हैं, यानी पहले से ज्यादा मजबूत है। वैसे बतौर बुद्धिजीवी तन्खा के अपने लटके-झटके हैं। उन्होंने केंद्रीय आयुध निर्माणी, गन कैरेज फैक्टरी जैसे सैन्य संस्थानों की नगरी जबलपुर के विकास के लिए अपना विजन पेश किया है।

जबलपुर में चूंकि मध्यप्रदेश की हाई कोर्ट की मुख्य पीठ भी है, लिहाजा काले कोट वालों यानी वकीलों का माहौल भी उनके पक्ष में है। उनके चर्चा में रहने का एक और कारण उनकी दौलत है, जिसमें बेशकीमती कारों का बेड़ा प्रमुख है। इस बेड़े में होंडा सिटी, होंडा एकॉर्ड, मर्सिडीज बैंज, पजेरो, मित्सुबिशी और ऑडी जैसे सारे विश्व स्तरीय ब्रांड शुमार है।

इसके अलावा जबलपुर के करीब गोटेगांव में खेती की जमीन के साथ जबलपुर से लेकर मुंबई, दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के गुरुग्राम में निजी बंगले भी हैं। सवा दो किलो सोने व पांच किलो चांदी के मालिक तन्खा की कुल संपत्ति उनके हलफनामे के मुताबिक ही पचास करोड़ के आसपास ठहरती है। उनकी पत्नी आरती और बेटा वरुण भी करोड़पति ही हैं।

बतौर वकील बुद्धि की दौलत और दुनियादारी में अर्जित यह अकूत दौलत जो राजा-महाराजा यानी ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्वजयसिंह से भी कहीं ज्यादा है, उन्हें चुनाव में कितनी सफलता दिला पाती है, इसके लिए तो मई का इंतजार करना ही होगा। इतना जरूर है कि इस बार वे मंझे हुए राजनेता की तरह चुनाव अभियान का संचालन कर रहे हैं। बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत का आत्मविश्वास भी इसमें कई गुना वृद्धि कर रहा है।