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एक अल्प विराम…

Posted on: 01 Nov 2018 14:14 by Surbhi Bhawsar
एक अल्प विराम…

मेरे जीवन का एक अध्याय पूरा हुआ। इसी जुलाई में मीडिया में 25 साल पूरे हुए। लिखने की चाहत मुझे चारों तरफ अनिश्चितता और हर समय जोखिम से भरी खबरों की दुनिया में लेकर आई थी। विदिशा में गणित में एमएससी के बाद एक साल कॉलेज में पढ़ाया था। लेकिन सब छोड़कर पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि के दूसरे बैच में आया। विदिशा में अतुल चावला के यहां पंजाबी व्यंजनों का स्वाद हमेशा याद रहने वाला था। किसी मोहल्ले में भी आप चार-छह साल रह जाएं तो छोड़ना आसान नहीं होता। जिस घर में बचपन बीता हो, वह उम्र भर स्मृतियों में कौंधता है। एमएससी के साथी प्रकाश पंत पहले बैच में ही धावा बोल चुके थे।

कॉलेज का कमाऊ काम होने से मैं कुछ असमंजस में था। शाहपुरा की पहाड़ी के पीछे विश्वविद्यालय की इमारत के बाहर चाय की दुकान पर पंतजी का मेरे लिए संदेश था-आ जाइए, हमारे पास खोने को है ही क्या? विश्वविद्यालय में एनके त्रिखा, कमल दीक्षित, उप्पल मेम और श्रीकांत सिंह से समाचारों और विचारों की बारीकियां समझीं। अरुण शौरी, प्रभाष जोशी, वेदप्रताप वैदिक के लेक्चर सुनना एक नईदुनिया से पहला परिचय था। व्यवस्था की खामियां नजर आने लगी थीं। कर कुछ सकते नहीं थे, सिवाय गुस्से के। कुछ कर गुजरने के रोमांच से जरूर भरे थे। नए परिंदे घोंसलों में उड़ान भरने के लिए पंख फड़फड़ा रहे थे। असीम आकाश को देखकर सहमे हुए भी थे। तब चील-गिद्धों का अंदाजा हो भी नहीं सकता था।

मीडिया की हवाओं में उन दिनों टीवी न्यूज चैनलों का शोर नहीं था। मीडिया का मतलब सिर्फ प्रिंट यानी अखबार या पत्रिकाएं थीं। 1993 में दिल्ली में राष्ट्रीय सहारा में ट्रेनिंग पूरी कर मदन मोहन जोशी की दैनिक नईदुनिया में देवप्रिय अवस्थी के साथ खबरों का मैदानी अभ्यास आरंभ हुआ। वेतन मासिक शर्म का विषय था। कड़ाके की कड़की का कठिन समय कैसे पार हुआ यह आशुतोष केवलिया बताएंगे। एक साल बाद भूपेंद्र चतुर्वेदी के उकसावे पर इंदौर का रुख किया, जहां हिंदी फ्री प्रेस शुरू हुआ था। रवींद्र शाह से पहली मुलाकात वहीं हुई। आज ये दोनों सीनियर हमारे बीच नहीं हैं। संयोग मुझे नईदुनिया में ले गए। तब राहुल बारपुते वहां थे। उस संपादकीय सभागार की ऊर्जा कमाल थी, जो कभी प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर, श्रवण गर्ग और एनके सिंह की कर्मभूमि रही थी। अभय छजलानी ने इंटरव्यू के बाद हम दो युवाआें को सीधे सिटी रिपोर्टिंग में उतारा था। मैं और प्रवीण शर्मा, जो बाद में नईदुनिया ग्वालियर के एडिटर बने और अब हैलो हिंदुस्तान के एडिटर हैं। शशींद्र जलधारी के सिटी साम्राज्य में विकास मिश्र बिहार कैडर से थे। हम तीनों के संतुलित समीकरण ने एक कामचलाऊ सरकार बनाई। अपना कॉमन मिनिमम प्रोग्राम था- अपनी जगह बनाना, टिकना, विवादों से दूर रहना, लिखना-पढ़ना।

