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करवा चौथ भारतीय वेलेन्टाइन डे

राजकुमार जैन

पश्चिमी सभ्यता में प्रेम संबंधों को मज़बूत करने के लिए वैलेंटाइन्स डे मनाया जाता है परंतु भारतीय संस्कृति में सैंकड़ों साल पहले ऐसे मज़बूत वैज्ञानिक उपायों का प्रावधान बना दिया गया जिनसे वैवाहिक संबंधों में पवित्रता एवं प्रेम सदा बना रहे। कार्तिक मास की चौथी तिथि को मनाया जाने वाला करवा चौथ व्रत प्राचीन भारतीय मनीषियों द्वारा बनाया गया सुहागिन महिलाओं का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है, इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और पति की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करती हैं, यह व्रत पति के लिए एक दिन का उपवास नहीं है, बल्कि इससे कई ज्यादा अधिक है. करवा चौथ का व्रत पति पत्नी के प्यार का त्योहार है, जिस तरह पाश्चात्य संस्कृति में प्रेम के प्रतीक स्वरूप वेलेंटाईन डे मनाया जाता है उसी तरह हमारी संस्कृति में करवा चौथ का त्योहार बड़े उत्साह से समारोह पूर्वक मनाया जाता है। पति-पत्नी का रिश्ता बड़ा ही पवित्र रिश्ता होता है और इस रिश्ते में प्रेम का होना जरूरी है, करवा चौथ जैसे पर्व इस आपसी प्रेम को और प्रगाढ़ और समृद्ध बनाते हैं। कहते हैं जहाँ प्रेम होता है वहां ईश्वर होता है। और जब सच्चा प्यार होता है तो उस रिश्ते का एक अलग ही अलौकिक आनंद होता है।

नवयुवाओं की जानकारी हेतु बता देता हूँ कि “करवाचौथ” शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, ‘करवा’ यानी ‘मिट्टी का बरतन’ और ‘चौथ’ यानि ‘चतुर्थी’ इस पर्व का महत्व आसानी से समझाने के लिए एक पौराणिक कहानी सुनाई जाती है कि एक बार देवताओं और दानवों में युद्ध शुरू हो गया और उस युद्ध में देवताओं की हार हो रही थी, ऐसे में देवता ब्रह्मदेव के पास गए और रक्षा की प्रार्थना की। ब्रह्मदेव ने कहा कि इस संकट से बचने के लिए सभी देवताओं की पत्नियों को अपने-अपने पतियों के लिए व्रत रखना चाहिए और सच्चे दिल से उनकी विजय के लिए प्रार्थना करनी चाहिए और ऐसा करने पर निश्चित ही इस युद्ध में देवताओं की जीत होगी। ब्रह्मदेव के इस सुझाव को सभी देवताओं और उनकी पत्नियों ने खुशी-खुशी स्वीकार किया। ब्रह्मदेव के कहे अनुसार कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन सभी देवताओं की पत्नियों ने व्रत रखा और अपने पतियों यानी देवताओं की विजय के लिए प्रार्थना की। उनकी यह प्रार्थना स्वीकार हुई और युद्ध में देवताओं की जीत हुई। इस खुशखबरी को सुन कर सभी देव पत्नियों ने अपना व्रत खोला और खाना खाया। उस समय आकाश में चांद भी निकल आया था। परंपरागत रूप से यह माना जाता है कि इसी दिन से करवाचौथ के व्रत के परंपरा शुरू हुई।

असल में हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाएं या वे महिलाएं या वो बालिकायें जो मन ही मन किसी को अपना पति मान चुकी हैं, अपने पति या भावी पति की दीर्घायु की कामना के लिए करवा चौथ का व्रत रखती हैं यह पर्व कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी को मनाया जाता है इस व्रत में दिन भर उपवास रखकर रात में चन्द्रमा को अ‌र्घ्य देने के उपरांत ही भोजन करने का विधान है इस पर्व पर महिलाओ द्वारा रखा जाने वाला कठिन व्रत सुबह सूर्योदय के तुरंत पहले से शुरू होकर रात में चंद्रमा दर्शन के बाद संपूर्ण होता है, इतना कडा व्रत होने के बाद भी ग्रामीण स्त्रियों से लेकर आधुनिक महिलाओं तक सभी नारियाँ करवाचौथ का व्रत बडी़ श्रद्धा एवं उत्साह के साथ रखती हैं क्योंकि इससे उनके पति की लंबी उम्र की चाह जुड़ी है, एक तरह से करवाचौथ का त्योहार पति-पत्नी के मजबूत रिश्ते, प्यार और विश्वास का प्रतीक है। प्रेम की यह उत्कृष्ठ भावना वेलेंटाईन डे की उच्छृंखलता में कभी महसूस हो ही नही सकती।

