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जन्माष्टमी पर गाय और गोरस को लेकर पेटा का घटिया तंज, अजय बोकिल की कलम से….

Posted on: 03 Sep 2018 09:37 by krishnpal rathore
जन्माष्टमी पर गाय और गोरस को लेकर पेटा का घटिया तंज, अजय बोकिल की कलम से….

जन्माष्टमी के अवसर पर, पशु अधिकारों की आवाज उठाने वाली संस्था ‘पीपुल्स फाॅर द ‍‍एथिकल ट्रीटमेंट आॅफ एनीमल’ ( पेटा) ने जो शरारत भरा ट्वीट किया, उससे न सिर्फ गाय में गहरी आस्था रखने वालों बल्कि उसे दुधारू पशु मानने वालों के मन में भी गहरा रोष है। अपने ट्वीट में पेटा ने अपील की कि वे जन्माष्टमी पर ‘गायों को खुश रखने के लिए शाकाहारी घी और अन्य गैर-डेयरी उत्पादों का उपयोग करके जश्न मनाएं।’ पेटा के इस ट्वीट पर कई भारतीयों ने उन्हे यह कहकर खरी खोटी सुनाई कि पेटा हमे न सिखाए कि हम अपना त्यौहार किस तरह मनाएं। एक ने लिखा कि ‘बकरीद पर छुट्टी मनाने के बाद श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर दूध, दही, मक्खन पर ज्ञान बांटने आ गए पेटा वाले। इतना पाखंड लाते कहां से हो तुम लोग। कभी दोहन और शोषण का अंतर भी पढ़ कर देखो।’ दूसरे ने कहा कि पेटा का ‘यह संदेश (हिन्दू किसान होने के नाते) मुझे चोट पहुंचाने वाला है। मेरी धार्मिक भावनाओं पर प्रहार है, मुझे आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाता है। साथ ही गाय को अनुपयोगी बना कर केवल कत्लखानों के भरोसे छोड़ देने की कुचेष्टा है। पेटा के खिलाफ समुचित कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।’ एक अन्य ने पेटा को लताड़ते हुए कहा कि कहां कंबल ओढ़ के सो रहे थे जब बकरीद पर करोड़ों बकरों का कत्लेआम किया जा रहा था? सिर्फ हिंदुओं की ही भावनाओं से खेलना होता है तुमको।’

हो सकता है कई लोगों को यह ‘अोवर रिएक्शन’ लगे। लेकिन पेटा के ट्वीट में शरारत और उपहास साफ झलक रहा था। क्योंकि भगवान कृष्ण और गाय का रिश्ता तो चंदन पानी जैसा है। कृष्ण को तो गोपालक के रूप में जाना जाता है। उन्होंने उस यादवकुल में जन्म लिया था, जिनके लिए गाय एक आर्थिक संसाधन से कहीं ज्यादा एक देवता और वात्सल्य का प्रतीक है। वैसे पेटा की स्थापना अमेरिका में 1980 में इनग्रिड न्यूकर्क ने की थी। यह संगठन भारत में भी सक्रिय है। दुनिया भर में इसके लाखों सदस्य हैं, जो मूक पशुअों पर होने वाली ज्यादती पर अपनी आवाज बुलंद करते रहते हैं। हालांकि इसके काम करने के तरीके को लेकर कई बार आलोचना भी हुई है। फिर भी पेटा दुनिया भर में पशु अत्याचार पर सख्ती से रोक लगाने के लिए सम्बन्धिअत देशों की सरकारों पर दबाव बनाने में कामयाब रहा है। बाकी पशुअों की तरह गायों पर भी कोई अत्याचार न हो, इस बात से शायद ही किसी को ऐतराज हो। मनुष्य की तरह प्राणियों को भी सम्मानजनक जीने का हक है।

