एक अनुष्ठान, जो आंदोलन बन गया

पिछले सप्ताह तीन दिन देश की हिंदी पत्रकारिता के बड़े घराने इंदौर में बीते। इस घराने से शानदार संपादक निकले। राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, शरद जोशी और माणक चंद वाजपेयी जैसी विभूतियों के इस शहर में अनेक वर्षों से यह सालाना जलसा हो रहा है।

राजेश बादल

पिछले सप्ताह तीन दिन देश की हिंदी पत्रकारिता के बड़े घराने इंदौर में बीते। इस घराने से शानदार संपादक निकले। राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, शरद जोशी और माणक चंद वाजपेयी जैसी विभूतियों के इस शहर में अनेक वर्षों से यह सालाना जलसा हो रहा है। इसमें तीन दिन तक देश के तमाम राज्यों से पत्रकार, संपादक , मीडिया शिक्षाविद ,साहित्यकार और पत्रकारिता की विभिन्न विधाओं से जुड़े जानकार शिरकत करते हैं। सत्रों में गंभीर चर्चा और चिंतन होता है और पत्रकारिता के सरोकारों की हिफाज़त करने का संकल्प लिया जाता है। इस तरह राष्ट्रीय स्तर पर नियमित रूप से होने वाला संभवतया यह अकेला जलसा है।

मेरा अनुभव है कि दिल्ली में कोई कार्यक्रम हो तो आयोजक उसे अखिल भारतीय स्तर का मान लेते हैं।उसे प्रचारित भी करते हैं। चाहे भागीदारी करने वाले सौ पचास लोग ही हों, उसे कामयाब बता दिया जाता है। प्रदेशों में उससे कई गुना बड़े कार्यक्रम होते हैं, फिर भी उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान नहीं मिलती। ऐसे में पेशेवर न्याय नहीं हो पाता। पैसा भी बरबाद होता है। बहरहाल, स्टेट प्रेस क्लब, मप्र के बैनर तले इंदौर के रवीन्द्र नाट्य गृह में हुए इस भव्य आयोजन में इस बार भी जम्मू – कश्मीर , दिल्ली ,छत्तीसगढ़ ,राजस्थान ,तमिलनाडु ,झारखण्ड ,गुजरात, महाराष्ट्र ,केरल , उत्तर प्रदेश और बंगाल से जाने माने पत्रकारों, संपादकों , प्रेस क्लबों के पदाधिकारियों ,मीडिया शिक्षा से जुड़े पेशेवरों और अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।

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इस तीन दिनी कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण नोबेल पुरस्कार से अलंकृत ,मेरे पुराने मित्र कैलाश सत्यार्थी और उनकी जीवन संगिनी पत्रकार संपादिका सुमेधा भाभी थे। अपने सरल और सहज स्वभाव के कारण कैलाश भाई ने सबका दिल जीत लिया। उन्होंने अपने भाषण में पत्रकारिता के सरोकारों और सामाजिक – पारिवारिक मूल्यों की शानदार विवेचना की। कैलाश के हाथों मध्यप्रदेश के उन शानदार पत्रकारों को शब्द ऋषि से सम्मानित किया गया ,जिन्होंने रचनात्मक पत्रकारिता करते हुए किसी न किसी विषय पर पुस्तकें लिखीं हैं।

इस सम्मान के लिए निर्णायक मंडल का अध्यक्ष मैं था और ओरियंटल विश्व विद्यालय के प्रो वीसी रहे प्रोफेसर डॉ. आर के जैन तथा जाने माने पत्रकार जेपी दीवान जूरी के सदस्य थे। इस सम्मान के लिए गठित इस जूरी का मानना था कि अच्छी पत्रकारिता करने वालों से सम्मान के लिए आवेदन करने की प्रथा ठीक नहीं है और निर्णायक मंडल को अपनी ओर से ही योग्य प्रत्याशियों का चयन करना चाहिए ।यकीन मानिए जब हम इन शब्द ऋषियों को चुनने के लिए बैठे तो दंग रह गए। मध्यप्रदेश में भी लेखक पत्रकारों की अच्छी खासी बिरादरी है। फिर भी हमने पूरी ईमानदारी से चुनाव किया और श्रेष्ठ पत्रकारों के नाम तय किए।