करवा चौथ मनाने में स्थायित्व का भाव है तो वैलेंटाईन में चंचलता, करवा चौथ जिस व्यक्ति के लिए रखा जाता है, उम्र भर उसी के लिए रखा जाता है, उसके पात्र कभी बदलते नहीं हैं, वैलेंटाइन डे तो शादी से पहले एक अवसर के रूप में मनाया जाता है मौका या बेहतर ऑप्शन मिलते ही दोनों ही किसी और के साथ हो जाते हैं इसलिए यहा स्थायित्व का भाव तो होता नहीं, अगले वैलेंटाईन तक पात्र बदल जाते हैं।

करवा चौथ का पर्व चौखट पर है और आजकल प्रचलन में आ रही एक नवीन (तथाकथित आधुनिक) मानसिकता के चलते इस त्योहार का भी मजाक उड़ाया जाएगा, भांति भांति के चुट्कुले बनाए और प्रसारित किए जाएँगे कुल मिलाकर इस पर्व की धज्जिया उड़ाई जाएगी, हम भारतीयों को यह समझना होगा कि यह षड्यंत्रकारियों का हमारी अखंडता को खंडित करने का एक कुत्सित प्रयास है और आधुनिकता के नाम पर हम अनजाने में ही इसके शिकार बन रहे हैं भारतवर्ष को एक त्यौहारों का देश माना जाता है, मगर पिछले कुछ समय से धीरे धीरे त्यौहार,उत्सव, पर्व अपना सामाजिक महत्व खोकर ख़त्म होने की कगार पर आ रहे हैं 1947 में स्वराज्य मिलने के बाद हमारी यह जिम्मेदारी बनती थी कि लॉर्ड मैकाले द्वारा हम पर लादे गए पाठ्यक्रम को रद्द कर एक पूर्ण स्वदेशी, सम्पूर्ण रूप से भारतीय एकात्म मानवता में विश्वास रखने वाले पाठ्यक्रम की रचना की जाती मगर यह हमारा दुर्भाग्य रहा कि स्वतन्त्रता मिलने के बाद शिक्षा व्यवस्था उन्ही लोगों के हाथ में आ गयी जो ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था में पले बढे थे और उन्होने अंग्रेज़ो द्वारा रचित भारतीयता से विमुख करने वाली शिक्षा प्रणाली को जारी रखा और इसके फलस्वरूप आजाद हिंदुस्तान में जन्मे हमारे बच्चों ने भी अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली में ही शिक्षा प्राप्त की जिसका परिणाम यह हुआ कि वह अपने धर्म, संस्कृति, परम्पराओं इत्यादि को गलत मानने लगे और देश के प्रति हीनभावना से ग्रस्त हो देश से पलायन को अपना ध्येय बनाने लगे बच्चों का दिमाग अंग्रेजों की तरह सोचने लगा तथा वह भारत से दूर होते चले गए, कुछ विघटनकारी ताकतों द्वारा बातों को कुछ इस तरह तर्कपूर्ण ढंग से रखा जाता है कि भारतीय भी अपने धर्म और त्योहारों से कोसने लगे हैं | अब कहा जायेगा कि करवाचौथ पर भूखा रहना महिलाओं पर अत्याचार है, जैसे ही करवा चौथ आने वाला होता है एक सप्ताह पहले यह लोग अचानक से नारीवादी होने लगते है |