लेकिन सवाल यह है कि पेटा की पशु अधिकार रक्षक की भूमिका सभी मामलों में ऐसी है या नहीं? या फिर वह केवल उन्हीं मामलों में बोलता है, जहां तीखी और घातक प्रतिक्रिया होने की संभावना न्यूनतम होती है। आलोचकों ने जो मुद्दा उठाया है, वह यह कि बकरीद पर जब पूरी दुनिया में लाखों मूक पशुअो की बलि धार्मिक कारणों दी जाती है, तब पेटा कहां होता है? वह क्यों नहीं बोल पाता? जबकि जन्माष्टमी पर तो गायों के पालक की पूजा ही होती है। ऐसे में पेटा को हिंदू समाज पर तंज कसने का क्या नैतिक अधिकार है? पेटा के ट्वीट में कटाक्ष यह है कि वह गायों का आनंद इसी में देखता है कि जन्माष्टमी पर हिंदू समाज गोरस पदार्थों के इस्तेमाल से दूर रहे। पेटा का मानना है कि इससे गायें खुश होंगी। हो सकता है पश्चिम में गायें अपना दूध न देकर खुश होती हों। सोचकर कि यह दूध उनके अपने बछड़ों के लिए बच गया है। लेकिन पश्चिमी मानस यह नहीं समझ सकता भी भारतीय संस्कृति में गो की अवधारणा केवल एक दुधारू पशु की नहीं है। दूध तो भैंस, बकरी और ऊंटनी भी देती है। लेकिन उन्हें कभी गाय का सम्मान और देवता का दर्जा नहीं मिला। कारण गाय में मां की ममता और निस्वार्थता भी है। वह अपना दूध केवल बछड़ों के लिए बचाकर खुश नहीं होती। वह मानव जाति के बच्चों के लिए भी अपने दूध की जरूरत और महत्ता को समझती है। गोया उसका जन्म ही दूसरों के पोषण के लिए हुआ है।

गाय अपना दूध बांटकर ज्यादा सुखी होती है बजाए उसे थन में ही सुखा देने के। दूसरा सवाल बकरीद पर प्राणि रक्षा का है। भोपाल में कुछ साल पहले एक मुस्लिम महिला पेटा कार्यकर्ता ने बकरीद पर बकरों की बलि न देने तथा शाकाहार का अभियान चलाया था। लेकिन लोगों ने उसे मार भगाया था और इस अभियान को मुसलमानों के धार्मिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप माना गया था। अर्थात बकरों की कुर्बानी को एक अनिवार्य धार्मिक रस्म माना गया। हालांकि इस साल ‘राष्ट्रीय मुस्लिम मंच’ ने बकरे के आकार का केक काटकर प्रतीअकात्मक बलि का नया उदाहरण पेश किया था, लेकिन ज्यादातर मुसलमानों ने उसे कोई तवज्जो नहीं दी। उस पर पेटा का कोई बयान आया हो, याद नहीं पड़ता।

मुद्दा यह है कि इसी जन्माष्टमी पर पेटा को गायों को उनकी खुशी किस बात में है, यह याद दिलाने की जरूरत क्यों पड़ी? और ऐसा करके वह क्या सिद्ध करना चाहता है? पेटा गोरक्षा के लिए अभियान चलाए, यह तो समझ आता है, लेकिन दूध- दही और माखन के पर्व पर ही वह दुग्ध उत्पादों से बचने की राय देकर क्या जताना चाहता है? जन्माष्टमी तो गोरस से बने उत्पादों का भी पर्व है। गायें इनके जरिए अपने पालकों और भक्तों को पोषित करके ज्यादा स्वस्थ, प्रसन्न और पुष्ट होती हैं। गो की प्रकृति ही दान और दूसरों का कल्याण है। गाय पशु होकर भी वे केवल स्वयं जीवित रहकर संतुष्ट नहीं होती, जैसा कि पेटा सोचता है। कहते हैं कि कृष्ण ने स्वयं अपने वाम भाग से लीला पूर्वक सुरभि गौ और बछड़े मनोरथ को जन्म दिया था। फिर स्वयं गोरस का पान किया। कृष्ण और गाय के बीच यह अटूट रिश्ता है। ऐसे में जन्माष्टमी पर गाय के दूध को हाथ भी न लगाने की सलाह ही बुनियादी तौर पर नकारात्मक और शुद्ध भौतिकवादी है। पेटा प्राणियों की रक्षा के लिए काम करता है, अच्छी बात है, लेकिन जो त्यौहार मनुष्य और पशु के बीच संवेदनात्मक रिश्तों को मजबूती देता है, उस पर कोई घटिया तंज अस्वीकार्य है। पेटा को इससे बचना चाहिए।

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