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इनमें माया के पूर्व संपादक और दुनिया इन दिनों के प्रधान संपादक डॉक्टर सुधीर सक्सेना,पत्रकार और लेखिका डॉक्टर निर्मला भुराड़िया, विंध्य क्षेत्र के दमदार पत्रकार जयराम शुक्ल, एबीपी के ब्यूरो प्रमुख और कई बेस्ट सेलर किताबें देने वाले बृजेश राजपूत ,पांच पीएचडी कर चुके और देश के स्ट्रिंगर्स की दास्तान सुनाने वाले डॉक्टर नरेंद्र अरजरिया, कोरोना की दूसरी भयावह लहर में हमें हमेशा के लिए छोड़ जाने वाले पत्रकारों पर एक मार्मिक पुस्तक बिछड़े कई बारी बारी लिखने वाले ग्वालियर के भाई देव श्रीमाली,डॉक्टर क्रांति चतुर्वेदी , पौराणिक आख्यानों के वैज्ञानिक पहलुओं पर एक ग्रंथ दशावतार के रचयिता शिवपुरी के प्रमोद भार्गव समेत कुछ और नाम हैं ,जिनकी पत्रकारिता को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।

इन सभी नामों का चयन करते समय हम लोग खुद भी प्रसन्नता का अनुभव कर रहे थे । इसके अलावा जूरी ने कुछ ऐसे चुनिंदा पत्रकार साथियों का चुनाव किया ,जिन्होंने रचनात्मक पत्रकारिता की और किताबें भी लिखीं ,लेकिन कोरोना की दूसरी लहर का शिकार बन गए। इनमें कमल दीक्षित,भाई राजकुमार केसवानी ,शिव अनुराग पटेरिया , प्रभु जोशी जैसे दिग्गजों के नाम शामिल हैं।

इस जलसे में रोज़ाना तीन सत्र थे। प्रतिदिन दो सत्र गंभीर और विचारोत्तेजक तथा तीसरा शाम का सांस्कृतिक। गंभीर सत्रों की शुरुआत पहले दिन ही हुई। उदघाटन की औपचारिकता के बाद मीडिया कल, आज और कल विषय पर चर्चा में मेरे अलावा ,मुंबई से पधारे देश के शीर्षस्थ कथाकार हरीश पाठक और डॉक्टर राकेश पाठक भी शामिल थे। कुछ अन्य वक्ताओं ने भी विचार रखे। दूसरे सत्र में आज का समाज और फ़िल्म संप्रेषण पर बात हुई । इसमें दिल्ली के जाने माने फ़िल्म समीक्षक अजीत राय , बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी के निदेशक डॉक्टर हरिवंश चतुर्वेदी,मुंबई के विवेक अग्रवाल और अन्य जानकारों ने भी विचार रखे।

सफल संचालन रचना जौहरी ने किया। शाम को एक बार फिर मेरे साथ पत्रकार साथियों ने अवाम के गीतकार शैलेन्द्र का जिंदगीनामा देखा ।मैनें उनके संघर्ष और गीतों के रूप प्रस्तुत किए तो उनके शहर से आए डॉक्टर हरिवंश चतुर्वेदी ने शैलेंद्र के आध्यात्मिक और मानवीय पहलू को प्रस्तुत किया। इंदौर के प्रतिभाशाली पत्रकार और गायक आलोक वाजपेई ने शैलेंद्र के खूबसूरत गीतों के ज़रिए लोगों का मन मोह लिया । दूसरा दिन आत्मनिर्भर पत्रकारिता पर केंद्रित था।यह सर्वाधिक विचारोत्तेजक सत्र रहा।इसमें वरिष्ठ पत्रकारों का शानदार पैनल था।

