इन दिनों जिन्ना फिर चर्चा में हैं, इसलिए पढ़िए जिन्ना की प्रेम कथा…मिस्टर एंड मिसेज जिन्ना…

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( पुस्तक समीक्षा-ब्रजेश राजपूत )
कभी-कभी पढ़ते-पढ़ते कुछ ऐसी किताब हाथ लग जाती है कि उसे बिना किसी के साथ बांटे रहा नहीं जाता। बैचेनी होती है बताने कि कैसी है ये किताब तो ऐसी ही है ये किताब जिसका नाम मिस्टर और मिसेज जिन्ना, विवाह जिसने हिंदुस्तान को हिला कर रख दिया है। जिन्ना के बारे में वैसे भी हम कम जानते हैं और जितना कुछ जानते हैं उसके मुताबिक वो बड़े सख्त मिजाज इंसान थे और हमारे देश के बंटवारे के लिए वो जिम्मेदार रहे हैं। पाकिस्तान के लिए वो भले ही कायदे आजम हों, मगर हिन्दुस्तान के लिए तो वो किसी खलनायक से कम नहीं देखे जाते। बस इन दो लाइनों में ही हमारी जिन्ना से जुड़ी जानकारी खत्म हो जाती है।

मगर वरिष्ट पत्रकार शीला रेड्डी की जिन्ना की प्रेम कहानी पर लिखी इस किताब में हम एक अलग ही जिन्ना से रूबरू होते हैं। मोहम्मद अली जिन्ना पूरा नाम था, उनका जो मुंबई के सबसे ज्यादा फीस लेने वाले मशहूर बैरिस्टर थे। वकालत के अलावा आजादी के लिए चल रहे संघर्ष में उनकी खास भूमिका थी। अंग्रेज आलाकमान से खतों किताबत कर उनकी ही भाषा में बेहतर तरीके से जिरह कर अपनी बात मनवाने वाले जिन्ना की गिनती उस दौर के दस बड़े राष्टवादी नेताओं में होती थी। और उन्हीं जिन्ना ने अपने पारसी दोस्त सर दिनशा पेटिट की बेहद खूबसूरत बेटी रूटी से प्रेम विवाह किया था। उस दौरान जिन्ना बयालीस साल के तो रूटी की उमर अठारह साल थी। ये उस दौर का लव जिहाद तो कतई नहीं था।

हां इसकी शुरूआत रूटी की ओर से ही हुई थी, जो अपने घर आने वाले जिन्ना की विद्वता और उनके जिरह करने की अदा पर फिदा हो गई थीं। उस दौर में जिन्ना के लिए ये शादी करना आसान नहीं था, क्योंकि उम्र के उस पड़ाव तक उन्होंने इस बारे में सोचा ही नहीं था उनके लक्ष्य बडे़ थे और वो अपने इन लक्ष्यों के आसपास किसी को फटकने भी नहीं देते थे। अपने परिवार तक को नहीं। रूटी के लिए तो ये और भी मुश्किल था, मगर वो तो दीवानी थी। उसने अपने परिवार के सामने सोलह साल की उमर में ही ये फैसला सुना दिया था कि शादी तो वो जिन्ना से ही करेगी और अठारह की होते ही उसने घर से भाग कर ये शादी रचा ली।

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20 अप्रैल 1918 को हुई। इस शादी ने मुंबई के पारसी और मुस्लिम समुदाय में हंगामा खड़ा कर दिया। ये असंभव किस्म का मिलाप था, जो लोग मानकर चल रहे थे कि ज्यादा दिन चलेगा नहीं। जिन्ना जो अंग्रेजों के आगे तक झुकने को तैयार नहीं होते थे वो अपनी इस बालिका वधू के आगे पीछे रहते थे। बेइंतहा खूबसूरत रूटी जिन्ना को छेड़ती थी, चिढ़ाती थी ओर उनकी सारे राजनैतिक आयोजनों में उनके साथ साये की तरह साथ रहतीं थीं। रूटी मुंबई के रईस पारसी परिवार की पढ़ी लिखी बेटी थी, इसलिए उस पारंपरिक दौर में भी रूटी का पहनावा और उनका बिंदासपन लोगों का ध्यान खींचता था। मगर इन सबसे अलग आजादी के आंदोलन के तेजी से उभर रहे नेता जिन्ना अपनी पत्नी पर गर्व करते थे और उसके प्रति बेपरवाह रहते थे। जिन्ना के पास सब कुछ था दौलत शौहरत रूतबा मगर जो नहीं था वो था उनके खुद के लिए ओर अपनी पत्नी के लिए वक्त।

