गांव की अदभुत शादी की ऐसी कहानी आपने कभी नहीं सुनी होगी

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वरिष्ठ पत्रकार ऋषिकेश राजोरिया की कलम से

हम मनोज की शादी में थे। साथ ही उसके छोटे भाई की शादी हो रही थी। उसके छोटे भाई की शादी बाल विवाह की श्रेणी में आती है, क्योंकि उसकी उम्र कानूनी तौर पर विवाह योग्य नहीं है। घर वालों की समस्या थी कि दो शादियां अलग-अलग करने से बहुत आर्थिक बोझ पड़ेगा। इसलिए उन्होंने सोचा कि दोनों भाइयों की एकसाथ शादी कर दी जाए। मैं गांवों में ही बड़ा हुआ हूं। शहर में तो मैं बाद में आया। गांवों में बड़ी संख्या में बाल विवाह होते हैं। उसमें किसी को एतराज करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए क्योंकि हिंदू समाज सदियों से इसी तरह चला आ रहा है। इसमें कई परंपराएं जो गलत मानी जाती रही हैं, उनको समाज सुधार के आंदोलन के माध्यम से समाप्त करने की कोशिश भी साथ में चली आ रही है। इनमें बाल विवाह भी एक है।

बाल विवाह को आधुनिक विचारधारा में गलत अर्थों में लिया जाता है। आधुनिक विचारधारा के तहत जहां भी विवाह संबंधी विषय आता है, उसे सेक्स से जोड़ दिया जाता है, लेकिन भारतीय विचारधारा के तहत सेक्स सिर्फ वंश को आगे बढ़ाने का माध्यम है। विवाह एक पवित्र संस्था होती है। उसके माध्यम से एक परिवार की स्थापना होती है। उस परिवार में अगली पीढ़ी बड़ी होती है और उसी परिवार से अगली पीढ़ी को संस्कार मिलते हैं। और इस तरह समाज को आगे बढ़ाने में सिर्फ सेक्स ही प्रमुख नहीं होता है।
भारतीय सनातन समाज तमाम जातियों में बंटा हुआ है। सबकी आध्यात्मिक विचारधारा समान होते हुए भी सामाजिक रीति रिवाज अलग-अलग होते हैं। जब लड़के और लड़कियां बड़े होते हैं तो उनके अभिभावकों को उनकी शादी की चिंता रहती है। शादी जातियों के भीतर ही तय होती है। कई बार लड़के-लड़की की शादी उनके परिवार बचपन में ही तय कर देते हैं और उचित मौका आने पर शादी भी कर देते हैं। लेकिन वर-वधू को वयस्कोचित समागम का मौका गौने के बाद ही मिलता है, जब दुल्हन रजस्वला होने लगती है। बाल विवाह के बावजूद तब तक दोनों के परिवार लड़के-लड़की को मनमर्जी करने से रोके रहते हैं। अपवाद हर जगह होते हैं, लेकिन आम तौर पर यह हिंदुओं की परंपरा है। इसमें बाल विवाह जैसे शब्द नहीं हैं। यह कानून की शब्दावली है।

मनोज पढ़ा-लिखा है। सरकारी अफसरों के बीच रहता है। आधुनिक रहन-सहन में रचा-बसा होने के साथ ही अपने गांव से भी शिद्दत के साथ जुड़ा हुआ है। उसने बताया कि भाई छोटा है, समस्या है, लेकिन क्या करें। दोनों भाइयों की पहरावनी चल रही थी। मंडप के नीचे बीच में मनोज और उसका भाई, साथ में उसके साथ उसके भाई-बंधु, कुटुंब के युवक। सामने की तरफ महिलाओं का समूह। सभी एक के बाद एक मनोज और उसके छोटे भाई को टावेल, अंगोछा या कोई वस्त्र देते और कुछ रुपए देते। टीका लगाते। हाथ जोड़ते। मेरी शादी हुई थी, तब मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था। इस दौरान बहुत से टावेल, अंगोछे और पेंट-शर्ट के पीस इकट्ठा हो जाते हैं। पैसे भी मिलते हैं।