असल में इतिहास में कभी कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं हैं, उनके उपलक्ष्य में ही हम आज त्यौहार मनाते हैं। हम क्रिसमस मनाते हैं क्योंकि उस दिन कुछ महत्वपूर्ण बात हुयी थी। लोग ईद मनाते हैं क्योंकि भूतकाल में उसी दिन कुछ अच्छा हुआ था। इस प्रकार हम प्रत्येक उत्सव मनाते हैं। हर त्योहार के पीछे कोई कहानी है या फिर उसका कोई ज्योतिषी महत्व है। श्री श्री कहते हैं उत्सव मनाईये ! अब उत्सव मनाने का कोई भी बहाना हो! उपवास करिए और फिर अच्छा भोजन करके उत्सव मनाईये। यही तो जीवन है! जब आप व्रत रखते हैं, तब आपका पूरा शरीर शुद्ध हो जाता है। जब शरीर में से विषैले पदार्थ निकल जाते हैं, तब मन तीक्ष्ण होता है। ऐसी अवस्था में आप जो भी इच्छा करते हैं या जिस भी लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं, वह पूरा होता है। यह श्रद्धा है, नियम भी है और इसका वैज्ञानिक आधार भी है। लेकिन व्रत के साथ-साथ आपको मन की संकल्प शक्ति को भी बढ़ाना होगा। करवा चौथ के पूरे दिन, आपके मन में बस एक ही इच्छा रहती है कि आपके पति या पत्नी का कल्याण हो। पुराने दिनों में, लोग केवल इसी एक इच्छा के साथ व्रत करते थे। ये और कुछ नहीं केवल हमारे मन की शक्ति है। लेकिन यदि आपका मन कहीं और है और आप केवल भोजन नहीं कर रहे हैं, तब उसका उतना फायदा नहीं होगा। हाँ, शरीर को आराम ज़रूर मिल जाएगा।

मुझे यह देखकर हैरानी होती है कि कुछ लोग हमारी प्राचीन परम्पराओं के विरोध को ही प्रगतिशील होने का प्रमाण मानते हैं जबकि प्रगतिशील होने का अर्थ है – यथार्थवादी होना, सच्चाई को मन से स्वीकार करना, भारतीय समाज में उत्साह से मनाई जाने वाली करवा चौथ के शुभ अवसर पर पुरे सोशल मिडिया पर इस पुनीत पावन पवित्र त्योहार को लेकर लिजलिजी मानसिकता वाले चुटकुलों की भरमार है, और मैं बड़े दुख के साथ देख रहा हूँ कि अधिकांश लोग (स्त्री और पुरुष दोनों) उनको बड़े चाव से आनन्दित होकर शेयर भी कर रहे हैं, क्या यह एक नैतिक या उचित बर्ताव है ? ध्यान रखिये यही शिक्षा हमारी आगामी पीढी हमसे ग्रहण कर रही है ।

रात और दिन जो स्त्री एक पत्नि, बहिन, माँ, भाभी जैसे अलग अलग रूप में आकर व्यक्ति के जीवन में हर मोड़ पर साथ निभाती है । जो नारी कितनी उम्मीदे, कितनी ख्वाहिशे और कितने सपनों का गला घोंट कर अपनों को छोड़ कर परायो को भी अपना बना लेती है उसकी आस्था का सरे आम उपहास उड़ा कर उसे एक मजाक बना कर रख दिया जाता है,जहाँ नारी हो वहां देवता निवास करते हैं, ऐसी महान परंपरा का निर्वाह करने वालों के देश में एक पवित्र त्योहार जिसमें आपके दीर्घकालिक जीवन हेतु प्रार्थना की जाती है ऐसे महत्वपूर्ण इस त्योहार की ऐसी दुर्गति वो भी हमारे ही हाथों, यह व्यवहार निंदनीय होकर अस्वीकार्य होना चाहिए, इसका कड़ा विरोध कर हमारी परंपरागत आस्था का समुचित सम्मान करना चाहिए ।

कृपया यह समझे कि भारतीय परम्पराओं, त्योहारों, पर्वों का मजाक उड़ाना एक गलत बात है और हम सब भारतीयों को इस गलत बात को ठीक करने में अपनी प्र्भावी भूमिका निभाइए, सोशल मीडिया पर अगर कोई त्योहारों का मजाक बनाए तो उसे फॉरवर्ड करने की बजाय वहीं पर रोकने का प्रयास करे

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