जल संकट की चुनौती से निबटने के लिए मंथन, मुख्य वैज्ञानिकों ने लिया हिस्सा

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रायपुर। सिंचाई जल के समुचित उपयोग तथा संरक्षण के संबंध में व्यापक विचार मंथन हेतु आज यहां इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर तथा भारतीय जल प्रबंधन संस्थान, भुवनेश्वर के संयुक्त तत्वावधान में सिंचाई जल प्रबंधन पर तीन दिवसीय बैठक की शुरूआत की गई। इस बैठक का शुभारंभ इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एस.के. पाटील द्वारा किया गया। बैठक में सिंचाई जल प्रबंधन पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के 36 केन्द्रों के मुख्य वैज्ञानिक तथा उनके सहयोगी हिस्सा ले रहे हैं।

इस बैठक में वर्षा जल, सतही जल, भू-जल एवं नदी-नालों के जल के समुचित प्रबंधन के साथ-साथ इनका कृषि कार्यों में उपयोग करने हेतु कम लागत की तकनीकों को देश एवं प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों के लिए विकसित करने पर चर्चा की जायेगी।

बैठक का शुभारंभ करते हुए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एस.के. पाटील ने कहा कि आज पूरा विश्व जल संकट के दौर से गुजर रहा है। शहरों में पेयजल के समस्या के साथ ही कृषि क्षेत्र भी सिंचाई जल की कमी से प्रभावित हो रहा है। यदि स्थितियां इसी प्रकार रहीं तो आने वाले समय में खाद्यान का संकट उत्पन्न हो जाएगा। इसके लिए उपलब्ध वर्षा जल के समुचित उपयोग और संरक्षण हेतु रणनीति बनानी होगी। सिंचाई जल प्रबंधन योजनाओं का पुनरावलोकन करना होगा कि क्या ये योजनाएं पर्यावरण और मानव समाज के लिए उपयुक्त हैं ? हमें वर्तमान पारिस्थितिक परिदृष्य और संसाधनों की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए सिंचाई जल प्रबंधन की ऐसी योजनाएं बनानी होंगी जिनसे पर्यावरण भी बचा रहे और उत्पादन में बढ़ोतरी हो। उन्होंने अनुसंधान परियोजनाओं की माइक्रो प्लानिंग और इन्हें कृषि विज्ञान केन्द्रों से जोडऩे पर बल दिया।

राज्य योजना आयोग के सदस्य डॉ. डी.के. मरोठिया ने इस अवसर पर कहा कि आज पूरी दुनिया पानी के संकट से जूझ रही है। भारत और अन्य ऐशियाई देशों में जल संकट की स्थिति और भी गंभीर है। भारत में पांच हजार नदियां अपना अस्तित्व खो चुकी है और 20 लाख तालाब-कुएं विलुप्त हो चुके हैं। हम अपनी 60 से 70 प्रतिशत आबादी को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं। वर्ष 2030 तक पानी का संकट भयाव्ह हो जाएगा। डॉ. मरोठिया ने कहा कि वर्षा जल के संरक्षण और रिचार्जिंग मे तालाबों की महत्वपूर्ण भूमिका है। अत: तालाबों बचाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

भारतीय जल प्रबंधन संस्थान भुवनेश्वर के निदेशक डॉ. एस. के अम्बस्ट ने परियोजना के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि सिंचाई जल प्रबंधन पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना देश भर में 36 केन्द्रों में संचालित की जा रही है। छत्तीसगढ़ में यह परियोजना रायपुर और बिलासपुर केन्द्रों में संचालित है। उन्होंने कहा कि आज देश में 690 बिलियन क्यूबिक मीटर सतही जल और 433 बिलियन क्यूबिक मीटर भूमिगत जल उपलब्ध है जिसका फसलों की सिंचाई में उपयोग किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2050 तक हमें अपनी आबादी का पेट भरने के लिए 94 मेट्रिक टन अतिरिक्त खाद्यान की आवश्यकता होगी जिसको उपजाने के लिए 324 बिलियन क्यूबिक मीटर अतिरिक्त सिंचाई जल की जरूरत होगी। इतनी बड़ी मात्रा में अतिरिक्त सिंचाई जल की उपलब्धता बड़ी चुनौती होगी। अत: हमें पानी का समुचित और सन्तुलित उपयोग सुनिश्चित करना होगा। डॉ. अम्बस्ट में बताया कि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भूजल काफ ी नीचे चला गया है। छत्तीसगढ़ और ओडिशा राज्यों में अभी भूजल की स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर है लेकिन भूजल के दोहन से यहां भी स्थिति गंभीर होती जा रही है।

कार्यक्रम सह-आयोजन सचिव डॉ. धीरज कुमार खलखो ने कार्यशाला की रूपरेखा प्रतिपादित की। कार्यक्रम के आयोजन सचिव एवं मृदा जल प्रबंधन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एम. पी. त्रिपाठी ने अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के संचालक अनुसंधान डॉ. आर.के. बाजपेयी, कृषि महाविद्यालय, रायपुर के अधिष्ठाता डॉ. एस.एस. राव, कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालय, रायपुर के अधिष्ठाता डॉ. सदानंद पटेल सहित अनेक कृषि वैज्ञानिक एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।

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