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HMD ने भारत की पहली ‘‘भारत में निर्मित‘‘, अग्रणी डिस्पोवैन इन्सुलिन पेन नीडल की शुरुआत की

Posted on: 26 May 2018 10:06 by Ravindra Singh Rana
HMD ने भारत की पहली ‘‘भारत में निर्मित‘‘, अग्रणी डिस्पोवैन इन्सुलिन पेन नीडल की शुरुआत की

नई दिल्ली: हिंदुस्तान सिरिन्जेस एंड मेडिकल डिवाइसेज़ (एचएमडी) दुनिया में डिस्पोज़ेबल सिरिंज के सबसे बड़े निर्माताओं में से एक है और आॅटो डिसेबल सिरिंज के लिए सबसे बड़े निर्माता ने चौथे मेडिकल एक्सपो, इंदौर, 2018 में मधुमेह से पीड़ित लोगों को बेहतर आराम प्रदान करने के लिए आज सबसे अधिक क्रांतिकारी और अग्रणी, भारत की पहली ‘‘मेड इन इंडिया‘‘ डिस्पोवैन इन्सुलिन पेन नीडल का उद्घाटन किया है।

डिस्पोवैन इन्सुलिन पेन नीडल सबसे सटीक डिज़ाइन की गई, अभी तक की किफायती जीवाणुरहित एकल उपयोग वाली पेन नीडल है, जोकि इन्सुलिन पेन के सभी अंतरराष्ट्रीय ब्रान्डों पर सार्वभौमिक रूप से उपयुक्त हो सकती है।

बेहतर त्वचा संपर्क और पकड़, अतिरिक्त पतली दीवार, बहु-स्तरीय, पतला बिंदु, डिस्पोवन इन्सुलिन पेन नीडल के लिए एर्गोनाॅमिक आकार जैसी सुविधाओं के साथ एचएमडी द्वारा डिज़ाइन और निर्मित की गई है ताकि मधुमेह रोगियों के लिए बहुत कम दर्द वाले इंजेक्शन का अनुभव प्रदान किया जा सके।

हिंदुस्तान सिरिंजेस एंड मेडिकल डिवाइसेज़ (एचएमडी) के संयुक्त प्रबंध निदेशक, श्री. राजीव नाथ के अनुसार, ‘‘हम अपनी नवीन पेशकश ‘‘डिस्पोवैन इन्सुलिन पेन नीडल‘‘ की संभावनाओं के बारे में विशेष तौर पर उत्साहित हैं, जिसेे हमारी अत्याधुनिक विनिर्माण सुविधा में निर्मित किया गया है, जोकि भारत की आयात निर्भरता और बीडी के एकाधिकार को खत्म करेगा। मरीज़ की अब किफायती गुणवत्तापूर्ण उत्पाद तक पहुँच हो पाएगी, जिसकी उन्हें दोबारा इस्तेेमाल करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि यह महंगा है। हमें बेहतरीन प्रतिक्रिया और उपयोगकर्ताओं से आरामदायक इंजेक्शन की क्लिनिकल स्वीकृति मिली है और हमें खुशी है कि अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी में हमारा निवेश हमें प्रतिस्पर्धी बढ़त दे रहा है।‘‘

एचएमडी की मार्केटिंग के मुख्य महा प्रबंधक, श्री. प्रदीप सरीन ने कहा ‘‘डिस्पोवैन इन्सुलिन पेन नीडल’’ की शुरुआत के साथ हम भारत के लोगों को सस्ती स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने की अपनी प्रतिबद्धता में योगदान देंगे।

“पेन नीडल के पुर्नउपयोग क्यों” पर उन्होंने चुटकी ली, “डिस्पोवैन एक बार उपयोग को सस्ता कब बनाता है? इन्सुलिन पेन नीडल का पुर्नउपयोग निम्न परेशानियों को बढ़ा सकता हैः

नीडल पर बैक्टीरिया की वृद्धि – इन्जेक्ट होने का खतरा
इन्जेक्ट करने के दौरान दर्द का अनुभव
लिपोहाइपरट्रॉफी (लंपी स्कीन) पैदा होना
नीडल के नुकीले हिस्से के टूटने का खतरा
उन्होंने सलाह दी कि, ‘‘हर बार पुर्नउपयोग से उपर्युक्त स्थितियों का खतरा बढ़ता है।’’