नईदुनिया के नौ साल पत्रकारिता में ‘समाधि’ के गहरे अनुभव के साल थे। बाबू लाभचंद छजलानी मार्ग वाली नईदुनिया की आबोहवा में अजीब किस्म की ऊर्जा थी, जो कुछ सोचने-विचारने और लिखने का वातावरण रचती थी। कुछ अच्छा लिखा है तो यशंवत व्यास बिना परिचय की औपचारिकता के खुले खाते में छाप ही देंगे। भले ही दायरा सिटी की रिपोर्टिंग का हो लेकिन अगर विचार पक्ष में भी कुछ दखल है तो निर्मला भुराड़िया और जयदीप कर्णिक आपके लेख का स्वागत ही करेंगे। समीक्षा के लिए आने वाली रुचि की किताबों को अभयजी ने खूब पढ़वाया और लिखवाया भी। अशोक जोशी-कमलेश सेन की जोड़ी उस समृद्ध लाइब्रेरी को संभालती थी, जिसमें बैठकर अनगिनत किताबों को पढ़ा। वह अच्छी उड़ान के लिए पंखाें और हवाओं के बीच तालमेल सिखाने की एक धीमी गति की प्रक्रिया थी।

सात साल बाद पहली किताब-‘प्रिय पाकिस्तान’ मनस्वी के मुरली मोहन ने छापी। पहला लंबा आउटडोर कवरेज गुजरात-महाराष्ट्र में किया, जब भास्कर से कीर्ति राणा और मैं हजारों गांवों का कायापलट करने वाले स्वाध्याय के दर्शन को निकट से देखने गए। गरम दल के कर्मचारी नेता एसके वाजपेयी ने स्वाध्याय परिवार के शुरुआती पाठ पढ़ाए थे। भोजशाला आंदोलन के बहाने राजा भोज के महान इतिहास की सैर की और पता किया कि भोज ने तीन भोजशालाएं बनाईं थीं, एक नहीं। एक सिटी रिपोर्टर के लिए यह कुछ ज्यादा ही बड़े अवसर थे। अासमान इतना असीम है कि पंखों की क्या औकात कि वह किसी एक छोर को भी छू ले!

आकाशवाणी इंदौर में बीएन बोस और ओम जोशी ने रेडियो के लिए खूब लिखवाया। कड़की के दिनों में साढ़े आठ सौ रुपए के चैक सूखे में वर्षा ऋतु की पहली बौछार जैसी अलौकिक अनुभूति देने वाले थे। पैसों की किल्लत से गांव लौटने का विचार उन दिनों कुलबुलाता ही रहा। इसलिए सैडमेप के ट्रेनिंग प्रोग्रामों की कवरेज में डॉ. जीएस जरयाल जैसे विशेषज्ञों से जड़ी-बूटियों की खेती की ट्रेनिंग ले डाली। राजीव सोढ़ी ने जाने कहां-कहां सोना उगल रहे खेत दिखाकर ललचाया। मगर जरयाल साब ने गांव लौटने के नाम पर अब तक लाल सिग्नल ही दिखाया। डॉ. राजेश माहेश्वरी ने शिरडी के साईं से कनेक्ट करते हुए भरोसा भरा कि बाबा सब ठीक करेंगे। फिक्र नॉट! एंद्र कुमार दुबे जब मिलते एक ही बात कहते, खड़े-खड़े बहुत दिन हुए, शाम को आओ, बैठते हैं! अंतत: उषानगर एक्सटेंशन के ओशो समवेत ध्यान केंद्र में स्वामी आनंद गौतम के यहां चाय-पकोड़े से महकती शामें ओशो के विचार वृत्त में ले जातीं और नश्वर दुनिया में कुछ सार्थक करने की प्यास जागती।

