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फिल्म RAAZI से सम्बंधित कुछ मनो वैज्ञानिक पहलु।मिलिंद की कलम से….

Posted on: 11 Jun 2018 10:30 by krishnpal rathore
फिल्म RAAZI से सम्बंधित कुछ मनो वैज्ञानिक पहलु।मिलिंद की कलम से….

 

अभी तीन -चार दिन पहले ही फिल्म RAAZI देखी । बहुत ही
शक्तिशाली कहानी , कसावट भरा निर्देशन (direction ) !
मेरे ख्याल से फिल्म की कहानी को तीन भागो में बांटा जा सकता है।

1) देशभक्ति से सम्बंधित —

” मेरा देश सर्वोपरि ” की भावना का महत्त्व।
एक कश्मीरी मुस्लिम देशभक्त परिवार का मुखिया
हिदायत खान मात्र इसलिए अपने देश (हिंदुस्तान )के लिए ,
पाकिस्तान से जानकारी इकठ्ठा करता हैं ,कि उसके पिताजी भी यही
काम करते थे ,और पिता अपनी मौत से पहले अपने बेटे हिदायत से भी यही काम
करने का वचन लेते है। आगे जाकर जब उसे और उसकी पत्नी एवं बेटी को ये मालूम
होता हैं ,वह बस कुछ ही दिनों का मेहमान है (कैंसर के कारण ), तो वह अपनी बेटी से भी ,
उसी काम को जारी रखने की इच्छा जाहिर करता है। और शत्रु राष्ट्र की जानकारी हांसिल करने के लिए
अपनी बेटी की शादी पाकिस्तानी फौजी अफसर के बेटे से तय करता है।

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यहाँ हिदायत मन ही मन जनता हैं कि वह,अपनी बेटी सहमत को जिस रास्ते भेजना चाहता है,उसका
अंत भयानक हो सकता है ,और बेटी भी यह जानती है ,उसके पिता उसे आत्महत्या करने का कह
रहे हैं|

अपनी इकलौती बेटी को सूली पर चढाने के मार्ग भेजने वाले और दिल में देशभक्ति की लौ के जगाने वाले की मानसिकता
की कल्पना कीजिये ,उनकी इच्छाशक्ति के फौलाद की कठोरता महसूस कर सके तो कीजिये ,
(ये कहानी 1971 के बांग्लादेश युद्ध के समय की सत्य कथा हैं। जरा विचार कीजिये की कुछ अपवादों को छोड़कर ,जब कोई बच्चा
वास्तविक जीवन में फौज में जाने का संकल्प सुनाता है ,तो उसके पालक उसे मार्ग से परावृत्त करने की कितनी कोशिश करती है।

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2)कहानी का दूसरा पक्ष ,देशभक्तो की कर्तव्यकठोरता को व्यक्त करता है।
मेरे देश के सामने मेरे पति के प्रति पल्लवित होने वाले प्यार का न कोई महत्त्व है, और न ही आप्त स्वकीयों से रिश्तों का। वहाँ सिर्फ हैं कर्तव्य कठोरता।
ऐसी ही कर्तव्यकठोरता के कारण शिवाजी द्वारा राज्यस्थापना के दौरान संभाजी के परवरीश पर अथवा गांधीजी द्वारा अपने पुत्र के परवरिश पर न
चाहते हुए अनजाने में अन्याय हुआ हैं।

3)फिल्म का तीसरा पक्ष मानवीय हैं।
देशभक्ति की कोई भी फिल्म जब मै देखता हूँ तो गहरे तक आत्म-विभोर हो जाता हूँ ,
लेकिन फिल्म देखकर टॉकीज से बाहर निकलते समय सिर बहुत भारी था। कार पार्किंग में किसी व्यक्ति के द्वारा उसकी पत्नी को बोला गया ये डायलॉग ,
” देखो उसने अपने ससुराल के तीन लोगो को निपटा दिया ” ने जैसे सिर के भारीपन का कारण उजागर कर दिया।

सहमत की देशभक्ति के कारण ,उसपर प्यार करने वाले, ससुराल के तीनो लोगो की हत्या हो गई ।
शुद्ध मानवता के लिहाज से ये काम कितना अमानवीय था।
ये भी निश्चित है कि सहमत ऐसा नहीं करती तो अनेक भारतीय मारे जाते ,शायद हम वह युद्ध भी हार जाते ,
लेकिन भारत-पाकिस्तान को भूलकर यदि हम किसी तीसरे देश के व्यक्ति के बार सोचें , तो निश्चित हमें ये काम कितना अमानवीय प्रतीत होगा ।

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सचमुच मेरे फिजिक्स के एक Concept ” Frame Of Reference ” का जीवन में कितना महत्त्व है, ये मुझे और समझ में आ गया।

कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष :
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1) कॉलेज जीवन में थोड़े से खून निकलने से आहत,सहमत , देशभक्ति के जूनून में घर के नौकर को जीप से कुचल भी देती है , अपने पति के बड़े भाई को poisonous injection से मार भी देती है ,
बम विस्फोट में पति तक को मरवाने में परहेज नहीं करती ,लेकिन जब वह अपने वरिष्ठ को कहती है की आप तो मुझे ही मरवाने वाले थे, उसके विचारों की सारी अभिव्यक्ति जाहिर हो जाती है।
उक्त सभी एक्शन्स को वो देशभक्ति के आवेग में संपन्न तो करती है , लेकिन बाद में उन सब विचारो के बोझ से वह उबर नहीं पाती।

द्वितीय महायुद्ध में Atom Bomb निर्मिति और विस्फोट के लिए जवाबदार वैज्ञानिकों की,
Bomb विस्फोट के कारण हुए भयानक नरसंहार के लिए,
जवाबदार होने की आत्मग्लानि से उबर न पाने के बारे में पढ़ा तो था।

लेकिन उनके दिलो दिमाग में कितना भीषण प्रभाव उत्पन्न हुआ होगा ,
ये पहली बार गहराई से समझ सका ।

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एक आखरी बात और। हिंदुस्तान के लिए जान न्यौछावर करने वालों में अनेकोनेक मुस्लिम परिवार भी है।
आजकल उनके खिलाफ Social Media में जहर उगालने की बिना सोची-समझी मुहीम सी चल पड़ी है , उसके कारण अनजाने में कितने राष्ट्रप्रेमी
आहत होते है क्या उनके बारे में ये महानुभाव शांति से सोचेंगे ?

जो जिहादी विचारधारा के हैं उन्हें आप सुधार नहीं सकते ,
लेकिन जो अपने है ,उन्हें सम्हाल तो लीजिये।

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