जिन्ना ने जो कुछ पाया था अपनी मेहनत ओर अपने कभी किसी के आगे नहीं झुकने वाले व्यवहार के कारण ही इसलिए अपने आपको पूरे वक्त काम में व्यस्त रखना उनकी आदत थी। जो वो शादी के बाद भी बदलने को तैयार नहीं थे और यहीं से रूटी का अकेलापन शुरू होता था, जो बाद में उनको जिन्ना से अलगाव डिप्रेशन और बाद में कथित आत्महत्या का कारण भी बना। आत्महत्या इसलिए, क्योंकि रूटी ने अपने मरने का दिन भी अपने जन्मदिन के दिन ही चुना। परियों सरीखी प्रेमकथा की नायिका ने शादी के दस साल बाद दम तोड़ा तो उसकी उमर मात्र 29 साल ही थी। ओर अपने पीछे रूटी छोड़ गई बेटी दीना और अकेले जिन्ना को, जिन्होंने कभी फिर शादी नहीं की। रूटी की मौत के बाद जिन्ना बदल गए कुछ ज्यादा सांप्रदायिक हो गए और जिद्दी जिन्ना ने देश का बंटवारा कर ही दम लिया। जिन्ना के करीबी लोगों ने लेखिका को बताया है कि रूटी जिंदा रहती तो जिन्ना को बंटवारे तक नहीं जाने देती।

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इस रोचक किताब में लेखिका ने पहले पन्ने से लेकर आखिरी तक प्रेम कथा में रोमांच बनाए रखा है। रोमांस के बीच में गुथी हुई उस दौर की राजनीतिक घटनाओं से महसूस होता है कि ये घटनाएं किसी की भी जिंदगी में कितना असर करती है। गुजरात के काठियावाड के छोटे से गांव से लंदन जाकर बेरिस्टर बनने की जिन्ना की कहानी भी बेहद प्रेरणादायक है। उसके बाद मुंबई आकर बड़ा वकील और नेता बनना जिन्ना की उस शख्सियत को दिखाता है कि जिसके बारे में हमें कहीं से मालुम ही नहीं हो सकता, क्यांेकि हमने जिन्ना को पाकिस्तान को सौंप दिया, मगर आजादी का हमारा साझा संघर्ष में जिन्ना के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। किताब में जिन्ना और गांधी की तनातनी पर भी कुछ पन्ने लिखे गए हैं।

कैसे गुजराती गांधी ने मुंबई के जिन्ना को पीछे छोड़ा। और फिर कैसे जिन्ना ने उस लड़ाई में अपनी नई भूमिका बनाई। शीला रेडडी ने पाकिस्तान जाकर जिन्ना से जुड़े साहित्य का पढ़ा ओर मुंबई में पारसी समुदाय के लोगों के बीच जाकर रूटी और उनके परिवार से जुड़ी असंभव सी जानकारियां निकालीं। किताब के आखिरी पन्नों में रूटी का दर्द रूला देता है और अंत बैचेन कर देता है। मंजुल पब्लिशिंग हाउस से प्रकाशित इस किताब का अनुवाद बेहद सरल है। हिंदी के पाठकों के लिए इस बेजोड़ किताब उपलब्ध कराने के लिए मंजुल का शुक्रिया।

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किताब का नाम – मिस्टर और मिसेज जिन्ना, विवाह जिसने हिन्दुस्तान को हिला कर रख दिया
लेखिका – शीला रेडडी,
प्रकाशक – मंजुल पब्लिशिंग हाउस,
अनुवाद – मदन सोनी, कीमत रू 425 रूपए
( ब्रजेश राजपूत )