बेटा स्कूल जाने लायक हुआ तो फीस की रकम सुनकर पहले धरती हिली, फिर दिमाग घूमा, अंतत: नईदुनिया के गुरुकुल में समाधि भंग हुई। वह 2003 का साल था। तब तक टीवी चैनलों ने मीडिया में ग्लैमर का तड़का लगा दिया था। अप्रैल के महीने में मैंने दिल्ली कूच किया। नोएडा के सेक्टर-11 में सहारा समय के सैटेलाइट रीजनल चैनलों की तैयारियाें की धूमधाम थी। मुकेश कुमार ने मुझे एमपी-सीजी के लिए चुन लिया। सीनियर जर्नलिस्ट प्रकाश हिंदुस्तानी और भुवनेश सेंगर के साथ सबसे यादगार हरसूद कवरेज किया, जिस पर राजकमल प्रकाशन से आई किताब ने आसमान में उड़ते हुए भारहीन होने का रोमांचक अहसास कराया। ‘हरसूद 30 जून’ की धड़ाधड़ समीक्षाएं देश भर में छपीं। दिल्ली में प्रभाष जोशी और कमलेश्वर राजकमल के आमंत्रण पर चाणक्य पुरी स्थित राजेंद्र भवन आए। राहुल देव के शब्द थे-‘मानवीय विस्थापन के इस दस्तावेज ने हिंदी पत्रकारिता का मान बढ़ाया है।’ नामी लेखक-पत्रकारों की उस महफिल में मैं और भुवनेश डरे-सहमे से बैठे सोच रहे थे कि यार, ये किताब लिखकर कहां फंस गए! तकदीर के खेल भी निराले हैं। कुछ कराना हो तो कहां-कहां ले जाती है!

हर सुबह की शाम तय है। रेवेन्यू को लेकर चैनल में हुए कुछ व्यर्थ बदलावों ने ढाई साल में ही स्क्रीन का मोहभंग कर दिया। संयोग से उन्हीं दिनों डॉ. भरत अग्रवाल ने दैनिक भास्कर के एडिटर श्रवण गर्ग से मिलवाया। डॉक्टर साहेब विदिशा के हैं और इस नाते ‘ब्राह्मण’ पर उनकी पारखी नजर नईदुनिया के समय से थी। गर्ग साब के हुक्म पर दैनिक भास्कर में 2006 में भोपाल आना हो गया। माखनलाल के पहले बैच और मेरी पहली नौकरी के दिनों के साथी अजय उपाध्याय यहां जीवन के अलौकिक रहस्यों पर सदा उपयोगी उपदेशों के साथ मिले। उनसे मिलना चारों तरफ दुष्टता से भरी दुनिया में एक बड़ी राहत थी।

तब दैनिक भास्कर में एक खास भूमिका के लिए हम चार जांबाज सिपाही चुने गए थे-राकेश दीवान, ऋषि पांडे, जयश्री पिंगले और मैं। इस चतुरंगिणी सेना को नेशनल लेवल पर ग्राउंड कवरेज के लिए लाया गया था। चारेक महीने हम गैरेज में धूल खाती गाड़ियों जैसे खड़े रहे, जिन्हें एक दिन धो-पौंछकर स्टेट ब्यूरो में लगा दिया गया। राजधानी के राजपथों पर तीन साल का यह एक दुर्गम दौर था, जिसके पूरा होने तक बाकी तीन साथी अलग-अलग कारणों से विदा ले चुके थे। ब्यूरो के स्थापित सितारा संवाददाताओं के बीच मैं अकेला ‘एक्स्ट्रा’ था, जिसे एक ‘ब्रेक’ का इंतजार था। अजित वडनेरकर जैसे शब्दों के साधक उस कालखंड की अनुपमउपलब्धि हैं। उस असहज माहौल में एडिटर अभिलाष खांडेकर एक अनुकूल पर्यावरण थे, जहां विपरीत विचार को भी साथ पलने की सुरक्षापूर्ण आजादी थी। उनके रहते फिल्म फ्लाॅप होने से बची रही। वह ‘ब्रेक’ भी जल्दी मिला।

