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महिलाओं की फर्टिलिटी क्षमता का लग सकता है पता

Posted on: 27 Jun 2018 15:02 by Praveen Rathore
महिलाओं की फर्टिलिटी क्षमता का लग सकता है पता

इंदौर. आजकल महिलाएं शिक्षा और कॅरियर को पूरा कर लेने के बाद ही शादी करने के बारे में सोच रही हैं। गर्भधारण को देर तक टालते रहने से उन्हें स्वाभाविक रूप से गर्भधारण करने में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि महिलाओं की फर्टिलिटी उम्र के साथ घटती जाती है। ऐसे में जहां महिलाएं देर से गर्भधारण का निर्णय लेती हैं, एएमएच नामक एक आसान रक्त जांच की मदद से वे आसानी से यह जान सकती हैं कि वे कितने समय तक गर्भधारण न करने के निर्णय को रोके रख सकती हैं।

नोवा आईवीआई फर्टिलिटी, इंदौर की फर्टिलिटी कंसल्टेंट, डॉ. ज्योति त्रिपाठी ने यह बात कहीं। उन्होंने बताया कि हर महीने औरत अपने प्रजनन काल में कम-से-कम एक अण्डाणु खोती है, जिसके चलते 30-40 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते उसके अंडाणुओं की संख्या घटकर कम हो जाती है। 45-50 वर्ष की उम्र में जब रजोनिवृत्ति होती है, तो अण्डाणुओं का भंडार पूरी तरह से समाप्त हो गया होता है।

एंटी-मुलेरियन हॉर्मोन टेस्ट है बचाव –

कपल्स को चाहिए कि वे महिलाओं के ओवेरियन रिजर्व को ध्यान में रखते हुए गर्भधारण के बारे में योजना बनाएं। महिलाओं की फर्टिलिटी क्षमता की जांच के लिए चिकित्सकों ने एंटी-मुलेरियन हॉर्मोन (एएमएच) टेस्ट का परामर्श दिया है। विकसित होती पुटिकाओं की कोशिकाओं से एएमएच का स्राव होता है और यह ओवेरियन रिजर्व का एक संकेतक है जिसका आकलन रक्त-जांच के जरिए की जाती है। इसके लिए दूसरा आसान टेस्ट है, एंट्रल फॉलिकल काउंट (एएफसी), जिसमें ट्रांसवेजाइनल अल्ट्रासाउण्ड के जरिए ओवेरियन रिजर्व का पता लगाया जाता है। ओवेरियल रिजर्व की कमी का तात्पर्य गर्भधारण की अक्षमता नहीं है। दुर्भाग्यवश, ओवेरियन रिजर्व के समाप्त हो जाने पर, दवाओं से उसे वापस लाने में मदद नहीं मिल सकती है। यदि महिलाएं इनफर्टिलिटी की समस्या की शिकार है, तो आईयूआई (इंट्रायूटेरिन इंसेमिनेशन) और आईवीएफ (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) से मदद मिल सकती है।

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