मल्हाराश्रम इंदौर के गौरव है सोलर मैन आफ इंडिया प्रोफेसर चेतन सोलंकी

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मुकेश उपाध्याय की कलम से

आज जो मैं लिखने जा रहा हूं वो थोड़ा लंबा होगा, पर मैं चाहता हूं कि आप अंत तक पढ़े। कल मेरे स्कूल मल्हार आश्रम के जूनियर शंतिलाल झाला जी का फोन आया कि कल (यानी आज) चमेली देवी कॉलेज में उनके भी और जूनियर (1991 में 12जी पास) श्री चेतन सिंह सोलंकी का सोलर एनर्जी पर व्याख्यान है, और मल्हार आश्रम के कई पूर्व छात्र उनका सम्मान करना चाहते है। चेतन सोलंकी मुम्बई आईआईटी में प्रोफेसर है और देश मे सोलर मैन के नाम से जाने जाते है। पहले तो मुझे अन्य सोलर व्याख्यानो वाले कार्यक्रम की तरह बोर कार्यक्रम लगा, और न जाने का कोई बहाना ढूढने लगा, पर फिर सुखदेव बमौरिया और बहुत सारे मित्रो के फोन आने लगे तो मैंने जाने का निश्चय किया। सामान्यतः मैं ऐसे किसी कार्यक्रम में जाने से पहले गूगल भाई से वक्ता के बारे में जान लेता हूँ। इनके बारे में जाना तो आंखे खुली की खुली रह गयी। आपको संक्षेप में बताता हूँ।

चेतन सोलंकी भाई खरगोन जिले के झिरन्या तहसील के बहुत छोटे से गांव के है। उनमें और मुझमे कई समानता है, उनके गांव का स्कूल भी एक कमरे का था, जहाँ पहली से पाँचवी तक के बच्चे लाइन में बैठाए जाते है, पहली का बच्चा पहली लाइन में और पांचवी का बच्चा आखरी लाइन में। हमारे गुरुजी इतने प्रतिभाशाली होते थे कि एक साथ पांचो क्लासो के बच्चों को पढ़ाते थे। चेतन सोलंकी भी केरोसिन लैंप (ढिबरी) में पढ़े, मैं भी। आगे की स्कूली शिक्षा उन्होंने मल्हार आश्रम में ली, मैंने भी यही से हायर सेकंडरी किया।

एक साल इन्होंने भी होलकर कॉलेज में बीएससी फर्स्ट ईयर में बिगाड़ा, मैंने भी। अंततः इन्होंने भी एसजीएसआईटीएस से इंजीनियरिंग की और मैंने भी। इन्होंने भी कई मल्टीनेशनल कंपनियों में काम किया, फिर सब कुछ छोड़ छाड़ कर मुम्बई आईआईटी में प्रोफेसर बन गए और अब गांधी ग्लोबल सोलार यात्रा के मिशन को लेकर देश विदेश में घूम रहे है, और मैंने भी घाट घाट का पानी पी कर अब देशाटन में समय व्यतीत करता हूँ। बस अंतर इतना सा रह गया कि इन्हें वो बचपन मे केरोसिन के लैंप में की हुई पढ़ाई याद रह गयी, और मैं भूल गया और यही इनका मिशन बन गया।

इनका मिशन है, भारत ही नही, वरन पूरे विश्व के केरोसिन लैंप को उनसे सस्ते, आसान, शून्य कॉर्बन उत्सर्जन सोलर लैंप से विस्थापित करना। पूरी दुनिया की सरकारें, एनजीओ, दानदाता और उद्योगपति जी जान से लगे है कि वो सोलर लैंप को घर घर तक पहुँचा दे, पर वो असफल हो रहे है क्यो? पहले भगवान जानते थे, अब प्रोफेसर सोलंकी भी जानते है, और इनको बताया है गाँधीजी ने। जी हां, सही पढ़ा आपने, मोहनदास करमचंद गांधी ने ही उस असफलता का कारण बताया और उपाय भी बताया। आलेख लंबा हो रहा है न? बस थोड़ा सा और।

मृदुभाषी और गाँधी दर्शन के विद्वान इस इंजीनियर और आईआईटी मुम्बई की टीम ने जब गांव-गांव जा कर अध्ययन किया तो पाया कि सरकार और टाटा, बिरला जैसे दानदाताओं के दिये सोलर लैंप लोगो के घरों में अटालो की तरह पढ़े है, क्योकि उनमे थोड़ी से खराबी आने के बाद सुधारने वाला ही नही है। उसकी बैटरी खत्म होने पर बैटरी देने और बदलने वाला ही नही है, तब इन्हें गांधी जी वाक्य याद आया कि विकास mass production से नही production by mass से ही संभव है। तब इन्होंने और भारत सरकार के अक्षुण्ण ऊर्जा विभाग ने मिलकर गांधी जी की 150 वी जन्मवर्ष के उपलक्ष में गांधी ग्लोबल सोलर यात्रा प्रोग्राम बनाया। जिसमे स्कूली बच्चों से लेकर अनपढ़ महिलाओं तक को सोलर लैंप बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता हैं, और पूरे विश्व मे इसे चलाया जा रहा है।

इतना बड़ा काम कैसे किया जा सकता है जबाब गाँधीजी ने दिया आंदोलन की तरह तकनीकी का उपयोग करो। एक ऐसी वेबसाइट लांच की जिस पर कोई भी अपने आप को रजिस्टर कर सकता है, और स्टेप बाइ स्टेप सोलर लैंप बनाने का ट्रेनर बन सकता है, उसी वेबसाइट पर इसकी परीक्षा दे कर भारत सरकार से सर्टिफिकेट भी प्राप्त कर सकता है। वो आगे गांव के लोगो को इसे बनाना सीखा सकता है। इसी वेबसाइट से लैंप में लगने वाले कच्चा माल (पैनल, सर्किट, बल्ब, बैटरी) के सप्लायर से सम्पर्क कर माल भी मंगा सकता है।

मुझे भी आश्चर्य हुआ, आपको भी आश्चर्य होगा कि इस प्रकार के लैंप बनाने के लिए जो किट चाहिए वो सिर्फ 500 रु की है, और सोलर लैंप 150 रु से 500रु तक मे अलग अलग प्रकाश क्षमता के बनाये जाते है।

फिर से चेतन सोलंकी भाई के पास चलते है, पिछले साल भर से हर दिन 4 से 5 स्कूल, कॉलेज, ग्राम पंचायत, यूनिवर्सिटी, सोशल क्लब, चाय का अड्डा से लेकर सेंट्रल जेल के कैदियों तक इस सोलर लैंप की जरूरत, बनाने के तरीके और वेबसाइट के बारे में जानकारी देने में लगे है। आज ही सुबह 9 बजे आई आई टी इंदौर, फिर 11 बजे चमेली देवी कॉलेज, फिर 2 बजे सेंट्रल जेल, 4 बजे प्रेस्टीज मैनेजमेंट कॉलेज फिर शायद ही ऐसा कोई गरीब या उन्नतिशील देश होगा जहां ये अलख जलाने नही गए होंगे।

इस वेबसाइट को आप भी देख सकते है

http://www.ggsy.in/

इनके कुछ व्याख्यान की यु ट्यूब लिंक कमेंट बॉक्स में भी है। और अंत मे दो नारे जो एक ही पोस्ट में लगाने का पहला मौका आया है।

जय मल्हारी। जय मल्हाराश्रम।।

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