नितिनमोहन शर्मा

नींद में से भी कोई झकझोर कर पूछ लें न तो भी मंडल अध्यक्ष सिलसिलेवार अपने मंडल की बूथ रचना धाराप्रवाह बोल देता था। ऐसी थी पुरानी भाजपा जहा बूथ पर काम करने वालो के लिए उनका अपना बूथ ही सम्पूर्ण विधनासभा होता था।उसे ये हिदायत रहती थी कि कुछ भी हो जाये, केसी भी खबर मिले, किसी भी सूरत में अपना बूथ मत छोड़ना। पन्ना प्रमुख तो इतना परिश्रमी होता था कि काम करती माँ बहन बेटियां ओर भाभियों के हाथ का काम भी हाथ मे केवल इसलिए ले लेता था कि पहले जाओ ओर मतदान कर के आओ।

नगर इकाई के प्रत्येक सदस्य की चुनाव में भूमिका होती थी। महामंत्रियों से लेकर आमंत्रित सदस्य तक के पास चुनावी दायित्व होते थे। नगर अध्यक्ष का मूवमेंट हर विधनासभा क्षेत्र में नियमित होता था। चुनाव वाले दिन तो पूरी पार्टी मैदान में रहती थी। वार्ड ओर बूथ में टैबले सूर्य नारायण के उदय होने से पहले ही लग जाती थी। राम रज बिछ जाती थी। चन्दन केसर घुली हुई कटोरिया टेबल पर सज जाती थी। पार्टी के दुप्पटे ओर भगवा गमछे पहने पार्टी वर्कर भाल पर तिलक छापे मारकर उत्साह से मैदान में उतर जाते थे। देखते ही देखते माहौल भाजपाई हो जाता था।

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इस बार ऐसा कुछ हुआ?? ये सवाल अब भाजपा के स्थापित ओर जमीनी नेताओं के पास से होता हुआ दीनदयाल भवन तक जा पहुंचा है। पार्टी का ये बदला रूप प्रतिबद्ध मतदाताओं ने ही नही, शहर ने भी महसूस किया। वोटिंग वाले रोज पूरा दिन लगा ही नही इंदौर जैसे भाजपाई गढ़ में पार्टी चुनाव लड़ रही है। पार्टी के पुराने नेताओ की माने तो 6 जुलाई को भाजपा चुनावी मैदान में पूरी तरह लावारिस नजर आई। कही कोई ऐसा तंत्र नजर नही आया जो केंद्रीकृत होकर पूरा चुनाव संभलता नजर आए।

कागज पर तो 100 से ज्यादा नेताओ की भारी भरकम चुनाव प्रबन्धन समिति बनी थी लेकिन इस समिति के सदस्य मैदान में कहा है और क्या कर रहे है किसी को खबर नही थी। पार्षद उम्मीदवार स्वयम किला लड़ा रहे थे। हारे जीते विधायक भी दौड़ रहे थे। ये बात अलग है कि उनकी रुचि भी उन वार्डो में ज्यादा रही जहा उनकी पसन्द का उम्मीदवार चुनाव मैदान में था। पार्टी का कंट्रोल रूम इस बार था कि नही? प्रचारित ही नही हुआ। सबसे ज्यादा परेशानी उस बूथ प्रबन्धन पर आई जिसे लेकर पार्टी का केंद्रीय ही नही, प्रदेश नेतृत्व भी न केवल मुखर था बल्कि गम्भीर भी था। इस मामले में कितना काम हुआ ये चुनाव वाले दिन सामने आ गया। ऐसे कई वार्ड थे जिसमें बूथ अध्यक्ष ही नही थे।

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इसमें पार्टी का गढ़ कहे जाने वाला विधानसभा 2 भी था। गणेश गोयल जैसे दिग्गज नेता ने भी इस कमी को उस दिन महसूस किया। बूथ अध्यक्षो की तलाश में हालात इन कदर खराब थे की यहा काम कर रहे पार्टी नेता उमाशंकर तरेटिया को यहां तक कहना पड़ा कि जो कर रहे है काम, उनको अब मत टोको। भले ही उनके पास दायित्व नही है। नही तो ये भी भाग जाएंगे। सूत्र बताते है कि बूथ मैनेजमेंट का अधिकांश काम बन्द कमरों में बैठकर कर लिया गया। लापरवाही यहां तक बरती की जिसे कागज पर बूथ अध्यक्ष बनाया उसको खबर तक करना भी उचित नही समझा।

अब ऐसे में जो इस तरह बूथ का मुखिया बना उसको कितना बूथ का ज्ञान होगा?? ये हालात विधनासभा 4 में भी थे। बूथ प्रबन्धन का सारा दारोमदार नगर इकाई पर छोड़कर पार्टी के बड़े नेता निश्चित हो गए। बूथ समिति ओर त्रिदेव के नाम से भोजन भंडारे भी खूब हुए लेकिन जमीन पर काम जांचना भूल गए। पार्टी के पुराने नेताओ का दावा है कि किसी भी विधनासभा के मंडल या बूथ अध्यक्ष से पूछ लो अगर वो बूथ नम्बर ओर उसकी जमावट विस्तार से बता ही नही सकता। क्योंकि काम कागज पर ओर सोशल मीडिया पर ज्यादा हुआ, जमीन पर नही।