संस्मरण: चार दिनों की साइकल-मेरी जीवन यात्रा

मेरे जन्म वर्ष 1951 के बाद साइकिल चलाने पर धीरे-धीरे किलोमीटर की संख्या एक-एक करके बढ़ती गई। मैंने अपने वास्तविक जीवन को इन प्रदर्शित संख्याओं के साथ मस्तिष्क में देखना प्रारंभ कर दिया और मैं साइकिल चलाते हुए अपने जीवन के वर्ष के बाद वर्ष को फ्लैशबैक की तरह मन में देख रहा था। पहले दिन की साइकिलिंग में बचपन का वह दौर शुरू हुआ जब मैंने होश संभाला था।

एन के त्रिपाठी

विचित्र स्थितियों में भी अद्वितीय अनुभव हो सकते हैं। 24 मार्च, 2020 से लागू लॉकडाउन में सबकी तरह मेरा जीवन भी सामाजिक रूप से समाप्त हो गया था। सौभाग्यवश एन सी आर से मेरी पुत्री और दो ग्रैंड डॉटर के आने के कारण घर के अंदर रौनक हो गई थी। मानसिक और शारीरिक दिनचर्या एक विभिन्न पद्धति से संयमित हो गई थी। मुझे व्यायाम के लिए साइकिल और ट्रेडमिल चलाने जैसे दैनिक कार्यकलापों में भी एक अद्भुत अनुभव मिलने लगा था।

चित्र में मेरी व्यायाम की स्टेशनरी साइकल के साइक्लोमीटर पर 2020 किमी अंकित दिख रहा है। इस साइकिल में साइक्लोमीटर पर बारी-बारी से समय, गति, ट्रिप की दूरी, पिछले रीसेट के बाद अब तक की कुल दूरी, कैलोरी और हृदय गति की जानकारी दिखाई देती है। नवंबर, 2020 में एक सुबह जब मैंने साइकिल चलाना प्रारंभ किया तो इस साइक्लोमीटर पर अचानक मेरा ध्यान गया जिस पर 1951 किलोमीटर की रीडिंग थी जो संयोगवश मेरे जन्म का वर्ष है।

मेरे जन्म वर्ष 1951 के बाद साइकिल चलाने पर धीरे-धीरे किलोमीटर की संख्या एक-एक करके बढ़ती गई। मैंने अपने वास्तविक जीवन को इन प्रदर्शित संख्याओं के साथ मस्तिष्क में देखना प्रारंभ कर दिया और मैं साइकिल चलाते हुए अपने जीवन के वर्ष के बाद वर्ष को फ्लैशबैक की तरह मन में देख रहा था। पहले दिन की साइकिलिंग में बचपन का वह दौर शुरू हुआ जब मैंने होश संभाला था। औसतन मैं लगभग 18-19 किलोमीटर प्रति दिन पैडल चलाता हूँ।इसलिए, पहले दिन मैंने अपने जीवन के पहले 18 वर्षों को देखा। यह प्रारंभिक बचपन, स्कूली शिक्षा, माता-पिता, भाई-बहनों और दोस्तों की कोमल यादों का समय था।इस काल को मैंने अपनी क्लास और रहने के स्थान के आधार पर देखा। मेरे पिताजी के उत्तर प्रदेश में स्थानांतरण होते रहने के कारण मेरा जीवन अनेक स्थानों पर बीता। प्रारंभिक धुँधली याद उन्नाव शहर के मोंटेसरी क्लास की है। उस समय मैं घर पर अम्मा के चारों ओर घूमता रहता था और पड़ोस की दादी के घर जा कर बिस्किट खाता था जिसे वे पूजा का प्रसाद इसलिए बताती थी क्योंकि मैं अपनी माँ के आदेश के कारण प्रसाद के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं लेता था। इसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में सरस्वती शिशु मंदिर में कक्षा एक से तीन तक पढ़ा जहाँ संस्कृत के श्लोक और महाराणा प्रताप की कविता कंठस्थ हो गई थी।तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नगर आगमन पर उन्हें गुलाब का फूल विशेष रूप से भेंट करने का अवसर मुझे आज भी याद है।मैं अपने बड़े भाइयों के हर काम में उनके पीछे-पीछे दौड़ता रहता था। इसके बाद सुदूर पूर्व के ग़ाज़ीपुर शहर में लगभग चार वर्ष लूदर्स कॉन्वेन्ट स्कूल में पढ़ा जहाँ इंग्लिश मीडियम में बहुत स्तरीय पढ़ाई होती थी। पांचवीं कक्षा में जिला बोर्ड द्वारा आयोजित परीक्षा में मुझे प्रथम स्थान मिलने पर नेपोलियन पर एक पुस्तक पुरस्कार में मिली थी।यहाँ पर क्रिश्चियन प्रार्थना प्रत्येक क्लास के पहले करवाई जाती थी।इसके बाद बनारस से हाई स्कूल पास किया जिसमें बोर्ड में मेरिट में आने पर मुझे नेशनल स्कॉलरशिप मिली जो पूरे छात्र जीवन में मिलती रही।बनारस में मेरा बिस्मिल्ला ख़ाँ की शहनाई तथा मुंशी प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद की पुस्तकों से परिचय भी हुआ। फिर मेरठ से इंटरमीडिएट पास करने के बाद मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रसिद्ध ए एन झा हॉस्टल में चला गया।

