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जब सत्य बाबा के सामने एक हिंदी नाटक का मंचन किया गया

सत्यनारायण व्यास

बम्बई विश्वविद्यालय के कन्नडभाषी वरिष्ठ प्रोफेसर भारद्वाज रंगकर्म में भी काफी रुचि रखते थे।1978 की गर्मियों में कालीना स्थित विश्वविधालय की आवासीय कालोनी में अपने घर पर उन्होंने एक महीने की नाट्य वर्कशाप का आयोजन किया।मुझे मेरे एक मित्र से इसकी सूचना मिली तो मैं इस वर्कशाप में शरीक होने कालीना पहुँच गया।वर्कशाप एक महीने चली,मुख्यतः केवल थ्योरी पर आधारित इसमें सारे लेक्चर अंग्रेजी में ही होते थे।वर्कशाप के आखिर में एक अंग्रेजी नाटक-Business As Usual नरीमन पाइंट स्थित NCPA के सभाग्रह में मई 78 में मंचित किया गया।इस नाटक में मेरी दो भूमिकाएं थी।नाटक काफ़ी सराहा गया।
बम्बई हिंदी विद्यापीठ एक बड़ी सम्माननीय संस्था थी।मैं वहाँ जाता रहता था।वहाँ कार्यरत कुछ सदस्यों ने डॉ. शंकर शेष के नाटक-एक और द्रोणाचार्य को मंचित करने की योजना बनाई।मुझे उन्होंने इस नाटक में अश्वत्थामा की भूमिका के लिए चुना।लगभग एक महीने की सघन रिहर्सल के बाद नाटक का मंचन जनवरी 85 में बम्बई के मशहूर रंगभवन के ओपन सभाग्रह में हुआ।इस नाटक ने भी बहुत प्रशंसा पाई।इसी संस्था ने सितम्बर 85 में एक एकांकी प्रतियोगिता भी आयोजित की,जिसमें मैने अपने नाट्य दल-मंचन की ओर से एकांकी-“नाटक नहीं”का मंचन किया।इस नाटक को प्रतियोगिता में बेस्ट नाटक का पुरस्कार मिला।
कुछ मित्रों से ज्ञात हुआ कि बम्बई में एक नई नाट्य संस्था-मुखौटा का गठन किया जा रहा है और वे अपने पहले नाटक के लिए कलाकार ढूंढ रहे हैं।मरीन लाइंस के पास एक स्कूल के हॉल में इस नाटक की रिहर्सल चल रही थी।मैं पहुँचा तो निर्देशक महोदय खुश हो गए।नाटक था-सुबह के इंतज़ार में खूब रिहर्सल के पश्चात जून 85 में माटुंगा स्थित कर्नाटक संघ हॉल में इसका प्रदर्शन हुआ।दूसरे दिन स्थानीय नवभारत टाइम्स में नाटक की समीक्षा छपी जिसमें मेरे नाम का विशेष उल्लेख किया गया था।
पुट्टपुर्ती के विख्यात श्री सत्य साई बाबा का बम्बई के अंधेरी में एक विशाल आश्रम था जिसे धर्मछेत्र कहा जाता था।सत्य साई बाबा के कई भक्त हमारी कालोनी में थे जो घर में उनकी फोटो की रोज़ पूजा करते थे और उन्हें भगवान का दर्जा देते थे।भक्तगण बताते थे कि सत्य साई बाबा के फोटो से भभूत झरती है।ऐसे ही एक भक्त से ज्ञात हुआ कि सत्य साई बाबा बम्बई आने वाले है और इस अवसर पर उनके सम्मुख एक हिंदी नाटक का मंचन भी करने की योजना है।वे लोग कुछ कलाकारों की खोज कर रहे हैं।दूसरे दिन मैं धर्मछेत्र पहुँच कर उनसे मिला।उन्होंने तुरंत ही मुझे नाटक में मुख्य भूमिका के लिए चुन लिया।नाटक की रिहर्सल जोरों से शुरू हुई।13 मई 84 को बाबा के आने का दिन निश्चित हो गया।उस दिन धर्मछेत्र का नज़ारा देखने लायक था।सुबह से ही सैकड़ों बसों,कारों व अन्य वाहनों में भर-भर कर लोग आने लगे।चारों ओर विशाल जनसमूह,लेकिन पिन ड्राप साइलेन्स।कहीं कोई जरा भी आवाज़ नहीं।लोग आते गए,जहाँ जगह मिली बैठते गए।विशाल जनसमूह के बीचोंबीच एक रेड कार्पेट बिछी थी जिस पर चलते हुए बाबा भक्तों के बीच पहुँचने वाले थे।सब भक्तों की नजरें उस ओर लगी थी जिधर से बाबा आने वाले थे।निश्चित समय पर बाबा प्रकट हुए,और मंद-मंद स्मित बिखेरते हुए रेड कार्पेट पर चल कर भक्तों के बीच घूमने लगे।वह एक अविस्मरणीय दृश्य था।किसी की आंखों से आंसू बह रहे है,कोई भाव-विभोर अपलक ताके जा रहा है,कोई मन ही मन बुदबुदाते हुए प्रणाम कर रहा है।थोड़ी देर भक्तों के बीच बिताने के बाद बाबा अंदर कमरे में आए जहाँ हम लोग नाटक के मंचन की तैयारियों में लगे थे।उन्होंने हम सब की ओर प्रेम से देखा,आशीर्वाद दिया और फिर प्रवचन के लिए हॉल में पहुँच गए।धाराप्रवाह फर्राटेदार तेलुगु में उनका प्रवचन प्रारम्भ हुआ।वे खड़े खड़े ही प्रवचन दे रहे थे,उनके समीप ही दूसरे माइक पर एक व्यक्ति हाथोंहाथ अंग्रेजी में उनके प्रवचन का अनुवाद कर रहा था।प्रवचन की आवाज़ हमारे ग्रीनरूम में भी आ रही थी।अपने प्रवचन में बाबा वेदों,पुराणों और तमाम दूसरे धार्मिक ग्रन्थों से धड़ाधड़ उध्दरण दिए जा रहे थे।मैं उनकी विद्वत्ता और आशु वक्र्त्ता को देखकर दंग रह गया।प्रवचन के बाद नाटक प्रारम्भ हुआ।हज्जारों की भीड़ ने शांतिपूर्वक नाटक को देखा।नाटक समाप्त होने पर बाबा स्टेज पर आए और कलाकारों के साथ फ़ोटो खिंचाया।यह एक अविस्मरणीय अनुभव रहा।