गुरु के कड़वे वचन औषधि तुल्य होते है: मुनि पुष्पेन्द्रविजय

गुरु हमारे लिये प्रेरणा के प्रतीक है । प्रभु प्रतिमा का प्रक्षाल करते हुये हमारी आत्मा निर्मल बन जाये ऐसे भाव होना चाहिये।

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इंदौर: दादा गुरुदेव की पाट परम्परा के अष्टम पट्टधर वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यदेवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. के आज्ञानुवर्ती ज्ञानप्रेमी मुनिराज श्री पुष्पेन्द्रविजयजी म.सा. ने कहा कि धर्म बिन्दु ग्रंथ के माध्यम से हम छोटे छोटे सूत्रों को समझकर अपने जीवन को सार्थक करने का प्रयास कर रहे है। इस ग्रंथ में आचार्य श्री हरिभद्रसूरिजी ने बताया कि संसार की प्रवृति में जो जीव अपना जीवन जी रहा है उसे उसके अनुकुल व्यवहार मिलना चाहिये यदि उस व्यक्ति को अच्छे व्यक्ति का साथ मिल जाये तो उसके जीवन में भी परिवर्तन सम्भव हो सकता है।

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गुरु हमारे लिये प्रेरणा के प्रतीक है । प्रभु प्रतिमा का प्रक्षाल करते हुये हमारी आत्मा निर्मल बन जाये ऐसे भाव होना चाहिये। चंदन पूजा करते हुये ह्रदय शीतल बने व पुष्प पूजा करते समय ह्रदय कोमल बने ऐसे भाव होने चाहिये। गुरु के सहयोग बिना कोई भी शिष्य महान नहीं बन सकता। गुरु के सानिध्य से ही जीवन में परिवर्तन सम्भव होता है। गुरु के ह्रदय में कभी भी क्रोध और आवेश नहीं होता है वो केवल क्रोध और आवेश का दिखावा करते है। गुरु केवल बाहरी क्रोध का प्रदर्शन करते है। उनके ह्रदय में कपट भाव नहीं होते है। गुरु के कड़वे वचन औषधि तुल्य होते है। हमे कभी भी क्रोध आंतरिक रुप से नहीं करना चाहिये। किसी के जीवन को सुधारना है तो अनुशासन बहुत जरुरी है।

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गुरु का सानिध्य मिल जाये तो कर्मो की निर्जरा करने पीछे नहीं हटना चाहिये। जिस प्रकार हम व्यापार में निरन्तर बढ़ोतरी करने का प्रयास करते है उसी प्रकार गुरु जो हमें धर्म मार्ग दिखाते है उसमें भी बढ़ोतरी के बारे में सोचना चाहिये। जीवन में धर्म संस्कारों का निवेश करते रहना चाहिये। हम वर्षो से धर्म आराधना कर रहे है हमने भौतिक क्षेत्र में तो बहुत कुछ प्राप्त कर लिया पर आराधना के क्षेत्र में हमने क्या पाया है यह हम नहीं जानते है। जीवन में कितना धन मिला है इससे कोई लेना देना नहीं पर आराधना के बाद जीवन में धर्म कितना बढ़ा यह महत्वपूर्ण है हमेशा भावना उच्च कोटि की रखना चाहिये।

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आज की साधार्मिकभक्ति, प्रभावना, लक्की ड्रा एवं दादा गुरुदेव की आरती का लाभ श्री प्रवीणकुमार मनोहरलालजी जैन खुटवाला परिवार कुक्षी साकेत नगर इन्दौर वालों को प्राप्त हुआ। लाभार्थी परिवार का बहुमान चातुर्मास समिति के सदस्यों द्वारा किया गया।

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दादा गुरुदेव की पाट परम्परा के अष्टम पट्टधर वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यदेवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा., ज्ञानप्रेमी मुनिराज श्री पुष्पेन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री रुपेन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री जिनचन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री जीतचन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री जनकचन्द्रविजयजी म.सा. एवं सेवाभावी साध्वी श्री संघवणश्री जी म.सा. आदि ठाणा की पावनतम निश्रा में यशस्वी चातुर्मास चल रहा है।

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