‘किस्मत’ भी नहीं दे रही कांग्रेस का साथ

कहावत है जब बुरा समय आता है तब अपने तो अपने, किस्मत भी साथ छोड़ देती है, कांग्रेस के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है।

दिनेश निगम ‘त्यागी’

कहावत है जब बुरा समय आता है तब अपने तो अपने, किस्मत भी साथ छोड़ देती है, कांग्रेस के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है। पहले नगर निगमों के चुनाव में उसके 7 महापौर जीत सकते थे लेकिन 5 पर ही संतोष करना पड़ा। उज्जैन और बुरहानपुर में वह जीतते-जीतते हार गई। इसी प्रकार जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में कांग्रेस की जीत का आंकड़ा 14-15 तक पहुंच सकता था लेकिन बमुश्किल 10 तक पहुंच सका। इसे बदकिश्मती ही कहेंगे कि कांग्रेस को तीन जिलों आगर, धार और उमरिया में भाजपा के बराबर वोट मिले।

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अब किस्मत को फैसला करना था। पर्ची डली या टॉस हुआ तो सभी जगह भाजपा ने बाजी मार ली। कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। इसी प्रकार भोपाल में कांग्रेस के सदस्य भाजपा से ज्यादा ही नहीं, बहुत ज्यादा थे, फिर भी कांग्रेस अपने सदस्यों को काबू में नहीं रख सकी। भाजपा ने कांग्रेस की सदस्य को प्रत्याशी बनाकर और टेंडर वोट डलवा कर हारी बाजी जीत ली। रतलाम में कांग्रेस प्रत्याशी के तीन वोट रद्द कर दिए गए और उसे पराजय का सामना करना पड़ा। बड़वानी में कांग्रेस के समर्थन से एक निर्दलीय ने जीत दर्ज कर ली। साफ है, यदि किस्मत साथ देती तो कांग्रेस की जीत का आंकड़ा कुछ और होता।

दिग्विजय की ‘जिजीविषा’ को देनी होगी ‘दाद’

‘जिजीविषा’ का मतलब ‘जीने की इच्छा’ के साथ ‘जीतने की इच्छा’ भी होता है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह लगभग 75 साल के हैं। रिटायर्ड होने की इस उम्र में उनके अंदर ‘जीने की इच्छा’ नजर आती है और ‘जीतने की’ भी। जिला पंचायत अध्यक्ष भोपाल के चुनाव के दौरान दिग्विजय ने जिस ‘जिजीविषा’ का परिचय दिया, उसे ‘दाद’ देना होगी। उनके जोश के सामने उनसे कम उम्र के पीसी शर्मा और आरिफ मसूद भी कहीं नहीं टिक रहे थे। स्थानीय चुनाव में आमतौर पर सत्तारूढ़ दल भारी पड़ता है।

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हुआ भी यही, भाजपा ने जीत दर्ज की, लेकिन दिग्विजय कांग्रेस के लिए जैसे भिड़ते नजर आए, दृश्य देखने लायक था। दिग्विजय पर टीआई की गिरेबान पकड़ने का आरोप चस्पा किया गया, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया था। एक मतदाता को लेकर पहुंची मंत्री, विधायक की गाड़ी और विधायक के अंदर जाने का उन्होंने सिर्फ विरोध किया था। पुलिस ताकत से उन्हें रोक रही थी। इसी दौरान एक शॉट निकाल कर उसे अलग रंग दे दिया गया। सवाल यह है कि क्या दिग्विजय जैसी ‘जिजीविषा’ का परिचय कांग्रेस का हर नेता, कार्यकर्ता नहीं दे सकता? यदि ऐसा हो जाए तो कांग्रेस का कुछ भला हो सकता है।

मलैया को रोकने भाजपा का कांग्रेस को समर्थन

राजनीति कितनी निराली है, इसका उदाहरण दमोह में जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में देखने को मिला। यहां भाजपा के प्रत्याशी को प्रस्तावक नहीं मिला, इस कारण उनका नामांकन ही निरस्त हो गया। भाजपा यहां जयंत मलैया के नाम से जानी जाती रही है। अब मलैया लूपलाइन में हैं। भाजपा में उन्हें तवज्जो नहीं मिल रही। उनके बेटे सिद्धार्थ मलैया ने भाजपा छोड़ दी है। वे किसी दल से नाता जोड़े बगैर अपनी अलग राजनीति कर रहे हैं। सिद्धार्थ ने जिला, जनपद और निकाय चुनाव में अपने अलग प्रत्याशी मैदान में उतारे, उनमें से कई जीते भी।

