बाबा बालकनाथ की सैकड़ों बरस से अनवरत प्रज्वलित धूनी के रखवाले महंत बजरंग लाल

0
87

वरिष्ठ पत्रकार पंकज शर्मा

28 जनवरी को परम-यात्रा पर चले गए। आज पूर्वाह्न उनकी पार्थिव देह का अंतिम संस्कार हुआ। न तो महंत बजरंग लाल इतने नामी थे कि दुनिया उन्हें जानती हो और न बाबा बालकनाथ की सदियों से जीवित वह धूनी इतनी नामी है कि दुनिया वहां जाती हो। लेकिन महंत औरों से भिन्न महंत थे और धूनी की भस्म के चमत्कार भी जिन्होंने देखे हैं, खूब देखे हैं। महंत बजरंग लाल ने ख़ुद को और बाबा बालकनाथ की धूनी को धर्म-उपासना के बाज़ारवाद से पूरी तरह बचा कर रखा। मित्रवत संबंधों के होते भी मैं इसलिए उनके प्रति भीतर-ही-भीतर श्रद्धा महसूस करता था।

महंत जी से मेरा रिश्ता तक़रीबन तीन दशक पुराना था। तब का, जब वे महंत नहीं थे। वे बी. एल. मिश्रा थे और गांधी शाति प्रतिष्ठान से जुड़े हुए थे। मोटी खादी का पाजामा-कुर्ता पहनते थे, हमेशा मुस्कराते रहते थे और सब के लिए कुछ-न-कुछ करने की कोशिश करते थे। मैं नवभारत टाइम्स में संवाददाता था। इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ता था। ‘टाइम्स-समूह’ में प्रशिक्षु-पत्रकार की चयन-प्रक्रिया की तैयारियों में नईदुनिया के संपादक राजेंद्र माथुर की छुअन मिली तो मैं तीन इम्तहान पार कर बंबई पहुंच गया। प्रशिक्षण पूरा हुआ तो दिल्ली भेज दिया गया। तीन साल बीतते-बीतते रज्जू बाबू नवभारत टाइम्स के संपादक बन कर इंदौर से दिल्ली ही आ गए।

दिल्ली आने के बाद रज्जू बाबू का पहला ठिकाना गांधी शांति प्रतिष्ठान का अतिथिगृह था। कुछ समय बाद रज्जू बाबू बी. एल. मिश्रा को अपना विशेष कार्यकारी सहायक बना कर नवभारत टाइम्स में ले आए। तब से मेरा-उनका रिश्ता और गाढ़ा होता गया। वे शांत प्रकृति के, सदाबहार मुस्कराहट के धनी और अध्येता प्रवृत्ति के थे। सो, उनके साथ एक अलग नाता बनता गया। अपनी सेवा निवृत्ति के कुछ साल पहले से मिश्रा जी में मौजूद अध्यात्म-पुंज की लौ तेज़ होने लगी थी। वे बाबा बालकनाथ की धूनी में रात-रात रमने लगे। 1991 में रज्जू बाबू का स्वर्गवास हो गया और एक दिन मिश्रा जी भी नवभारत टाइम्स छोड़ कर चले गए और एक वस्त्र में जिं़दगी बसर करने का प्रण लिए महंत बजरंग लाल हो गए।

मैं निजी तौर पर जानता हूं कि बाबा बालकनाथ की धूनी जिस पहाड़ी पर है, उसे सैकड़ों करोड़ रुपए दे कर लेने की कोशिशें परिसंपत्ति-कारोबार की किस-किस बड़ी हस्ती ने नहीं की? लेकिन महंत बजरंग लाल ने किसी को पहाड़ी की सीढ़ियां नहीं चढ़ने दीं। उन्हें प्रस्ताव मिले कि पहाड़ी पर धूनी-परिसर को आलीशान स्वरूप दे कर बाकी की आधी पहाड़ी पर बहुमंज़िला व्यावसायिक इमारत बना कर उन्हें भागीदार बनाया जा सकता है, मगर वे नहीं माने। पहाड़ी से उन्हें बेदख़ल करने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए गए, मगर वे डटे रहे। बालकनाथ की धूनी को बाज़ारी आयोजनों के ज़रिए नामी-गिरामी बनाने की तमाम पेशकशें भी महंत बजरंग लाल ठुकराते रहे।