संसार नश्वर है। खबरों के संसार में नश्वरता का बोध कुछ ज्यादा ही प्रबल है। हर समय। हर कहीं। 2010 में अभिलाष खांडेकर मराठी अखबार का आगाज करने महाराष्ट्र कूच कर गए। एमडी सुधीर अग्रवाल को उनके एक ‘कल्याणकारी ई-मेल’ ने मुझे भी ब्यूरो के सीमित दायरे से एक राष्ट्रीय भूमिका में धकेल दिया। अब मुझे उस नेशनल न्यूजरूम (एनएनआर) की नागरिकता मिली, जहां कल्पेश याज्ञनिक हमारे प्रधान आचार्य थे। श्रवण गर्ग की धूनी दिल्ली के मीडिया महाकुंभ में स्थापित हो चुकी थी। यहां से मेरी भारत भर की परिक्रमाएं आरंभ हुईं। पांच साल तक मैंने औसत आठ बार भारत घूमा। कई यात्राओं में साथ रहे फोटो एडिटर ओपी सोनी गवाह हैं कि संडे जैकेट पर आउटडोर स्टोरीज के लिए भारत के कोने-कोने की इन यात्राओं ने अासमान की ऊंचाई तो नहीं एक नए क्षितिज को छूने का मौका जरूर दिया। यह अनुभव पतंजलि की ‘निर्विकल्प समाधि’ जैसा स्तर था, जिसके बाद पाने को जगत में कुछ शेष नहीं रह जाता!

एनएनआर के आधार स्तंभ शरद गुप्ता और धीरेंद्र राय जब अपना डंडा-झंडा लेकर दिल्ली कूच कर गए तो मेरा मन भी एबी रोड, इंदौर के प्रेस कॉम्लैक्स के उस मायावी संसार सागर से उचाट हो गया। आचार्यश्री कल्पेशजी की दृष्टि में मैं पत्रकारिता का एकमात्र योग्य परिव्राजक था। वे चाहते थे कि मैं कमंडल लिए घूमता ही रहूं। उनकी मर्जी के बिना कोई भी फैसला ईशनिंदा थी, जिसमें माफी की गुंजाइश कतई नहीं थी। दावपेंच भरे इन सालों के रोमांचकारी अनुभवों पर एक मजेदार किताब की गुंजाइश है। एकाध साल में ‘पत्रकारिता की राग दरबारी’ लिखने का मन है। अब समय की कमी का बहाना भी नहीं होगा। पांच साल की भारत यात्राओं की पूर्णाहुति संसार की छत यानी तिब्बत की सीमा पर कैलाश मानसरोवर के मार्ग पर हुई। जनवरी 2015 में भोपाल एडिशन में आने का फैसला हुआ। आचार्य क्रुद्ध थे। क्रोध की अग्नि में मेरी आशाएं भस्म होनी ही थीं।

भास्कर में 12 साल 8 हीने रहा। इस बीच कई भूमिकाएं बदलीं। दो बार शहर-बदर हुए। लेखन ने मुझे आसपास पसरी नकारात्मकताओं से बचाए रखा। एनएनआर में जाने के पहले तीन किताबें आ चुकी थीं-‘एक साध्वी की सत्ता कथा’, ‘आधी रात का सच’ और ‘पत्रकारिता के युगनिर्माता राहुल बारपुते।’ इंदौर में शहर छोड़े बिना प्रिंट से टीवी में गया था। भोपाल में प्रदेश छोड़े बिना राष्ट्रीय क्षितिज को छूने का दुर्लभ अवसर आया। ‘भारत की खोज में मेरे पांच साल’ इसी भूमिका का एक निर्णायक दस्तावेज है।

भोपाल में माधवराव सप्रे संग्रहालय एक अनूठी विरासत है। अगर किसी एक काम से जीवन सार्थक होता है तो विजयदत्त श्रीधर के कर-कमलों से यह काम सप्रे संग्रहालय के रूप में सामने है। श्रीधरजी ने अखबारी नौकरी से हटकर मेरे लेखन को हमेशा अपनी परख में रखा। वे पत्रकारिता की डिग्री के समय से ही मुझ पर नजर रखे रहे हैं। अच्युतानंद मिश्र ने पत्रकारिता विवि में कुलपति रहते राहुल बारपुते पर किताब लिखने की जिम्मेदारी दी तो श्रीधरजी ने ही वह कठिन काम अपनी सदाबहार जोशीली शैली में पूरा कराया। प्रो. बीके कुठियाला जब कुलपति बने तब विश्वविद्यालय को बीस साल हो गए थे। यहां से निकले विद्यार्थी देश भर के मीडिया में बड़ी जिम्मेदारियों में आ चुके थे। कुठियालाजी ने ‘दो दशक एक सफर’ शीर्षक से एक शानदार दस्तावेज तैयार कराया था, इसमें सीनियर्स के संघर्ष की कहानियां पहली बार उन्हीं से लिखवाई गई थीं। इनमें आनंद पांडे, अनुज खरे, संजीव शर्मा, प्रकाश पंत, शिवकेश मिश्र, श्यामलाल यादव जैसे प्रख्यात नाम शामिल हैं, जो आज देश भर के मीडिया संस्थानों में शीर्षस्थ संपादकीय भूमिका में नई पीढ़ी के अच्छे लीडर के रूप में सामने हैं।