शहरों में शादियां संक्षिप्त हो गई हैं। सनातन धर्म की कई उपशाखाएं बन गई हैं, जिनमें कई जगह शादी जैसे समारोह एक दिन में संपन्न कर दिए जाते हैं। इस तरह जिस धर्म का पालन करने का दावा हम करते हैं, उसकी सामाजिक व्यवस्था आश्चर्यजनक तरीके से बदल रही है। पहले जो शादियां होती थीं, या जिस शादी में शामिल होने हम ठिकरिया खुर्द गए, या बचपन में जो शादियां देखीं, उनमें यही देखा कि शादी के रीति-रिवाज एक हफ्ते पहले से शुरू हो जाते हैं। कुटुंब के सभी लोग विवाह-स्थल पर इकट्ठा हो जाते हैं और यह सामाजिक समारोह कम से कम एक हफ्ते तो चलता ही है।

शुरुआत गणेश पूजा से होती है। फिर वर को या वधू को हल्दी लगती है। फिर उसके साथ सुरक्षा रक्षक की तरह एक कुंवासा तैनात हो जाता है। दूल्हा हाथ में कटार रखे रहता है। परिवार की महिलाएं माता पूजने जाती हैं। फिर मंडप बनता है। बचपन में जो शादियां देखीं, उनमें मंडप के दिन बैल गाडि़यों से जामुन की डालियां काटकर लाई जाती थी और उनकी छाया से मंडप तैयार होता था। आजकल जामुन की डालियां कहां मिलती हैं, गांव जैसी जगह भी नहीं होती, इसलिए मंडप की सिर्फ रस्म अदायगी होती है। मंडप के बाद कुछ और रीति-रिवाज होते हैं। फिर दूल्हा बारात लेकर जाता है। दुल्हन के घर बारात की आवभगत होती है। वर-वधू हवनकुंड के सात फेरे लगाकर विवाहित घोषित किए जाते हैं। उसी दिन भव्य रिसेप्शन हो जाता है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोगों को भोजन करवाया जाता है। इसमें अच्छा खासा पैसा भी खर्च होता है।

हम करीब एक घंटा उस जगह रहे, जहां मनोज और उसके भाई की पहरावनी चल रही थी। मैंने वहां करीब आधा दर्जन युवकों को देखा, जिन्हें मैं पहले जयपुर में मनोज के साथ देख चुका था। एक खुशीराम, जो अध्यापक है। उसने मुझे अवश्य पहुंचने के लिए फोन भी किया था। वहां कुछ प्लास्टिक की कुर्सियां थीं, जिन पर लोग जमे हुए थे। मैं, अशोक, हरिमोहन, सीताराम वहां खड़े थे। सीताराम को कहीं एक खाली कुर्सी दिख गई तो उसने मुझे उस पर बैठा दिया। एकदम पारिवारिक माहौल था। कोई भी आडंबर नहीं। सभी विवाहित महिलाएं करीब-करीब एक जैसी पोषाक में थीं। लहंगा और चुनरी। लड़कियां सलवार कुर्ती पहने हुए थीं। ज्यादातर महिलाएं घूंघट किए हुए थीं। कुछ ही युवतियां थीं, जिनका चेहरा दिख रहा था। रिवाज है कि परिवार की बहन-बेटियों को चेहरा ढांकने की जरूरत नहीं होती। सभी मेहमान अत्यंत साधारण थे। जिन्हें हम असाधारण कह सकते हैं। पंगत में भी शहर जैसा कोई आडंबर नहीं। खुली जगह पर पंगत में लोग जमीन पर बैठकर भोजन कर रहे थे।

