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लोकप्रियता की दुपहरी का यह घना अंधेरा, कमलेश पारे की टिप्पणी

Posted on: 13 Jun 2018 07:59 by krishna chandrawat
लोकप्रियता की दुपहरी का यह घना अंधेरा, कमलेश पारे की टिप्पणी

यदि मेरी लिखी हुई ये बातें कहीं छपती हैं, व छपे हुए को आप पढ़ते हैं, तो भी इसके लिए पहला धन्यवाद मैं विदिशा के एक प्रोफेसर साहब को, जिन्होंने उनकी रिश्तेदारी में हुई शादी में ‘भलते’ ही किसम के ठुमके लगाकर रातों-रात नायकत्व पा लिया था, व अपने मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान को ही दूँगा. क्योंकि, तात्कालिक मजे की तलाश में बैठे रहने वाले हम सभी लोगों को उन्होंने आनंददायी झुरझुरी दी व शिवराज जी ने हमारी उस तात्कालिक व क्षणिक झुरझुरी के बदले ईनाम में उन सज्जन को विदिशा जिले का ‘ब्रांड एम्बेसेडर’ बना दिया. इससे हम सब धन्य हुए. यह सब मैंने इसलिए याद कराया कि कई बार कितना ही अकिंचन व्यक्ति हो या कारण, व्यक्ति और समाज को आनंद की झुरझुरी के बाद जगाता है. बात मानिये, आनंद के इन क्षणों के रहते, अपने कुछ बड़े-बड़े दर्द तत्काल ध्यानाकर्षण चाहते हैं. जिस विदिशा शहर या जिले की बात चली है वहीँ मुख्यमंत्रीजी का अभी निवास, खेत और डेरी-फार्म हैं. वहां के जिला अस्पताल के जच्चा वार्ड में एक ही पलंग पर तीन महिलायें अभी हाल तक रखी देखी गई थी. इसी तरह मेडिकल वार्ड में एक पलंग पर पांच और सर्जिकल वार्ड में भी एक पलंग पर तीन मरीज रखे देखे गए थे. सर्जिकल वार्ड में एक पलंग पर रखे गए तीन मरीजों में एक उम्रदराज मरीज टांग-टूटने के कारण भर्ती हुआ था.मैं नहीं कहता कि ये सब उसी पलंग पर सो ही जाते होंगे. एक को छोड़कर बाकी सब जमीन पर या वरांडे में सोते हैं.Image result for विदिशा अस्पताल मरीज

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हू-बहू यही स्थिति सीहोर, रायसेन, होशंगाबाद, सिवनी या अन्य जिलों में भी है. सीहोर भी मुख्यमंत्रीजी का गृह जिला ही कहलाता है. वहां भी आठ करोड़ की लागत से बने ट्रामा सेंटर में यही हालत है. ईश्वर की सौगंध खाकर कहता हूँ कि यह जानकारी मैंने एक राष्ट्रीय समाचार पत्रिका में छपी खबर पढ़कर ही आपको दी है. यह सिर्फ इसलिए कि आप उस नाच, उस ठुमके और ब्रांड एम्बेसेडर की झुरझुरी से बाहर आकर अपने प्रदेश की भी थोड़ी सी चिंता कर लें. आपको पता ही है कि अच्छे-अच्छे शब्द गढ़ने वाली अपने मध्यप्रदेश की इसी सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक ‘दृष्टि-पत्र’ बनाया था. इसका पहला ही वाक्य था कि ‘सभी उम्र के, सभी जगह रहने वाले स्त्री, पुरुष व बच्चों को उनके अधिकार के तहत उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं, उनकी पहुँच व आर्थिक क्षमता के मूल्य पर उपलब्ध कराई जायेगी. लेकिन, अस्पतालों की हालत, वहां दवाओं की उपलब्धि और डाक्टर साहब की उपस्थिति की असल हालत आप देख लें, तो शायद आपकी आँखें खुली की खुली रह जाएँ. यह भी संभव है कि ‘दृष्टि-पत्र’ का ऊपर लिखा वाक्य एक चुटकुला लगने लगे.वैसे मैं,अपने पहले किये गए कुछ निवेदनों में खुद ही कहता रहा हूँ,कि महानगरों की सीमा के बाहर निकल जाएँ. आप खुद ही अपनी आँखों से देख लें, सब पता चल जाएगा. अस्पताल, स्कूल,पशु-चिकित्सालय, महिला व बालविकास सहित पोषण आहार कार्यक्रम पूरी तरह से तितर-बितर और दयनीय स्थिति में हैं.shivraj-singh-chouhan_650x400_41456572723किसी ने प्रदेश के स्वास्थ्य मोहकमे के मंत्रीजी से इस हालत पर प्रश्न पूछ ही लिया. उनका मासूम सा जवाब था कि अस्पतालों में डाक्टरों  की संख्या सीमित है, अस्पतालों में पलंगों की संख्या सीमित है, साथ ही और भी कई संसाधन सीमित हैं. हम मरीजों को वापस तो नहीं कर सकते. इसलिए जैसे भी हालात हों, हम सबका यथासंभव इलाज करते हैं. मंत्रीजी की मासूम बात पर अब आप ही बताएं कि आज के ‘कल्याणकारी राज्य’ में जहाँ अनंत शून्य लगी राशियां दान में विदेशों से, हिस्से के रूप में केंद्र सरकार से और सर्वोच्च में से एक प्राथमिकता के रूप में राज्य के बजट से जिस काम के लिए मिलती हों, उसकी यह हालत है,और ऐसा मासूम जवाब मिलता है, तो हम क्या करे. सरकार में बैठे वे पूर्वानुमान लगाने वाले कहाँ गए, जो सारी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाते या बनवाते हैं.

