इस रात की किरणों को रावण अपनी नाभि पर करता था ग्रहण, जानिए वैज्ञानिक तथ्य

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in the night of Sharad Purnima,moon rays are a special boon for us

वैज्ञानिक तथ्यों के अध्ययन अनुसार शरद पूर्णिमा पर औषधियों की क्षमता अधिक होती है। दशानन रावण शरद पूर्णिमा की रात किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि पर ग्रहण करता था। इस प्रक्रिया से उसे पुनर्योवन शक्ति प्राप्त होती थी। चांदनी रात में 10 से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच चन्द्र प्रकाश में कम वस्त्रों में बैठने वाले व्यक्ति को ऊर्जा प्राप्त होती है।

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ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है। यह परंपरा पूरी तरह विज्ञान पर आधारित है। वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है। यह तत्व किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है। चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है।

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चांदी में प्रतिरोधकता अधिक होती है। इससे विषाणु दूर रहते हैं। शोध के अनुसार खीर को चांदी के पात्र में सेवन करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 30 मिनट तक शरद पूर्णिमा का स्नान करना चाहिए। रात्रि 10 से 12 बजे तक का समय उपयुक्त रहता है।

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शरद पूर्णिमा की रात दमा रोगियों के लिए एक खास वरदान होती है।रात्रि में दिव्य औषधि को खीर में मिलाकर उसे चांदनी रात में रखकर प्रात: 4 बजे सेवन किया जाता है। रोगी को रात्रि जागरण करना चाहिए और औ‍षधि लेने के बाद 2-3 किमी पैदल चलना आवश्यक रहता है।

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