विश्व हिंदी सम्मेलन के बहाने कुछ प्रश्न, हिंदी की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कौन

0
7

विश्व हिंदी सम्मेलन पिछले दिनों मारीशस में संपन्न हुआ है। इस सम्मेलन के बहाने कुछ प्रश्न हैं, जिनका जवाब बेहद जरूरी है। सवाल इस बात का है आज हिंदी की दुर्दशा के लिए कौन जिम्मेदार है?

सवाल तो यह भी है कि क्या मारीशस में जितने भी बुद्धिजीवी लेखक इक_ा हुए थे, वे सब हिंदी सेवी थे या हिंदी के साहित्यकार थे? हिंदी की दुर्दशा को लेकर हमेशा यह कहा जाता है, हिंदी के प्रकाशन और स्तरीय पत्रिकाएं जिस तेजी से बंद होती जा रही हैं, इससे ऐसा प्रतीत होता है कि हिंदी का पाठक वर्ग बेहद गरीब और कृपण हो गया है। बात चाहे रविवार की हो या दिनमान की, सारिका की हो या फिर हिंदुस्तान की…। सब बन्द हो गई और अब तो ज्ञानोदय जैसी पत्रिका भी अधर में है। यह पूछा जा सकता है कि पूरे देश में हिंदी की रोटी खाने वाले हिंदी भाषी और हिंदी पढ़ाने वाले अध्यापकों से लेकर तमाम हिंदी भाषी क्या अपने प्रकाशनों को जिंदा नहीं रख सकते थे? आज पूरे देश में एक भी स्तरीय हिंदी पत्रिका खोजना बेहद कठिन हो गया है। इंडिया टुडे और आउटलुक जैसी पत्रिकाएं अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी निकलना शुरू हुई थी, आज अपने अस्तित्व को लेकर जूझ रही हैं। हिंदी के प्रकाशन धीरे-धीरे बंद होते जा रहे हैं। हिंदी की पुस्तकों की दुर्दशा का आलम तो यह है कि अगर सरकार में खपत ना हो और लाइब्रेरी में किताब नहीं पहुंचे तो यही समझ में नहीं आता कि किताबें निकलती किन के लिए है? लेखक अपनी किताब प्रकाशित कर एक दूसरे को भेंट कर देते हैं, लेकिन वास्तविक पाठक वर्ग आज कहां है?

-अर्जुन राठौर

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here