दूसरे दिन, साइक्लोमीटर के साथ मेरी मानसिक आंखों के सामने फिर वर्ष घूमने लगे। इसका प्रारंभ विश्वविद्यालय के जीवन के स्वर्णिम काल से हुआ।इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और फिर लखनऊ यूनिवर्सिटी का छात्र जीवन अकल्पनीय मस्ती से भरा हुआ था। मित्रों के साथ दिन भर घूमना फिरना तथा रात में कुछ घंटे अध्ययन करने का क्रम कभी नहीं टूटता था।भविष्य की कोई चिंता या आशंका नहीं थी। सौभाग्यवश मुझे फ़र्स्ट डिविज़न तथा गोल्ड मेडल प्राप्त हुआ। MA फ़ाइनल में ही मैं बिना किसी तैयारी के ( कोचिंग का तो नाम ही नहीं सुना था) IPS की परीक्षा में बैठा और प्रथम प्रयास में ही सफल हो गया। IPS का रिज़ल्ट आने के पश्चात M A फ़ाइनल की परीक्षा दी। IPS की ट्रेनिंग के अपने अनोखे अनुभव थे।उसके बाद का समय प्रारंभ की नौकरी, विवाह, दो सौभाग्यशाली पुत्रियों की प्राप्ति और रोमांचकारी कार्यों का था। इस काल में पुलिस सेवा में अपने को ख़तरे में डाल देना बहुत स्वाभाविक था। आसाम में SAF की बग़ावत और दमोह में सिख विरोधी दंगों में देवयोग से ही मुझे जीवनदान प्राप्त हुआ था।

तीसरा दिन साइकिल पर मेरी परिपक्व अधेड़ आयु का समय था जब जीवन को सबसे अधिक व्यस्त और महत्वपूर्ण माना जाता है।यह उच्च महत्वाकांक्षाओं, बड़ी उपलब्धियों और अप्रत्याशित निराशाओं के बदलते दौर का काल था।पुलिस की सेवा में अपने कार्यस्थल की जनता में जिस प्रकार की लोकप्रियता और स्नेह मुझे प्राप्त हुआ वह मेरे लिए असाधारण था। फ़ील्ड में पुलिस अधीक्षक, DIG और IG के सक्रिय कार्यकाल को मैंने पूरे उत्साह और आनंद से तथा पूरी निष्ठा से अपना काम करते हुए व्यतीत किया।पुलिस मुख्यालय और सचिवालय में भी पूरी शक्ति से कार्य किया।

चौथा और आखिरी दिन मेरे अभी हाल के लगभग 15 वर्षों के स्मरण का था। यह सेवाकाल में सर्वोच्च पदों के साथ-साथ मेरी दोनों पुत्रियों के विवाह की पारिवारिक उत्तरदायित्व की पूर्ति का सुखद समय था। ट्रांसपोर्ट कमिश्नर के लगभग पाँच साल के कार्यकाल के बाद जम्मू कश्मीर में Spl DG CRPF तथा नई दिल्ली में DG NCRB के अनुभव भी मेरे जीवन के महत्वपूर्ण मील के पत्थर थे। फिर सेवा निवृत्त के बाद का समय आया जिसे मैं अप्रत्याशित आनंद से व्यतीत कर रहा हूँ। मैं अब अपनी उन विभिन्न रूचियों और विधाओं का पीछा कर रहा हूँ जो अब तक जीवन में समयाभाव के कारण अप्राप्य थीं। सेवा काल के कठिन अनुशासन और नियमों से मुक्त अब स्वच्छंद जीवन का समय आया है। मुझे कुछ सामाजिक तथा खेल संगठनों के साथ काम करने तथा देश विदेश के भ्रमण के लिए समय मिल रहा है।विदेश भ्रमण के लिए मैं अपने अध्ययन और कल्पना के आधार पर देशों का चयन कर वर्ष में एक या दो विदेश यात्राएँ कर रहा हूँ। अध्ययन, चिंतन और कभी कभी तबला वादन के लिए पर्याप्त समय है। 2016 से इंदौर की मालवांचल यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर के रूप में शिक्षा क्षेत्र से जुड़ गया हूँ।मेरे विचारों का प्रवाह 2020 किमी की रीडिंग के साथ रुक गया। मैंने साइक्लोमीटर की रीडिंग की फ़ोटो ली और व्यायाम समाप्त किया। मुझे अपने जीवन को मानस पटल पर पुनः जीने के लिए साइकिल पर केवल चार दिन लगे। प्राचीन काल के ज्ञानी लोग बार-बार यह समझाते थे कि मानव जीवन केवल चार दिन का होता है।