इनमें रांची ( झारखण्ड ) से राजेंद्र तिवारी, दिल्ली से जयशंकर गुप्त और जे पी दीवान ,यशवंत देशमुख और अशोक वानखेड़े शामिल थे।इसमें शाम को प्रोफेसर डॉक्टर आर के जैन के संचालन में विज्ञापन के ज़रिए संप्रेषण पर एक शानदार गोष्ठी हुई। इसमें मुंबई से पुनीत भटनागर, रेड एफ एम की प्रोग्रामिंग हेड सुश्री पीयूषा भार्गव जैसे जानकार शामिल थे।तीसरे दिन की शुरुआत मीडिया शिक्षा पर केंद्रित थी।इसमें कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय ,रायपुर के कुलपति बलदेव भाई शर्मा ,पूर्व कुलपति प्रोफेसर डॉक्टर मान सिंह परमार , दिल्ली से जाने माने पत्रकार चिंतक जेपी दीवान,अहमदाबाद से डॉक्टर धीमंत पुरोहित,दिल्ली से वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर और ढाका (बांग्लादेश ) विश्वविद्यालय के डीन प्रोफेसर उज्जवल चौधरी ने शिरकत की।

बलदेव भाई को उनकी आधी सदी से भी अधिक की मूल्यानुगत पत्रकारिता के लिए लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। बीते दिनों हमने कोरोना का भयावह काल देखा है।हमारे अनगिनत साथी इस दौरान महामारी का शिकार होकर हमेशा के लिए हमें छोड़ गए।न पत्रकारों को कभी ऐसे कवरेज का कोई पूर्व अनुभव था ,न सरकारों ने कभी ऐसा दौर देखा था ,न डॉक्टरों ने ऐसी चुनौती का सामना किया था और न समाज ने इतना बिखराव भरा काल खंड भोगा था। कुल मिलाकर यह एक ऐसा अनुभव था ,जिसके बारे में कभी कोई पत्रकार नहीं चाहेगा कि वह दोबारा ऐसा कवरेज करे।

स्टेट प्रेस क्लब ने स्वास्थ्य पत्रकारिता पर एक बेहद गंभीर सत्र का आयोजन करके देश के सामने इस महामारी के बाद मिले संकेतों को पढ़ने का प्रयास किया। इसमें एम्स ,दिल्ली के वरिष्ठ चिकित्सक ,इंदौर के चिकित्सक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ तथा हेल्थ बीट कवर करने वाले पत्रकार लेखक इसमें शामिल हुए। चेन्नई से लंबे समय से विकासशील पत्रकारिता कर रहीं जयश्री बालासुब्रमण्यम सत्र की मुख्य अतिथि थी। वे पच्चीस साल के सामाजिक अनुभव में पत्रकारिता के अलावा स्वास्थ्य मामलों पर यूनिसेफ के साथ काम करती रही हैं। उनकी उपस्थिति से आयोजन का यह सत्र सार्थक हुआ।

देश के अधिकांश प्रेस क्लबों को एक मंच पर लाना इस जलसे की बड़ी उपलब्धि रही।पूरब, पश्चिम, उत्तर दक्षिण – चारों दिशाओं से इन समूहों के पदाधिकारी एकत्रित हुए और एक आंतरिक संवाद तंत्र क़ायम करने का संकल्प लिया।पत्रकारिता की चुनौतियों से लेकर रचनात्मक कार्यक्रमों तक इस नए संयुक्त प्लेटफॉर्म के ज़रिए संचालित होंगे और राष्ट्र के पत्रकार अपने हितों के बारे में अधिक संवेदनशील नज़रिए से सोचेंगे।

बंगाल से प्रेस क्लब के अध्यक्ष स्नेहाशीष सुर,महाराष्ट्र से कल्पना, दक्षिण भारत से प्रमोद राघवन और जम्मू कश्मीर से अशरफ वानी ,राजस्थान से अध्यक्ष मुकेश मीणा,प्रेस एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य जय शंकर गुप्त, एडिटर्स गिल्ड के सदस्यों में मैं स्वयं ,डॉक्टर राकेश पाठक, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के प्रतिनिधि जे पी दीवान ,केरल से प्रमोद राघवन , पुणे से राजेंद्र बाघमारे,अहमदाबाद से डॉक्टर धीमंत पुरोहित और शिक्षाविद प्रो एम एस परमार जैसे अनेक दिग्गज इसमें शामिल हुए। लब्बो लुआब यह कि समूचे शिखर संवाद में कुछ निष्कर्ष बिंदु निकलकर आए। इन पर ध्यान देना ज़रूरी है।

