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आत्महत्याएं…..एन के त्रिपाठी की कलम से….

Posted on: 17 Jun 2018 11:31 by krishnpal rathore
आत्महत्याएं…..एन के त्रिपाठी की कलम से….

भय्यू महाराज द्वारा की गई आत्महत्या ने उनके जानने वाले सभी लोगों को हिलाकर रख दिया है। इस घटना पर बहुत कुछ कहा, लिखा और दिखाया जा चुका है तथा इस पर कुछ और कहना व्यर्थ है पर इस घटना ने मुझे आत्महत्या के विषय पर सोचने के लिये विवश कर दिया है।आत्महत्याए तत्काल आमजनों का ध्यान आकृष्ट करती हैं और इसीलिये मीडिया भी इन घटनाओं पर काफ़ी सचेत रहता है। जब समाज के समृद्ध , स्वस्थ तथा प्रसन्न दिखने वाले व्यक्ति आत्महत्या करते हैं तो हैरत होती है। मर्लिन मनरो या सुनन्दा पुष्कर जैसे लोग जब आत्महत्या करते हैं तो वर्षों तक ये चर्चा के विषय बने रहते हैं। इन घटनाओं के संभावित कारणों को सोच कर अनेक लोगों के मन मे कुतूहल , जिज्ञासा, करूणा, भय एवं क्रोध आदि का मिलाजुला भाव उत्पन्न होता है। ऐसी घटनायें सभी आय एवं आयु वर्गों मे होती रहती हैं परन्तु मीडिया मे अक्सर छात्र/छात्रा, प्रताड़ित कर्मचारी, नववधू या किसान आदि द्वारा की गई आत्महत्या अधिक चर्चित होती है।

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राजनैतिज्ञ भी इन घटनाओं पर टीप करते हैं परन्तु बहुत सधी हुई भाषा मे। वैसे भी नेता अपनी अन्तर्रात्मा से कम बल्कि राजनीति से अधिक काम लेते हैं।किसानों की आत्महत्या से तो जो भी विपक्ष मे होता है उसकी बाँछे खिल जाती है। फ़ौरन आँकड़ें सामने आ जाते है और सत्तापक्ष के इस्तीफ़े की माँग की जाती है। माना जाता है कि किसान ने सरकार से ऋण लिया होगा, फ़सल ख़राब हो गयी होगी और हृदयहीन सरकार वसूली मे लगी होगी और अन्ततोगत्वा विवश होकर किसान ने आत्महत्या कर ली होगी। और कोई कारण हो ही नहीं सकता। क्या ये तथ्य नहीं है कि किसानों से ज़्यादा ग़ैर किसान आत्महत्या करते हैं ? सेना या अर्धसैनिक बलों में भी आत्महत्या के अनेक प्रकरण होते हैं पर उनका कोई राजनैतिक महत्व नहीं होता है।
हमें सारा क़ानून अंग्रेज़ दे गये है। इसके अनुसार आत्महत्या करना एक अपराध है। सफल आत्महत्या करने वाला इस दुनिया से ही चला जाता है इसलिये उसके विरूद्ध कोई धारा नहीं है। परन्तु इसका प्रयास करना दण्डनीय अपराध है और इसमें धारा ३०९ IPC के अन्तर्गत एक साल तक की सज़ा हो सकती है।आत्महत्या के प्रयास के असली प्रकरण सामने नहीं आ पाते हैं और इस धारा का प्रयोग केवल सार्वजनिक रूप से अनशन या आत्मदाह का नाटक करने वालों पर ही सिमट कर रह गया है।via
उपरोक्त धारा से कहीं अधिक पेचीदा मामला धारा ३०६ IPC का है जो आत्महत्या के लिये प्रेरित या सहायता करने वालों के विरूद्ध है। इसमें १० साल तक की सज़ा है। माना जाता है कि प्रत्येक आत्महत्या के लिये कोई न कोई ज़िम्मेदार होता है। कोई कर्मचारी आत्महत्या करता है तो इसकी ज़िम्मेदारी उसके वरिष्ठ अधिकारी पर आती है। इसी प्रकार कालेज प्रिंसिपल, सास-ससुर या फिर सरकार ज़िम्मेदार होती है। इन लोगों के विरूद्ध कड़ी कार्रवाई करने के लिये मीडिया मे ज़ोरदार आवाज़ उठाई जाती है। कभी कभी राजनीतिज्ञ भी इस मांग में शामिल हो जाते हैं ।यदि सुनन्दा पुष्कर ने आत्महत्या की है तो माना जायेगा कि कोई न कोई तो इसके लिये ज़िम्मेदार होगा और उसे पुलिस को ढूँढ कर लाना होगा। शशि थरूर आरोपी हैं या नहीं इस पर राजनीतिक दल बँटे हुए हैं। एक और उदाहरण देखिये— सुप्रीम कोर्ट ने एक मुख्य मंत्री को बर्खास्त कर दिया और उन्होंने आत्महत्या कर ली तो क्या सुप्रीम कोर्ट इसे प्रेरित करने के लिये सज़ा का पात्र है ?आत्महत्या के लिये प्रेरित करने के मामले मे सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि जब तक कोई यह पूरी तरह से नहीं जानता हो कि उसके कार्य से कोई दूसरा आत्महत्या कर लेगा तब तक उसे आरोपी न माना जाय। केवल मृतक के पहले यह लिख कर जाने से कि उसकी आत्महत्या के लिये कोई व्यक्ति ज़िम्मेदार है तो वह व्यक्ति अभियुक्त नहीं बन जाता है।via
सौभाग्यवश संसद ने Mental Healthcare Bill 2016 पारित कर दिया है। इसके अनुसार आत्महत्या की इच्छा एक मानसिक बीमारी ( mental disorder) है। दूसरे शब्दों में इस क़ानून ने आत्महत्या के प्रयास का अपराधीकरण समाप्त कर दिया है। अत: अब यह आवश्यक हो गया है कि ३०९ तथा ३०६ IPC जैसी धारायें संसद या फिर सुप्रीम कोर्ट द्वारा समाप्त की जायें। यदि किसी व्यक्ति ने मृतक के ऊपर अत्याचार किया था तो उसके विरूद्ध कार्रवाई के लिये अन्य धारायें उपलब्ध हैं।समय आ गया है कि औपनिवेशिक काल के दण्ड विधान की आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समग्र रूप से समीक्षा की जाय।

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