राकेश अचल

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में तीन दिन का [ 6 से 8 अक्टूबर ] बुंदेली समागम हो रहा है ,ये आयोजन भावनात्मक आयोजन है .इसमें बुंदेली खान-पान,गीत -संगीत और संस्कृति की बात होगी ,यानि ये सम्मेलन एक अराजनीतिक सम्मेलन है ,लेकिन मेरी मंशा थी कि इस सम्मेलन के जरिये एक बार फिर से पृथक बुंदेलखंड की भी बात की जाती . बुंदेलखंड दो पाटों के बीच पिसता गेंहूं जैसा भू-भाग है. आधा मध्यप्रदेश में और आधा उत्तर प्रदेश में,शायद इसीलिए इसके प्रति किसी भी प्रदेश की सरकार उत्तरदायी नहीं है .

आजादी के 75 साल बाद भी बुंदेलखंड के भाग्य नहीं जागे हैं.,हालाँकि कहने को इन वर्षों में इस इलाके का तथाकथित विकास हुआ है ,लेकिन इस विकास का फायदा यहां के निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों के अलावा किसी को नहीं मिला .इन सात दशकों में पृथक बुंदेलखंड की मांग भी लगातार की गयी किन्तु ये मांग अपनी पूरी तुरा के साथ सामने न आने से आजतक पूरी नहीं की गयी .बुंदेलखंड को केवल फर्जी और अल्पजीवी विकास प्राधिकार बनाकर भला दिया गया .
राज्यों की सीमाएं आदिकाल से नदियां तय करती आयीं हैं.

इसीलिए बुंदेलखंड की सीमा को भी इन्हीं नदियों से रेखांकित किया गया. ‘ इत जमुना उत नर्मदा इत चंबल उत टोंस ‘ हर बुंदेलखंडी को याद है किन्तु देश के भाग्यविधाताओं को याद नहीं रहा,इसलिए एक पुराना गौरवशाली राज्य दो भागों में विभाजित होकर कहीं का न रहा .पृथक बुंदेलखंड की मांग को लेकर लड़ाइयां तमाम लड़ी गयीं किन्तु वे निर्णायक नहीं हो पायीं. राजनीति इस लड़ाई के आड़े आ गयी .आंदोलन एक हाथ से दूसरे हाथ में खिलौना बना रहा और अब एक तरह से सो गया है ,या मर गया है .

एक बुंदेलखंडी होने के नाते मुझे पृथक बुंदेलखंड आंदोलन की अकाल मौत हमेशा सालती रहती है .आज की पीढी के लिए तो लगता है की पृथक बुंदेलखंड की कोई जरूरत ही नहीं है. आज की पीढी के सभी दलों के नेता पृथक बुंदेलखंड की मांग को भूले से भी यद् नहीं करते .संयोग से मध्यप्रदेश में इस भूभाग की साध्वी उमा भारती मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री भी बनीं,केंद्र में इस इलाके से अनेक मंत्री केंद्र में भी बने और बिगड़े किन्तु एक ने भी पृथक बुंदेलखंड की मांग के लिए अपनी आवाज बुलंद नहीं की .

बुंदेलखंड की मांग को लेकर हमने भी अपनी युवावस्था में तमाम आंदोलन किये ,लेकिन कामयाबी हमसे कोसों दूर रही,क्योंकि इस आंदोलन के पीछे जनता तो थी किन्तु नेता नहीं थे .पृथक बुंदेलखंड के पास एक बार ही शंकर लाल मेहरोत्रा हाथ आये.बाद में जिन्होंने भी इस आंदोलन की कमान सम्हाली ,अपनी रोटियां सेंक कर चलते बने . बहरहाल मध्यप्रदेश के बुंदेली समागम के जरिये मै इस पुरानी मांग को दोहराना चाहता हूँ. हालांकि इस आयोजन से मेरा कोई सीधा रिश्ता नहीं है किन्तु मेरा आग्रह है कि आयोजक बुंदेली साहित्य,संस्कृति ,भाषा -भूषा के साथ ही पृथक बुंदेलखंड की मांग पर भी विचार करें .

बुंदेलखंड के पास आज की तारीख में एक से बढ़कर एक हुनरमंद लोग हैं ,वे यदि इस राजनीतिक मांग को उठायें,आगे आएं तो बात बन सकती है . दुर्भाग्य ये है कि आज बुंदेली राजनीति हासिये पर है. फिल्मों और धारावाहिकों ने बुंदेली जैसे सरस् बोली को मसखरी की भाषा बना दिया है. बुंदेली यानि दारोगा हप्पू सिंह की बोली,जबकि ये होना चाहिए थी आशुतोष राणा की बोली .बुंदेली को मसखरी की बोली बनाने से बुंदेलखंड का भला नहीं हुआ ,उलटे नुक्सान ही हुआ है .बुंदेले हरबोलों के मुंह से अब खूब लड़ी मर्दानी के बजाय आपको हप्पू सिंह की कहानी सुनना पड़ रही है,घुइयाँ छीलना पड़ रहीं हैं .बुंदेली का अतीत अपनी दुर्दशा पर ये सब देखकर आंसू बहता होगा .

बहरहाल बुंदेली समागम के आयोजकों के हौसले को सराहते हुए मै फिर कहना चाहता हूँ कि बुंदेलखंड को मरने से बचने कि भी बातें कि जाएँ .छत्रसाल से लेकर मधुकर शाह तक की बातें की जाएँ .अतीत से सबक और प्रेरणा दोनों ली जाये .यदि ऐसा न किया गया तो बुंदेलखंड से जैसे मुगल तानसेन को छीन ले गए,प्रवीन राय को ले गए वैसे ही आज की प्रतिभाओं को भी छीन लेंगे या उन्हें अपना बनाकर बुंदेलखंड को श्रीविहीन कर देंगे .अत: बुन्देलखंडिओ जागो और केंद्र सरकार से अपना गौरव वापस मांगों .अब आंदोलन की ताकत के साथ ही वोट की ताकत का इस्तेमाल करो। वोट की ताकत से ही अतीत में नये राज्य बने हैं और भविष्य में भी बनेंगे। जागो बुंदेलखंड,जागो