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‘कहो तो कह दूँ’- ‘ठेकेदारों और सरकार की लड़ाई, बेचारे दरुओं पर आफत आई’

चैतन्य भट्ट

कहते है कि ‘दो सांडों की लड़ाई में हमेशा बागड़’ का ही नुकसान होता है अब देखो न, मध्यप्रदेश सरकार और दारू की दुकानों के ठेकेदार आपस में लड़ाई लड़ रहे है और आफत आई है बेचारे दरुओं पर। इधर वैसे ही दो तीन महीनो के लॉक डाउन ने उनके दारू से भीगे हुए ‘गले’ सुखा दिए थे, चोरी छिपे पता नहीं कंहा से जुगाड़ कर कर एकाध ‘पौवा’ हासिल कर अपने सूखे गलों को गीले करने की जद्दोजहद में लगे रहते थे। जैसे तैसे लॉक डाउन खुला और उन्हें लगा कि अब ‘बहार’ के दिन आने वाले है जब उनका पूरा जिस्म दारू से सराबोर हो जाएगा वे सारे के सारे दरुये मस्ती में झूम झूमकर गा रहे थे ‘ दुःख भरे दिन बीते से भैया अब सुख आयो रे’ पर उन बेचारों को क्या मालूम था कि जैसे इंसान का जीवन ‘छणभंगुर’ है उसी तरह उनकी ख़ुशी भी कुछ लम्हों की है ।

सरकार ने दारू की दुकानें खोल दीं तो ठेकेदार ऐंठ गए।  कहा जब तक तीन महीन के लॉक डाउन का पैसा माफ़ नहीं करेगी सरकार, हम दुकाने नहीं खोलेंगे। कोर्ट कचहरी तक मामला पंहुचा गया।  कोर्ट ने भी साफ़ कर दिया कि जो सरकार की शर्तों को मानने तैयाह है वो मान ले और जो नहीं मानते वे दुकाने सरेंडर कर दें।  लो साहेब ठेकेदारों ने दुकानें सरेंडर कर दी, अब सरकार ने कहा हमसे दरुयों की आँखों से बहने वाले आंसू देखे नहीं जा रहे है इसलिए उनकी ख़ुशी के लिए हम खुद दुकाने चलाएंगे हमारे आस अच्छा ख़ासा अमला है, हमारे कर्मचारी दारू बेचेंगे देखते है कब तक ठेकेदार अड़ी पटकते है।  अब दुकाने तो खुलने लगी पर हर दूकान पर मनमाने रेट पर दारू बिकने लगी।  बेचारे दरुये जो इतने दिनों से ‘टुन्न’ होने का सपना देखा रहे थे निराश हो गए।  जो सस्ती दारू पीते थे उन्हें तो दारू ‘अवेलेबल है पर जो ‘जेक डेनियल’ ‘मंकी शोल्डर’ ‘जानी वॉकर’ ‘हंड्रेड पाईपर’ ‘शिवाज रीगल’ ‘पीटर स्कॉट’ जैसी मँहगी दारू पीते थे उन दरुओं को उनकी पसंद की दारू नहीं मिल पा रही है सारे के सारे सस्ते ब्रांड खपाने में लगी है सरकार।

अरे भाई गरीबो की तो हर सरकार सुनवाई करती है पर अमीरों की तरफ भी तो देखो जो मंहगी दारू पी पी कर आपका खजाना भरते आये हैं इधर ठेकेदारों और सरकार की लड़ाई में जम कर लूट खसोट मची हुई है जितने में एक बोतल आ जाती थी उतने में ‘अध्धी’ मिल पा रही है सचमुच बड़ा अन्याय है इन दरुओ के साथ।  सरकार को तो लॉक डाउन हटने के बाद ‘दारू की नदियाँ’ बहा देना था ताकि दरुये इसमे डुबकी लगा लगा कर अपना जीवन धन्य कर लेते।  अब भी समय है सरकार के पास, सस्ती कर दो दारू और फिर देखो कैसे दो महीन के भीतर आपका खाली खजाना नोटों से लबालब हो जाएगा