डिस्पोवैन इन्सुलिन पेन नीडल का उत्पादन एचएमडी के फरीदाबाद-बल्लभगढ़ प्लांट में होता है। नया प्लांट 5.5 एकड़ में फैला हुआ है और इसके ‘डिस्पोवैन इन्सुलिन पेन नीडल’ के 10 करोड़ यूनिट प्रति वर्ष उत्पादन की क्षमता होगी, जोकि इस नई तकनीक के निर्यात और घरेलू स्तर पर बढ़ती मांग की पूर्ति करेगा। उन्होंने कहा कि प्रत्येक नीडल पाॅइन्ट की खराबियों की जाँच डिजिटल विज़न कैमरा सिस्टम से ऑनलाइन की जाती है और जोकि नीडल खराब होते हैं और जिससे ज़्यादा दर्द होता है, वे अपने आप खारिज हो जाते हैं। हम ड्राई सिलिकाॅन कोटिंग का उपयोग करते हैं ताकि नीडल की सतह चिकनी हो और इन्जेक्शन लगाते के समय आराम महसूस हो सके।

डिस्पोवैन इन्सुलिन पेन नीडल में 5एमएम और 4एमएम सुई की लंबाई के साथ 31जी और 32जी माप की सुई क्रमशः होती है और सुई के आकार की सही पहचान के लिए यह बैंगनी और हरे रंग में आती है।

बैक्टन, डिकिनसन एंड कम्पनी (बीडी) पैन नीडल की कीमत रु.14 एमआरपी है, जबकि एचएमडी ने अपने डिस्पोवैन पैन नीडल की प्रारंभिक एमआरपी रु.12 रखी है। डिस्पोवैन पैन नीडल रोगियों के लिए अन्य आयातित पैन नीडल की तुलना में न्यूनतम 15% सस्ते हैं। आयात की कीमतें, जोकि अस्थिर हैं और कभी भी बदलने वाली विनियम दर और भारतीय रुपए के तेज़ी से गिरावट से जुड़ी हैं, के तुलना में भारत में बने उत्पादों में पेक्षाकृत स्थिर मूल्य निर्धारण होता है।

भारत में डायबिटीज के बारे मेंः  डायबिटीज़ विश्व में सबसे ज़्यादा होने वाले रोगों में से एक है। यह एक ऐसी चिकित्सा स्थिति है, जोकि टाइप- l रोग के मामले में अग्नाशय से निकलने वाले इन्सुलिन हार्मोन के कम उत्पादन एवं कम स्राव के कारण और टाइप- ll   के मामले में शरीर द्वारा इन्सुलिन का सही उपयोग न कर पाने के कारण होती है। शरीर की सामान्य स्थितियों के अंतर्गत रक्त में शर्करा के स्तर को इन्सुलिन, अग्नाशय द्वारा उत्पन्न एक हार्मोन, द्वारा नियंत्रित किया जाता है। जब रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ता है (उदाहरण के लिए, खाना खाने के बाद), अग्नाशय से उत्पन्न इन्सुलिन शर्करा के स्तर को सामान्य करता है। डायबिटीज़ के रोगियों में इन्सुलिन हार्मोन के पर्याप्त मात्रा में उत्पन्न न होने से यह हाइपरग्लाइसीमिया का कारण बनता है।

डायबिटीज़ एक क्रोनिक मेडिकल स्थिति है, अर्थात, जीवनशैली में परिवर्तन करके सामान्य स्तर पर बनाए रखा जा सकता है और इसे प्रारंभिक चरणों में दवाईयों के माध्यम से भी नियंत्रित किया जा सकता है और अग्रिम चरणों में बाहर से इन्सुलिन को इन्जेक्शन देकर सभी नियंत्रित किया जा सकता है।

यह अनुमान है कि वर्ष 2025 तक विश्व भर में लगभग 300 मिलियन लोग इस रोग से प्रभावित होंगे। भारत में, लगभग 50.9 मिलियन लोग डायबिटीज़ से ग्रस्त हैं और यह आँकड़ा वर्ष 2025 तक 80 मिलियन तक पहुँचने का अनुमान है, जोकि इसे विश्व का “डायबिटीज़ कैपिटल” बना देगा। केवल दिल्ली में ही यह अनुमान है कि इस रोग से लगभग 29.8 लाख लोग प्रभावित हैं (इन्डो-यूएस संयुक्त अध्ययन)।

 

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