लोग उन्हें गुरू मानते थे, मगर वे किसी का भी गुरू बनने से इनकार कर देते थे। पहाड़ी पर बाबा बालकनाथ की धूनी के अलावा कालभैरव की शताब्दियों पूरानी प्रतिमा भी है। महंत जी ने उस प्रतिमा पर कभी मदिरा नहीं चढने दी। कालभैरव को मदिरा अर्पित करने की परंपरा का पालन करने वाले आते तो उन्हें एक छोटे-से अग्निकुंड में उसे चढ़ाना होता था। बतौर प्रसाद मदिरा बांटने की अनुमति न पहाड़ी के ऊपर है और न पहाड़ी के नीचे। महंत बजरंग लाल जीवन भर ज़रूरतमंद परिवारों की कन्याओं के विवाह कराते रहे। उनकी यह धुन सभी को मालूम थी, सो, सब अपने आप जो बन पड़ता था, करने में कोई पीछे नहीं रहता था। सीमित साधनों में, पूरी सादगी के साथ, हर बरस यह सब ख़ामोशी से होता रहा है। न कोई गंडा-ताबीज़, न कोई ढोंग-धतूरा। महंत जी अपने हाथ से धूनी की भस्म भी किसी-किसी को ही लगाते थे। दोनों हाथ उठा कर बस एक ही वाक्य सब से कहते थेः ‘जाओ, बाबा सब भला करेंगे’।

शैव परंपरा के महान तपस्वी बाबा बालकनाथ के बारे में मैं ने महंत बजरंग लाल से घंटों बहुत कुछ सुना-समझा। उनसे पुनर्जन्म, पराशक्तियों, ज्योतिष और तंत्र के विभिन्न पहलुओं पर बहुत बार लंबी चर्चाएं हुईं। मैं ने हमेशा पाया कि वे अंधविश्वासी नहीं थे, रूढ़िवादी नहीं थे, दकियानूसी नहीं थे, उनका दृष्टिकोण आधुनिक था, वे शोधार्थी-भाव से सराबोर थे और सिर्फ़ अनुभवजनित तथ्यों की पुष्टि करते थे। उनके पास अलभ्य प्राचीन ग्रंथों और हस्तलिखित पांडुलिपियों का संग्रह था। जब तक वे पूरी तरह स्वस्थ रहे, आधी रात शुरू होने से कुछ पहले धूनी में बैठ जाते थे और सुबह सवा तीन बजे वहां से उठते थे। बहुत कम ही ऐसा हुआ होगा कि उन्होंने इस दौरान किसी को अपने साथ धूनी में रहने की अनुमति दी हो।

मैं दो घटनाओं का ज़िक्र करने से आज अपने को रोक नहीं पा रहा हूं। मध्यप्रदेश के मेरे एक बहुत संपन्न राजनीतिक मित्र निजी और सार्वजनिक जीवन की चरम-परेशानियों से गुज़र रहे थे। वे अपनी बातें मुझ से साझा करते रहते थे। एक शाम चर्चाओं के दौर में उनकी विह्वलता मुझ से देखी नहीं जा रही थी। मैं ने उन्हें अपनी कार में बैठने को कहा और बिना बताए कि कहां जाना है, उन्हें ले कर रात दस बजे के आसपास महंत जी की पहाड़ी पर पहुंच गया। रास्ते में सिर्फ़ इतना ही कहा कि जहां जा रहे हैं, वहां आपकी सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा और अगर वहां नहीं हुआ तो फिर कहीं नहीं होगा। पहुंचने पर अपने मित्र के बारे में महंत जी को ज़्यादा कुछ नहीं बताया, मगर अधिकारपूर्वक कहा कि उनके लिए कुछ करें। हम काफी देर बैठे रहे। महंत जी अनमने थे। इतना ही बोले कि बाबा जो करेंगे, अच्छा करेंगे। हम वापस आ गए। मेरे मित्र तो घनघोर असंतुष्ट थे ही, मैं भी महंत जी की अनदेखी से हैरान था।

रात को पौने बारह बजे महंत जी का फोन आया। उन्होंने मुझ से कहा कि आपका मित्र आदतन अपराधी है। उसने हर तरह के अपराध किए हैं। इस व्यक्ति को मेरे पास अब मत लाना। इसे जो भोगना है, उसमें हस्तक्षेप ‘बाबा’ पसंद नहीं करेंगे। इसलिए मैं ने कोई दिलपस्पी नहीं दिखाई। आप अन्यथा मत लीजिएगा और स्वयं भी इस व्यक्ति से दूर रहिए। महंत जी ने इस मित्र के बारे में कुछ बातें विस्तार से बताईं और उनमें से कई ऐसी थीं, जो सही थीं और कई ऐसी थीं, जो बाद में सही निकलीं।