अपनी तरह के अकेले पत्रकार श्री पी साईंनाथ ने सारा देश घूमकर पाया था कि अस्पताल में दवा नहीं हैं, जांच के उपकरण नहीं हैं, नर्स दीदी या भैया नहीं हैं, डाक्टर साहब नहीं हैं, यदि हैं तो काम नहीं करते. पर, अस्पताल के ही परिसर में बने डाक्टर साहब के बंगले में सब हैं. बस पैसा लगेगा. सीमित संसाधनों की बात करने वाले बड़े लोगों की आँखें,इतना ‘सीमित’भी क्यों देखती हैं,कि अस्पताल की बाउंड्री में क्या हो रहा है,वही न दिखे ? हम सब का एक पुराना अनुभव है कि हमारा ही आदमी ‘सरकार’बनते ही कोल्हू के बैल की तरह अपनी ही आँखों में पट्टी बाँध लेता है व पिंजरे के तोते की तरह बोलने लगता है. ये जो ‘सीमित साधन’,’उसी में सबकी सेवा’ आदि-इत्यादि बातें उसी जाति की हैं जिन्होंने आँखों में पट्टी बाँध ली है व पिंजरे में बंद होकर चाभी अफसरों को दे दी है. हम तो यह जानते हैं कि सूख जाती हैं कई नदियां हम तक आते आते, पर याद रखिये हमें मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ है.cmshivraj

कहने को तो बहुत है. पर एक ही बात कर लें. अपने देश में एक ‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण’होता है.इसमें गर्भवती महिलाओं को सरकार की तरफ से दी जाने वाली सेवाओं और सुविधाओं की चर्चा होती है.आपको आश्चर्य होगा कि पूरे देश में पचास प्रतिशत से थोड़ा ही ज्यादा महिलाओं को पहली तिमाही में ‘जच्चा-पूर्व’सलाह और चिकित्सा सुविधाएं मिल पाती हैं. गर्भावस्था के दौरान चार बार ये सुविधाएं मिलना चाहिए,लेकिन चार बार तो मात्र छत्तीस प्रतिशत को ही मिल पाती हैं.अपने मध्य प्रदेश में तो मात्र 11 प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा महिलाओं को यह मिल पाती हैं.पूरी गर्भावस्था के दौरान सौ दिन तक गर्भवती महिला को आयरन(फॉलिक एसिड) की गोलियां खानी रहती हैं,लेकिन मात्र तेईस प्रतिशत को ये उपलब्ध हो पाती हैं.जचकी के बाद सिर्फ पचास प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा महिलाओं को डाक्टर साहब या नर्स दीदी मिलती हैं.ये आंकड़े मैंने उसी सर्वेक्षण से लिए हैं. मैंने डाक्टरनी मैडम और नर्स दीदी की संख्या या महिलाओं पीछे उनके दयनीय अनुपात की बात नहीं की है.यह आंकड़ा और भी खतरनाक है.

पोषण आहार की आपूर्ति करने वाले लोगों की हैसियत और पहुँच की बातें यहाँ करना बेकार है,बस इतना जान लीजिये कि वे इसमें मिट्टी भी दे दें,तो उसे ईश्वर का प्रसाद मानकर सबको ग्रहण करना ही है. हम उस मध्य प्रदेश के वासी हैं,जिसने चिकित्सा विज्ञान में देश को शीर्षस्थ व श्रेष्ठ लोग दिए हैं. चिकित्सा के अत्याधुनिक उपकरण दुनिया के हर बड़े शहर के साथ ही मध्य प्रदेश में भी आते रहे हैं. यहाँ ऐसे उद्यमी हैं,जो हिम्मत कर श्रेष्ठ से श्रेष्ठ प्रयास कर सकते हैं.लेकिन सरकार जानती भी है,कि क्या हो रहा है ? सरकार दूसरे बेचारे कारखानेदारों की तरह उनको भी वैसे ही सताती है.पक्की नौकरी पाकर, हड़ताल करने, भ्रष्टाचार करने और बेहिचक बदतमीजी करने का हक़ पाकर बैठे कम पढ़े लिखे सरकारी कर्मचारी उन्हें लूटने में ही अपने को धन्य समझते हैं.सरकार की लोकप्रियता की भरी दुपहरी में अँधेरे के ये हालात उन्हें ही दिखते हैं,जिन्हें दर्द महसूस होता है.इनकी कोई टीआरपी नहीं है,व इन बातों से शादी के नाच जैसी झुरझुरी भी नहीं आती.इनसे चुनाव के परिणाम भी प्रभावित नहीं होंगे.फिर भी मुझे लगा कि आपको बताना चाहिए.ये कहानी पूरी नहीं है.पिक्चर अभी बाकी है,पर भरोसा करें आगे इस पर आपको नहीं सताऊंगा. अपनी सरकार बहादुर को पता ही नहीं है कि अपने यहाँ प्रस्तावित छह सरकारी मेडिकल कॉलेजों में भर्ती रोक दी गई है. जबकि लगभग सभी कॉलेजों के लिए सिफारिश से अध्यापक भर्ती हो चुके हैं. राजनैतिक रूप से नापसंद या असुविधाजनक प्रोफेसरों के तबादले की फाइलें दौड़ पड़ी हैं. मैं,म.प्र.के मालवा में ज्यादा दिन रहा हूँ,इसलिए वहां की एक कहावत हमेशा याद रहती है कि -“राँडें रोती रहती हैं,और पावणे जीमते रहते हैं “

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