Breaking News

दलाई लामा दूसरों से अलग इसलिए हैं कि वे अपना पुनर्जन्म तय कर सकते हैं

Posted on: 28 Jan 2019 17:09 by Ravindra Singh Rana
दलाई लामा दूसरों से अलग इसलिए हैं कि वे अपना पुनर्जन्म तय कर सकते हैं

समुद्र तट से 16,000 फुट की ऊंचाई पर, देवताओं के पड़ोस में (तिब्बती मानते हैं कि उनके रक्षक देवता हिमालय की चोटियों पर रहते हैं। इसीलिए बीसवीं शताब्दी के शुरू में कई वर्षों तक उन्होंने हिमालय की चढ़ाई करने वाले दलों को वहां जाने की इजाजत नहीं दी थी।) तिब्बत का दुस्स्वप्र बीसवीं शताब्दी के साथ शुरू हुआ। पड़ोसी देश चीन में क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी और देर-सवेर इसका असर तिब्बत पर होना था।

शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि 1910 में तेरहवें दलाई लामा को भी चीनी आक्रमण के बाद देश छोडक़र भागना पड़ा था और उस समय उन्होंने ब्रिटिश भारत में शरण ली थी। दरअसल, उसी कृतज्ञता के कारण, अपने गहरे धार्मिक विश्वासों के बावजूद, उन्होंने ब्रिटिश भारत सरकार को तिब्बत की तरफ से माउंट एवरेस्ट चोटी पर चढऩे की इजाजत दी थी। तिब्बत पर 1910 का चीनी आक्रमण माचू सेनाओं द्वारा किया गया था, लेकिन अगले ही वर्ष चीन में प्रजातांत्रिक क्रांति के बाद मांचू सरकार का पतन हो गया और दलाई लामा को तिब्बत पर फिर से अधिकार मिल गया। यह विडंबना ही है कि एक क्रांति की विजय के कारण 1911 में तेरहवें दलाई लामा को तिब्बत वापस मिला और दूसरी क्रांति की लाल फौजों ने 1959 में, माओ के नेतृत्व में, तिब्बत को ग्रस लिया।

सन् 1911 तिब्बत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण वर्ष है। इस वर्ष तिब्बती संस्कार के साथ दो दुर्घटनाएं हुईं। एक, फौजी आतंक एक ठोस सत्य है और उससे बचा नहीं जा सकता। दूसरा, उनके धार्मिक विश्वासों से उदासीन एक और दुनिया भी है, जिसके साथ उन्हें तालमेल बिठाना पड़ेगा। तिब्बत अगर देखें तो बीसवीं सदी में सिर्फ अड़तालीस साल (1911 से 1959 तक) तिब्बत के जीवन में शांत रहे। इस बीच चीन और रूस में खूनी क्रांतियां हुई, दो महायुद्ध, यहूदियों का अभूतपूर्व नरसंहार हुआ, हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु बम गिरा। यह नहीं कि दूसरे महायुद्ध में बाहरी दुनिया-चीन, ब्रिटिश, भारत, अमेरिका-का तिब्बत पर दबाव नहीं पड़ा, लेकिन इसे संयोग कहें या सौभाग्य, तिब्बत इस प्रलय से अछूता रहा। शायद इसका एक कारण उस समय चौदहवें दलामा की छोटी उम्र भी रही हो।

(वह उस समय सात-आठ बरस के थे), जो भी हो, तिब्बत के इस निर्लिप्त भाव का परिणाम यह हुआ कि बाकी देशों से राजनीतिक, कूटनीतिक संबंधों के अभाव में 1959 में चीन ने तिब्बत का अधिग्रहण शुरू किया, किसी देश ने तिब्बत की सहायता नहीं की। लेकिन जैसा कि यहां शुरू में कहा गया था, यह लेख तिब्बत के नहीं, तिब्बतियों के बारे में है। दलाई लामा के नहीं, उनके न होने के बारे में है। तिब्बती मानते हैं कि जब तक दलाई लामा हैं, तिब्बत जिंदा रहेगा। उनका धार्मिक विश्वास कहता है कि मनुष्य होते हुए भी दलाई लामा दूसरों से अलग इसलिए हैं कि वह अपना पुनर्जन्म तय कर सकते हैं। यहां इस विश्वास का उल्लेख उसे वैज्ञानिक तर्क से खंडित करने के लिए नहीं है। पिछले दिनों दलाई लामा ने एक बयान में कहा कि उनके बाद कोई और दलाई लामा नहीं होगा।

तिब्बत छोडऩे के बाद दलाइ्र लामा यकीनन एक लंबा रास्ता पार कर आये हैं। एक धार्मिक-राजनीतिक सरकार की बजाय उन्होंने लोतांत्रिक ढंग से चुनी सरकार बनायी है। तिब्बतियों को ऐसा प्रावधान दिया है कि उनके प्रतिनिधि चाहें तो दो-तिहाई वोट के बाद दलाई लामा को पद से हटा सकें। उन्होंने हर संभव तरीके से अपनी सरकार को ‘लौकिक’ बनाया है, ताकि दुष्प्रचार से बच सकें। दलाई लामा को निकट से जानने वाले कहते हैं, वे अब भी हफ्तों ध्यान करने के लिए कमरे में बंद हो जाते, ताकि मानवीय संघर्ष के लिए वापस लौट सकें।

अहम यह नहीं है कि दलाई लामा के जीवनकाल मे तिब्बतियों को तिब्बत मिलेगा या नहीं। क्षोभजनक यह है कि हमारे युग की क्रूरता का यह अस्वीकार कहीं बुद्ध की आत्मा द्वारा लिया गया अस्वीकार तो नहीं है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीस वर्षों में, चीनी कब्जे के बाद 1.2 लाख तिब्बती जेलों और लेबर कैंपों में मारे गये हैं। तिब्बत में वहां के ६ लाख मूल तिब्बतियों को अल्पसंख्यक बनाने के अभियान में दूसरे क्षेत्रों से 7.5 लाख चीनी बसाये गये हैं। उन्हें नौकरी, मकान और शिक्षा के मामले में वरीयता दी जाती है। 6000 से ज्यादा बौद्धमठ गिरा दिये गये हैं। उनका कीमती सामान, जवाहरात, मणियां लूटकर ‘महान मातृभूमि’को भिजवायी गयी है। तिब्बतियों की सब प्रमुख लाइब्रेरियां नष्ट कर दी गयी है। प्राचीन धर्मग्रंथों के पन्नों को कम्युनिस्ट फौजियों के नहाने का पानी गर्म करने के लिए ईंधन बनाया गया है और उनकी बहुमूल्य जिल्दें निर्याय की गयी तिब्बती जनता भिक्षुओं, भिक्षुणियों की प्रताडऩा तो खैर आम बात रही है।

Latest News

Copyrights © Ghamasan.com