दूसरी घटना। बीस साल से ज़्यादा हो गए। मेरे साथ एक लड़का काम करता था। पढ़ा-लिखा था। पत्रकारीय गुणों से लबालब था। बहुत अच्छा अनुवादक था। लेकिन कुछ महीनों से उसका अजीब व्यवहार देख कर मैं बहुत परेशान था। वह लगातार तनाव में रहता था, कमज़ोर होता जा रहा था और मेरा काम प्रभावित हो रहा था। डांट-डांट कर जब मैं उकता गया तो एक दिन मैं ने उसे बैठा कर पूछा कि वह ऐसा क्यों होता जा रहा है? जवाब में उसकी बातें सुन कर मुझे और गुस्सा आने लगा। ऐसा लग रहा था, जैसे वह भूत-प्रेत-ज़िन्न कथाएं ज़्यादा ही पढ़ने लगा है। उसकी बताई बातों का लब्बो-लुआब यह था कि वह माता-पिता-बहनों के साथ रहता है। उनके परिवार पर किसी ने कुछ कर दिया है। घर में अजीब-अजीब घटनाएं हो रही हैं। खूंटी पर टंगे कपड़ों में अपने आप आग लग जाती है, पायल की झनकार सुनाई देती है, नहाते वक़्त बदन पर डाला पानी लाल हो जाता है, बहनों को न जाने कैसे-कैसे अनुभव हो रहे हैं, वगैरह, वगैरह। वह बेतरह रो रहा था।

मैं ने मान लिया कि इस लड़के में पागलपन के लक्षण उभर रहे हैं। मन-ही-मन तय कर लिया कि समय रहते इसे विदा करना ठीक रहेगा। लेकिन मैं अपने को यह नहीं समझा पा रहा था कि इतना समझदार लड़का इस तरह की बातें कर कैसे रहा है? कई दिनों की उधेड़बुन के बाद मैं ने इस बारे में महंत जी को बताया। जानना चाहा कि क्या ऐसा होना संभव है? उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा कि कुछ चीजें़ हैं, जो सामान्य मानव-समझ के बाहर हैं। बोले कि ज़्यादातर लोगों को वहम ही होते हैं, मगर पराशक्तियों का अस्तित्व भी शायद है। मैं ने आग्रह किया कि इस लड़के की मदद करें। बोले कि उसे भेजिएगा। मैं आपको बताऊंगा कि यथार्थ क्या है?

मैं ने अपने इस सहयोगी को महंत जी के पास भेजा। कहा कि जैसा वे कहें, करो और तब तक छुट्टी पर रहो। अगले दिन महंत जी का फोन आया। बोले कि लड़का झूठ नहीं बोल रहा है। गड़बड़ तो है। कुछ दिनों में बाबा सब ठीक कर देंगे। दो-तीन हफ्ते बाद लड़का वापस आया। चेहरे की मुर्दनी गायब थी। उसने कहा कि सारी समस्याएं दूर हो गई हैं। मैं ने पूछा कि क्या उपाय किए? बोला, कुछ नहीं, महंत जी ने एक दोपहर बुलाया। धूनी में कुछ देर बिठाया। भस्म दी और बताया कि घर में कहां-कहां रखनी है। वही किया। अब सब ठीक है। महंत जी ने मुझ से इस लड़के के बारे में बाद में कभी कुछ नहीं पूछा। एक बार जब मैं ने ही उनसे कहा कि अब वह लड़का कहता है कि सब ठीक है तो मुस्करा कर सिर्फ़ इतना बोले कि बाबा ने कृपा की। पिछले कई वर्षों से यह लड़का एक मशहूर राष्ट्रीय पत्रिका में बड़ी पत्रकारीय ज़िम्मेदारी निभा रहा है। मैं आज भी ऊहापोह में हूं कि क्या सचमुच उसके साथ यह सब हुआ था?

आज महंत बजरंग लाल की देह को बेहद भरे मन और उतनी ही भरी आंखों के साथ हम अंतिम संस्कार के लिए पहाड़ी से नीचे ले आए। पहाड़ी के ऊपर, लेकिन, उनकी छांह हमेशा मौजूद रहेगी। कभी-कभी अनाम हस्ताक्षर भी इतनी गहराई तक खुदे होते हैं कि दिखेे भले नहीं, उनकी छाप क़ायम रहती है। ओम शातिः!

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here