मैं अक्सर कहता हूं कि अगर हिंदी में किताबों के भरोसे जिंदगी की जरूरतें पूरी हो सकतीं तो खबरों की नश्वर दुनिया से यह कहीं ज्यादा अच्छा काम था। मगर हिंदी में लेखन के भरोसे डूब क्षेत्र में जाना तय था। शौक की खातिर खुदकुशी करने का ख्याल ही रूह कंपाने वाला था। सच कहूं तो उथलपुथल भरी जिंदगी कभी पसंद नहीं रही। अपनी भूमिका में डूबकर जीओ और अपनी-अपनी भूमिका में सबको आनंद से जीने दो। जीवन को खिलने दो। न तनाव दो, न लो। अकारण दिया तनाव आफत बनकर ही लौटता है। पद और पैसे की हवस में किसी का चरणागत होने या बार-बार बैनर बदलने की बजाए एक जगह थमकर-ठहरकर करतब दिखाना ठीक लगा। धूनी रमाकर रहने का अपना शाश्वत आनंद है, जो बैनर-बैनर भटकने में नहीं है। वहां पदों की पायदानें और पैसे के उछाल मारते आकर्षक आंकड़े अवश्य ही हैं लेकिन जरूरतें कहीं भी पूरी हो सकती हैं, ख्वाहिशें कभी और कहीं पूरी नहीं होतीं। इच्छाएं अनंत में भटकाती ही रहती हैं। एक बात और-दिल्ली ने मुझे हमेशा डराया था। वहां जाने और जमने के अवसर थे मगर मन नहीं माना। अपने को मीडिया में कौन से किले फतह करने थे, एक अंजुलि अर्ध्य ही तो अर्पित करना था। क्या दिल्ली, क्या भोपाल, क्या इंदौर! सबै भूमि गोपाल की।

राजधानियों के रंग-ढंग निराले हैं। सत्ता केंद्रों का संसार चौंधियाने वाला है। राजपथों पर निरंतर भ्रमणशील और क्रियाशील मीडियादूतों के शक्ति-समूहों और परम-पीठों के क्या कहने? ये भी सांसारिक जीवन के अटल सत्य हैं। मगर इस प्रभावशाली मायावी लहर ने मुझे कभी नहीं लुभाया। इसे मेरे स्वभाव की कमी ही मानता हूं। कभी श्यामला हिल्स पर चढ़ा भी तो कदम सीधे रास्ते की बजाए दाएं भारत भवन के ढलान पर ही ले गए। कहानी, नाटक, सुर, संगीत, अभिनय और व्याख्यान में ज्यादा समझ तो नहीं थी मगर गहरी विचारपूर्ण शांति अवश्य थी। आचार्य शंकर पर केंद्रित व्याख्यान में मनोज श्रीवास्तव से लेकर पवन कुमार वर्मा को सुनना भीतर से हिला देने वाले अनुभव से गुजरने जैसा था। हम केरल के इस बाल संन्यासी के बारे में कितना कम जानते हैं, जिसने अपनी 32 साल की उम्र में भारत की हजारों साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत पर जमी धूल को अपने श्रम और साधना से पौंछ डाला था।

विजिटिंग कार्ड पर छपे ऊंचे ओहदों और वातानुकूलित बंद केबिनों में विराजकर सिस्टम के चुंबकीय खिंचाव वाले शिखरों से निकटता कायम करने की मनोकामना कभी नहीं की। दूरदराज के गांव, शहर, तीर्थ, किले, महल, मंदिर, नदी, पहाड़, समंदर, बीमार, बदहाल, बेदखल, खेत, खलिहान और खंडहरों में हर पल मौजूद समय के तीन आयामों में झांकना पता नहीं क्यों, अत्यंत रास आया। संसार का कौन सा पेशा मुझे मेरे हजारों साल पुराने महान् देश की आहत आत्मा की गहराइयों तक इतने ध्यानपूर्वक ले जा सकता था? मैंने भास्कर के गर्भगृह से ही महान भारत की लगातार आठ परिक्रमाएं निर्विध्न पूरी कीं। इसलिए संसार भर की तोहमतें झेलने के लिए अभिशप्त संसार की एकमात्र इस विचित्र विधा को प्रणाम है। मीडिया को सदा सादर प्रणाम है!

