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युवराजसिंह ने कैसे दी मौत को मात

दिलीप गुप्ते

युवराज सिंह की ज़िंदगी में पहले दो ‘सी’ थे. चंडीगढ़ और क्रिकेट. ज़िंदगी मज़े में बीत रही थी. भारतीय टीम में ऑलराउंडर की हैसियत हासिल हो चुकी थी.२०११ के वर्ल्ड कप में मैन ऑफ़ सिरीज़ का ताज पहन चुके थे. अचानक तीसरे ‘सी’ ने दस्तक दी. जानलेवा ‘सी’ – कैंसर. फिर वे ठहाके,
बेफ़िक्री, आउटिंग, महफ़िलें अचानक ड्रिंक के ब्रेक जैसे थम गए. एक ओवर में छह छक्के मारने वाले के लिये यह उम्र का टारगेट हासिल करने के लिए कड़ी चुनौती थी. लेकिन युवराज बचपन से ही लड़ाकू रहे हैं. धक्का तो लगा, लेकिन खेल की दुनिया में नाम कमाने वाले के लिये यह “आजा, दम हो तो” वाली ललकार थी. अपने संस्मरणों को युवी ने अपनी किताब ‘द टेस्ट ऑफ़ माय लाइफ’ में विस्तार से लिखा है.
युवी लिखते हैं कि उन्हें क्लास रूम में बैठने से ज्यादा मज़ा मैदान में आता था. अपने आदर्श पुरूष बोरस बेकर की तरह वे भी टेनिस खेलने लगे. हार पर रैकेट भी तोड़ते थे. उन्होंने ‘मेहंदी सजा दी’ और ‘सरदारा’ में बाल भूमिका निभाई थी. पिता योगराज सिंह का क्रिकेट अनुभव अच्छा नहीं था. युवी का खेल प्रेम देख कर उन्होंने छह दिन टेनिस और एक दिन क्रिकेट खेलने की इजाज़त दी, जो बाद में उलट दी गई. बिशन सिंह बेदी और नवजोत सिंह से ट्रेनिंग ली. अपनी आत्मकथा में युवी लिखते हैं कि जब उन्होंने स्केटिंग प्रतियोगिता में पहला आने पर मिला गोल्ड मेडल पिता को दिखाया तो उन्होंने वह फेंक दिया, यह कह कर कि यह तो लड़कियों का खेल है. युवी ने अपने माता पिता के तनाव भरे संबंधों के बारे में भी लिखा है. पिता युवी के क्रिकेट प्रेम से चिढ़ते थे. जाड़े की सुबह उन्हें ठंडा पानी डाल कर उठाते थे और बहुत दौड़ाते थे. यह सज़ा युवी के लिये वरदान साबित हुई.
क्रिकेटरों का और चोटों का हाथ और दस्ताने जैसा संबंध है. युवि भी अपवाद नहीं रहे. कई बार वे पैड-ग्लव्ज की जगह प्लास्टर में नज़र आते तो कभी मैदान में उल्टियाँ करते रहते. अंपायर भी चिंता में पड़ जाते, लेकिन वे परवाह नहीं करते. बस, एक बार ख़ून की उल्टी क्या हुई सब कुछ बदल गया. उन्हें अपना भविष्य अंधकार में लगने लगा. उन्हें लगा कि अब बल्ले और गेंद से इतने साल का साथ छूट जाएगा. डेंगू, मलेरिया वग़ैरह दस्तक देते ही रहते. इलाज के दौरान वे दिन भर में ५० गोलियाँ निगलते थे. एक्युपंक्चर इलाज के दौरान उनके शरीर में कई सुइयाँ चुभी रहतीं. जब ऑपरेशन के पहले नर्स उन्हें कीमोथेरेपी के साइड इफ़ेक्ट बताने शुरू किये. लीवर, किडनी आदि को गहरा नुक़सान होगा, शायद फर्टिलिटी पर भी उल्टा प्रभाव पड़ सकता है. नर्स आगे नहीं पढ़ पाई. युवि ने बिना देखे साइन कर दिये. जब युवि अपने इलाज के दिनों की बात करते हैं तो उनकी बहादुरी को सलाम करना ही पड़ता है. ऑपरेशन के बाद वे इतने कमज़ोर हो गए थे कि चलते समय लड़खड़ाने लगे. यह वह निराशा का दौर था जब स्टेडियम का शोर,टीवी मुलाक़ातें सब ख़त्म हो गए. उन्हें लगा कि यह उनकी ज़िंदगी का आख़िरी ओवर है और टारगेट असंभव सा है. लेकिन छह गेंदों पर छह छक्के जड़ने वाले युवि ने यह संभवकर दिखाया.
ऐसा भी नहीं है कि युवि विवादों में नहीं रहे. लूसिया के पब झगड़े को मीडिया ने बढ़ा चढ़ा कर बताया गया. बीमारी के कारण खेल से दूर रहने को मीडिया ने यह कह कर प्रचारित किया कि युवि जूनियर खिलाड़ी सुरेश रैना के अंडर नहीं खेलना चाहते. ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों की ओर से किये जाने वाले व्यवहार को वे खुद को स्ट्रॉंग बनाने का तरीक़ा बताते हैं और खुद ने ऑस्ट्रेलिया पर यही तरकीब आज़माई.
अपनी जानलेवा बीमारी के दिनों मदद करने वालों का युवि ने आभार माना है. यह किताब किसी मोटिवेशनल नोट से कम नहीं है.