पहरावनी खत्म हो गई तो मनोज हमें एक अन्य मकान की तरफ ले गया। वहां रास्ते में एक पानी का टैंकर खड़ा था। पास में एक भट्टी खुदी हुई थी, जिसे जलाकर बड़ी कड़ाही में पूडि़यां तली जा रही थीं और उन पूडि़यों को एक ड्रम में रखा जा रहा था। उस ड्रम में से पूडि़यां निकाल कर पंगत वाली जगहों पर ले जाई जा रही थी। एक बड़े तपेले में दाल बनाकर रखी गई थी। साथ में बेसन की नुक्ती, जिसे बूंदी भी कहते हैं और नमकीन। भोजन में सिर्फ इतनी ही सामग्री थी। हम वहां एक ओसारी में पलंग पर बैठे। मनोज और उसके भाई की शादी का पहरावनी सत्र संपन्न हो चुका था। रात को बिंदौरी निकलने वाली थी। इसमें दूल्हा घोड़े पर बैठकर गाजे बाजे के साथ गांव के प्रमुख रास्तों से गुजरता है। साथ में परिवार के सभी लोग रहते हैं। मनोज ने खूब अनुरोध किया कि हम रुकें और बारात में चलें, लेकिन हम पहले से कार्यक्रम तय करके आए थे और उसमें परिवर्तन करने से काफी गड़बड़ी हो जाती इसलिए हमने अनुरोध नहीं माना। मैंने मनोज को पांच सौ रुपए दिए तो उसने नहीं लिए। कहा, मैं आपसे पैसे नहीं ले सकता। मैंने नोट वापस जेब में रख लिया। उसने एक मकान की छत पर हमारे लिए भोजन की व्यवस्था करवाई। हमने छत पर बैठकर शाम के समय चारों तरफ खुले खेत देखते हुए भोजन किया।

भोजन करने के बाद हम सात बजे बाद ठिकरिया खुर्द से जयपुर के लिए रवाना हो गए। बचपन में जैसी शादी देखता था, यह भी प्रकारांतर से वैसी ही शादी थी। उस जमाने में गांवों में बैलगाडि़यों से बारात जाती थी। जहां बारात ठहरती थी, वहां बैलों के ठहरने और उनके चारे का भी प्रबंध रहता था। आडंबर बहुत कम होता था और आत्मीयता ज्यादा होती थी। कुटुंब कुटुंब जैसा लगता था। वह एक भारतीय सामाजिक व्यवस्था थी, जो अब भी है, लेकिन हम शहरीकरण की चपेट में आकर अपनी ही सामाजिक व्यवस्था को भूलते जा रहे हैं। गांवों में देश शत-प्रतिशत भारतीय है। देश की आत्मा वहीं बसती है। इस तरह कुछ घंटों की यात्रा और मनोज की शादी में शामिल होने का अनुभव अद्भुत रहा। एक तो मुकेश अंबानी की बेटी की आडंबर से भरपूर शादी के किस्से सुनने को मिले और दूसरी तरफ मनोज की शादी में शामिल होने का मौका मिला, जहां कोई आडंबर नहीं था। विवाह एक पवित्र सामाजिक अनुष्ठान की तरह हो रहा था, जिसमें एक हजार से ज्यादा लोगों की भागीदारी हमने देखी। वहां गाडि़यों की कोई पार्किंग हमने नहीं देखी। शहरों में मैरिज गार्डनों के आसपास सड़कों पर जो अराजकता फैल जाती है, उसका नामोनिशान नहीं था। ज्यादातर लोग पैदल ही दूसरे गांवों से ठिकरिया खुर्द चले आ रहे थे। यह एक अद्भुत अनुभव था। जिस रास्ते हम आए थे, उसी रास्ते हम रात साढ़े दस बजे तक जयपुर पहुंच गए। फतेहसिंह ने पहले मुझे, फिर सीताराम, हरिमोहन और अशोक को उनके ठिकानों तक छोड़ा। अगले दिन हम फिर से अपने रोजमर्रा के जीवनचक्र में व्यस्त हो जाने वाले थे। …..

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