आखिर क्यों एक दिन में भुला दी जाती है वर्षों की सेवा

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इंदौर। पिछले कई दिनों से इंदौर आई हॉस्पिटल की गलती से 11 लोगों की रोशनी जाने की खबरें सभी अखबारों और चैनलों में प्रमुख रूप से दिखाई दे रही हैं। जो लोग इंदौर को 30 -35 वर्ष पूर्व से जानते होंगे, उन्हें यह जरूर याद होगा कि किसी जमाने मे मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराना सिर्फ अमीर परिवारों के लोगों के लिए ही संभव होता था। गरीब परिवारों के लिए कितना खर्चीला और कठिन होता था।

गरीबों के लिए तो यह नामुमकिन सा लगता था। ऐसे में इस शहर में गीता भवन अस्पताल और इंदौर आई हॉस्पिटल ने नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया। जहां एक ओर शहर के कई प्रसिद्ध नेत्र रोग विशेषज्ञ एक एक ऑपरेशन से लाखों रु की कमाई करते थे। वहीं डॉ महाशब्दे शहर के दानदाताओं से राशि इकट्ठा कर गरीबों के मुफ्त ऑपरेशन कर रोशनी खो चुके लोगों के जीवन मे रोशनी लाते थे।

जिन्हें इस सेवा कार्य के लिए बाद में पद्मश्री जैसा प्रतिष्ठित सम्मान दिया गया। इस संस्था ने न जाने कितने गरीब परिवारों के वयोवृद्धों की रोशनी वापस ला दी। जो काम करता है गलती उसी से होती है। भले ही उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती, लेकिन उसकी जांच पूरी हुए बिना ही उसे दोषी करार देना भी कहां का न्याय है। सवाल यह उठता है कि क्या संस्था की वर्षों की सेवा को एक ही दिन में भूला देना उचित होगा। अगर हां तो शायद स्वयं सेवी संस्थाओं के रूप में पहचान रखने वाले इस शहर में भविष्य में कोई भी सेवा भावी संस्था गरीबों की सेवा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगी।

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