भाजपा प्रत्याशी का नामांकन निरस्त होने के बाद जिला पंचायत में मुकाबला मलैया एवं कांग्रेस के उम्मीदवार के बीच था। विडंबना देखिए, मलैया ताकतवर न हो जाएं, इसलिए दमोह में भाजपा ने कांग्रेस प्रत्याशी का समर्थन कर दिया। कांग्रेस जीत भी गई। साफ है, अब भाजपा मलैया को किसी भी हालत में स्वीकार करने तैयार नहीं है। नगरीय निकाय के चुनाव में भी सिद्धार्थ के 5 पार्षद जीते हैं। दमोह नगर पालिका अध्यक्ष के चुनाव में भी त्रिकोणीय मुकाबले के आसार हैं। देखना होगा कि इस चुनाव में राजनीति किस करवट बैठती है और कौन किस पाले में खड़ा नजर आता है? हालांकि मलैया से जुड़े एक कालेज की जांच से सुलह के रास्ते बंद होते दिख रहे हैं।

भाजपा में ऐसे सत्ता का सुख भोगेगा ‘परिवारवाद’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित भाजपा के तमाम नेता अन्य पार्टियों को परिवारवाद के मसले पर कोसने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। भाजपा नेतृत्व ने लोकसभा एवं विधानसभा के चुनाव में इसके तहत नेताओं के परिजनों को टिकट नहीं दिए। लेकिन भाजपा नेताओं ने परिवारवाद से बचने पीछे का एक दरवाजा ढूंढ़ निकाला है। यह है पंचायती राज। प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायतों के चुनाव गैरदलीय आधार पर होते हैं। जिला एवं जनपद पंचायतों के अध्यक्ष किसी सांसद और विधायक से कम ताकत नहीं रखते।

लिहाजा, नेताओं ने अपने परिजनों को सत्ता का स्वाद चखाने के लिए पंचायतों के चुनाव में खड़ा कर पार्टी के वोटों की दम पर जीतने का रास्ता ढूंढ़ा है। अभी हुए पंचायत चुनावों में ही सागर में मंत्री गोविंद सिंह के भाई हीरा सिंह राजपूत जिला पंचायत अध्यक्ष बन गए, भतीजे की पत्नी राहतगढ़ में जनपद उपाध्यक्ष बन गईं और एक भतीजा जिला पंचायत सदस्य का चुनाव हार गया। दूसरे मंत्री भूपेंद्र सिंह के भतीजे की पत्नी सागर जनपद अध्यक्ष बन गईं। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के भतीजे विधायक राहुल लोधी की पत्नी टीकमगढ़ जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जीत गईं। ऐसे तमाम उदाहरण हैं। सवाल है कि क्या भाजपा का परिवारवाद केवल विधानसभा और लोकसभा चुनाव तक सीमित है?

टेंडर वोट: उज्जैन में हार, भोपाल में दिलाई जीत

‘टेंडर वोट’ पंचायत चुनाव में कमाल कर रहा है। उज्जैन में नगर पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री मोहन यादव ने ‘टेंडर वोट’ के जरिए भाजपा प्रत्याशी को जिताने की कोशिश की लेकिन कांग्रेस के विरोध के चलते वहां मौजूद निर्वाचन अधिकारी ने ऐसे वोट डालने की अनुमति नहीं दी। नतीजा, मोहन यादव का प्रत्याशी हार गया। इसके बाद वहां काफी बवाल हुआ और मंत्री यादव ने आग लग जाने तक की धमकी दे डाली। वहीं भोपाल जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में निर्वाचन अधिकारी ने भाजपा को ‘टेंडर वोट’ डालने की अनुमति दे दी।

इसके बाद भाजपा का प्रत्याशी जीत गया। इस तरह निर्वाचन आयोग ने एक तरह के मामले में दो तरह का रवैया अपनाया। उज्जैन में कांग्रेस द्वारा कहा गया था कि सदस्य वोट डालने में सक्षम हैं तो ‘टेंडर वोट’ क्यों? लिहाजा वहां अनुमति नहीं मिली। भोपाल में भी कांग्रेस ने यही आपत्ति दर्ज कराई, लेकिन यहां ‘टेंडर वोट’ डालने की अनुमति दे दी गई। फर्क यह है कि उज्जैन में भाजपा को अपने सदस्यों पर ही भरोसा नहीं था, इसलिए ‘टेंडर वोट’ डलवाने की कोशश हुई और भोपाल में कांग्रेस सदस्यों के ‘टेंडर वोट’ डलवाए गए क्योंकि यहां भाजपा सदस्यों की संख्या कांग्रेस से कम थी। लोकतंत्र में ऐसे कमाल होते रहते हैं।