एक अनुभव की बात-‘मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती। परिश्रम के बीज मीठे फल अवश्य लेकर आते हैं। नेकी के नतीजे नियति के अज्ञात मोड़ पर चौंकाने के लिए आपकी ही प्रतीक्षा करते हैं। हां, ईश्वर कदम-कदम पर आपके धैर्य की परीक्षा अवश्य लेता है। अत्यंत कठिन परीक्षा। कुछ नहीं तो वो एक खबीस बॉस को ही आपके ऊपर बिठा देगा! यहां से शुरू होगी रोजमर्रा की खुराफातों की अंतहीन श्रृंखला। वो आपको जीने भी नहीं देगा, मरने भी नहीं देगा। आपके यज्ञ में निरंतर विध्न उसके होने काे अर्थ देगा। ऐसे कम्बख्तों की नजर में यही लीडरशिप है। इत्यादि-इत्यादि!’

चलिए अब इसे छोड़िए भी! रात गई। बात गई। फिर भी मुझे लगता है कि जैसा समाज है, वैसा ही मीडिया है, वैसी ही राजनीति है, वैसा ही प्रशासन है। सबमें सारे गुणदोष गुंथे हुए हैं। लेकिन कुटिल राजनीति एक रोग की तरह जीवन के बाकी क्षेत्रों में भी गाजरघास की तरह फैली है। मीडिया में भी। निजी पसंद और नापसंद का यह सांप-सीढ़ी जैसा खेल है। कहां किसे सीढ़ी मिल जाए और कौन कहां डस ले, कोई नहीं जानता। हममें से हरेक कई बार डसे जा चुके हैं और कभी कोई सीढ़ी भी मिली है। इस तालाब में आप मगरमच्छों से बैर लें, न लें, महोदय निगलने को ही आसपास रेंग रहे हैं। कभी-कभी लगता है कि नियति जिन्हें बड़े पदों पर बिठाती है, उन्हें बड़ा दिल और दिमाग क्यों नहीं देती? ओहदों की ऊंचाइयों पर सहज मानवीय उदारता कहां सूख जाती है?

जैसा कि मैंने कहा, लिखने की लत लेकर मीडिया में आया था। आज पलटकर देखता हूं तो हैरत से भरा हूं। जिंदगी इतनी छोटी है। 25 साल तो बहुत होते हैं। जाने क्या-क्या याद आ रहा है। कहने बैठूं तो महीनों कह सकता हूं। लिखने बैठूं तो दो सौ पेज लिखकर एक कप चाय के लिए रुकूं। पूर्णकालिक लेखक की नई पारी के लिए यह काम बुरा नहीं है। पढ़ा तो खूब जाएगा। लिखने में एकाध साल ही लगेगा-‘पत्रकारिता की राग दरबारी!’ श्रीलाल शुक्ल की आत्मा उनके शब्दों में जागृत है। कुछ शब्द अपनी आत्मा में भी हैं। देख लेते हैं जागृत हैं या वहम! हमें किसी मुगालते मंे नहीं रहना चाहिए। पता होना चाहिए कि लाले में जान कितनी है। ‘पत्रकारिता की राग दरबारी’ के किरदार अपने असली नाम और काम के साथ किताब में हों, यह सोचा है। क्या लेकर आए थे, क्या खोएंगे। राेते हुए आए थे, जाते हुए भी रोएंगे!

मीडिया के कामकाज से मुक्त होकर अब गांव में जमने का सोचा है। 76 साल की उम्र में भी 16 घंटे मेहनत करने वाले पिता के खेतों में। तो महानुभाव, समय आ गया है। विदा लूं। साल 2018 के अक्टूबर महीने की 31 तारीख, बुधवार को मैं मीडिया की इस पारी की समाप्ति की घोषणा करता हूं…

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