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माँ का चमत्कारी मंदिर जहा अकबर ने भी मानी थी हार

Posted on: 22 Jun 2018 10:52 by shilpa
माँ का चमत्कारी मंदिर जहा अकबर ने भी मानी थी हार

नई दिल्ली : हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा से 30 किलो मीटर दूर स्थित है ज्वालामुखी देवी। ज्वालामुखी मंदिर को जोतावाली मंदिर या नगरकोट भी कहा जाता है।  इसकी गिनती माता के प्रमुख शक्ति पीठों में होती है। मान्यता है यहाँ देवी सती की जीभ गिरी थी। यह मंदिर की गिनती अनोखे मंदिर में होती है क्योंकि यहाँ पर किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती है बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकल रही नौ ज्वालाओं की पूजा होती है।यहाँ पर पृथ्वी के गर्भ से नौ अलग अलग जगह से ज्वाला निकल रही है जिसके ऊपर ही मंदिर बना दिया गया हैं। इन नौ ज्योतियां को महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यावासनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका, अंजीदेवी के नाम से जाना जाता है।

क्यों जलती रहती है  में हमेशा ज्वाला :

एक प्राचीन कथा के अनुसार गोरखनाथ माँ के भक्त थे जो माँ की दिल से सेवा करते थे। एक बार उन्हें भूक लगी तब उन्होंने माँ से कहा आप आग जलाकर पानी गर्म करे मई भिक्षा मांगकर लाता हु माँ ने कहे अनुसार आग जलाकर पानी गर्म किया और गोरखनाथ का इंतज़ार करने लगी पर गोरखनाथ अभी तक लौट कर नहीं आये । माँ आज भी ज्वाला जलाकर अपने भक्त का इंतजार कर रही है .ऐसा माना जाता है जब सतयुग वापस आएगा तब गोरखनाथ लौटकर माँ के पास आयेंगे। तब तक यह अग्नी इसी तरह जलती रहेगी।

चमत्कारी गोरख डिब्बी

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मंदिर परिसर के पास ही एक जगह ‘गोरख डिब्बी’ है। देखने पर लगता है इस कुण्ड में गर्म पानी खौलता हुआ प्रतीत होता जबकि छूने पर कुंड का पानी ठंडा लगता है ।

अकबर की खोली आँखे माँ के चमत्कार ने
एक बार माँ का एक ध्यानु भगत नाम का भक्त अपने गाँव से भक्तों का कारवां लेकर ज्योतावाली के दर्शन के लिए निकला था । रास्ते में मुगल सेना ने सब को पकड़ लिया और अकबर के सामने पेश किया । अकबर ने ध्यानु भगत से पूछा की वो कहा जा रहे तो ध्यानु ने बताया वो जो पुरे संसार की रक्षा करने वाली है उस माँ ज्वालामुखी के दर्शन के लिए जा रहा है। इस पर अकबर ने उसके घोड़े का सिर कलम कर दिया और कहा तेरी माँ सच्ची है तो इसे फिर से जीवित कर के दिखाए  ध्यानु भगत ने माँ से अपनी लाज रखने की प्रार्थना की और माँ के आशिष से घोड़े का सिर अपनी जगह फिर से जुड़ गया। यह सब कुछ देखकर बादशाह अकबर हैरान हो गया | उसने अपनी सेना बुलाई और खुद मंदिर की तरफ चल पड़ा। वहाँ पहुँच कर फिर उसके मन में शंका हुई। उसने अपनी सेना से मंदिर पूरे मंदिर में पानी डलवाया, लेकिन माता की ज्वाला बुझी नहीं। ये चमत्कार देख के अकबर ने माँ से माफ़ी मांगी और उनके दरबार में सोने का छत्र चढाने कुछ अहंकार के साथ पंहुचा | जैसे ही उसने यह छ्त्र माँ के सिरपर चढ़ाने की कोशिश की, छत्र गिर गया और उसमे लगा सोना भी किसी और धातु में बदल गया जो आज भी इसी मंदिर में मौजूद है।

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