कुत्ते के साथ युवती के ब्याह पर राहुल इलाहाबादी की बेबाक टिप्पणी

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धन्य है ऐसी ज़हालत…तुम्हारी, तुम जैसी सोच के दायरे पर।

आधी आबादी की गिनती ढोती औरतों ने अपनी गुलामी की रवायतें वक़्त दर वक़्त खुद तय की है। उन्होंने अपनी पीढ़ियों को इसी तबीयत के साथ पाल पोस कर बड़ा किया है कि गुलामी का दस्तूर पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहे, आने वाली नस्लें बंधुआ बेकार शिगूफों में उलझी रहे। मर्दों ने तो बस इस जहालत का फायदा उठाया है और औरतों के खुद को कैद करने की हकीकत को धर्म, समाज, परिवार से बाँध दिया है। कानून बना दिया है उनकी कमज़र्फ समझ को। पवित्रता, पतिव्रता, भगवान, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक का खेल इसीलिए रचा गया है। दुनिया भर के स्वांग, ढोंग, रीतिरिवाज, पूजा पद्धतियां इसी को सामाजिक मान्यता देने के लिए ही तो रखी गई है।

औरतें जेलों से भरे आजीवन वीभत्स कारावास की सजा काट रहे कैदियों की मानिंद जिंदगी जी रही है। ऊपर से लेकर नीचे तक वो गुलामी की जंजीरों से जकड़ी हुई है। सिर में, सिर की चोटी में, माथे में, नाक में, कान में, गले में, कमर में, बाह में, पांव में, पांव की उंगलियों में, ऊपर बाजू में, पोहचे में, हाथ में, हाथों की उंगलियों में, हाथ के ऊपर, अंगुली के पोरवो में वे अपनी दासिता की निशानियां को खुशी खुशी ढो रही है बिना किसी प्रतिकार के, विरोध के।

उनके सिंदूर, बिछिया, चूड़ी-कंगन, कमरबंद, मंगलसूत्र, पायल, करधनी, कानों के छेद को, नाक के सुराखों को जोड़ दिया गया है उनके पति की उम्र से…जिसका जीना इसलिए जरुरी है ताकि वह दो पैसे कमा सके नहीं तो वो भूखी मर जायेंगी, ताकि वह उन्हें भोग सके नहीं तो वो मारे लाज शर्म के अपने काम आनंद को न पा सकेगी या जबरदस्ती लूट ली जाएंगी उनकी अपनी मर्जियाँ।

अगर यह सारे प्रतिमान वैज्ञानिकता के पैमाने पर खरे उतरते हैं जैसा कि एक वर्ग समय समय पर खूब प्रचारित करता रहता है तो फिर कैसे यूरोप, जापान, पश्चिमी देशों की औरतें खुश है, स्वस्थ है, लंबी उम्र जीती है, समाज में आगे हैं, अपनी अलग पहचान रखती है और क्यों मेरे देश की औरतें सदियों से इन प्रतिमाओं को ढोकर भी अविकसित, कमजोर, बेकार, बीमार, शारीरिक और मानसिक रुप से कुपोषित है। अगर किसी के पास इससे संबंधित कोई जवाब है तो जरूर मुझे समझाये।

हालात यह है कि आज इस आधुनिक दौर में आप किसी भी औरत को इन गुलामी के निशानों को फेक आर्थिक रूप से सफल व सबल बनने की सलाह देते हो, शिक्षा से लेकर शारीरिक विकास के महत्व को समझाते हो, देश दुनिया घूमने, घरों से निकल लोगों से मिलने, ढेर सारी किताबें पढ़ने की वकालत करते हो तो वो आपको बेवकूफ समझती है…अजीब ऊदबिलावी नजरों से आपको देखती है, आपसे नजरें चुराती है और आपको पागल समझती है।

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