यह हैं ; –

१. भारतीय पत्रकारिता का सियासत के साथ गहराता रिश्ता ठीक नहीं है।यह अवाम के मुद्दे उठाने में बाधक बन जाता है।
२. पत्रकारिता में संपादक नाम की संस्था ग़ुम हो गई है ।इससे नई नस्ल भटकती हुई और रीढ़ विहीन पैदा हो रही है।
३. सामाजिक मूल्यों और सरोकारों को पुनर्स्थापित करने के लिए भारतीय सिनेमा को और रचनात्मक भूमिका निभाना चाहिए।
४. पत्रकारिता में राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी जैसे अपने पूर्वजों के योगदान को नई पीढ़ियों तक पहुंचाया जाना चाहिए।
५. यह पेशेवर संक्रमण काल है।इसके मद्देनज़र पत्रकारों को अपने पैरों पर खड़े होकर अपनी आमदनी के स्रोत खोजने होंगे ,जिससे वे प्रबंधन और राजनीतिक दबाव से मुक्त हो सकें।
६. विज्ञापनों के संप्रेषण में उनकी रचनात्मक भूमिका सुनिश्चित होनी चाहिए।
७. मीडिया शिक्षा के पाठ्यक्रम क्रांतिकारी बदलाव की माँग करते हैं।उनके पास योग्य व्यावहारिक शिक्षक नहीं हैं। आधुनिक तकनीक और उपकरण तो ख़रीदे जा सकते हैं ,लेकिन योग्य शिक्षक बाज़ार में नहीं मिलते।
८. स्वास्थ्य ,कृषि, पर्यावरण, विज्ञान, संसदीय ,संस्कृति, मानवीय मूल्यों से भी नए पत्रकारों को प्रशिक्षित करना चाहिए।
९. देश भर के सभी पत्रकार संगठनों को आपसी अंतर संबंध विकसित करना चाहिए।
१०. इस तरह के शीर्षस्थ आयोजनों की परंपरा को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

इस आयोजन की चर्चा अधूरी रहेगी ,यदि हम इसके सूत्रधारों की चर्चा न करें। स्टेट प्रेस क्लब के अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल और उनकी टीम को यक़ीनन साधुवाद देना होगा। निश्चित रूप से मैं उनकी टीम के सभी सदस्यों को नहीं जानता ,लेकिन उनके जितने भी सहयोगी हैं ,वे एक परिवार की तरह काम करते हैं और इसे कामयाब बनाने के लिए रात दिन एक कर देते हैं। फिर भी कुछ नाम हम लोगों के नियमित संपर्क में आए ,उनका ज़िक्र ज़रूरी है। शुभचिंतकों में कुशाभाऊ ठाकरे विवि के पूर्व कुलपति प्रो. मानसिंह परमार का नाम प्रमुख है।

इसके अलावा संजीव आचार्य , मनोहर लिंबोदिया ,राजेंद्र वाघमारे , शकील अख्तर , कीर्ति राणा ,मीना राणा, नवनीत शुक्ला, कमल कस्तूरी , घनश्याम पटेल , रचना जौहरी ,शीतल रॉय , सुदेश तिवारी, सोनाली यादव ,अभिषेक बड़जात्या , आकाश चौकसे ,संजय रोकड़े और संजीव श्रीवास्तव का उल्लेख कर रहा हूं। संभव है परदे के पीछे के कुछ नायक और भी हों ,उन सभी को मैं धन्यवाद देना चाहूंगा। आयोजन में राजनीतिक दलों के राजनेता भी बड़ी संख्या में उमड़े।