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गया ऐसा तीर्थ है, जहां सात गोत्रों में १२१ पीढिय़ों का पिंडदान और तर्पण किया जाता है

Posted on: 06 Feb 2019 17:15 by mangleshwar singh
गया ऐसा तीर्थ है, जहां सात गोत्रों में १२१ पीढिय़ों का पिंडदान और तर्पण किया जाता है

आधुनिकता के व्यापक विस्तार के बावजूद भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन माह की अमावस्या तक अपने पितरों को विविध अनुष्ठानों के जरिए स्मरण करते हैं। साथ ही इस धार्मिक पवित्र मान्यता के साथ पिंडदान भी करते हैं कि पितरों की आत्मा को शांति मिले।
इस मेले में भारत ही नहीं भारत से बाहर के लोग भी बड़ी संख्या में आते हैं। इनमें नेपाल, श्रीलंका, मारिशस, फीजी, गुयाना, तिब्बत, बर्मा, भूटान के लोग मुख्य हैं। इस देश में गया एक मात्र जगह है, जहां दुनियाभर के हिंदू अपने पितरों को श्राद्ध करने आते हैं। लोक विश्वास के अनुसार पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गया में जहां सारे पितर, इस पितृपक्ष के दरम्यान आते हैं। ‘वायु पुराण’ में वर्णित कथा के अनुसार यहां गयासुर नाम का एक राक्षस था, जिसने कठिन तप कर भगवान विष्णु को प्रसन्न कर लिया था और उनसे विभिन्न वरदान मांगा। उसकी परिणिति यह हुई कि गया को पवित्र नगर मानकर पिंडदान के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थान होने की संज्ञा दी गई।

पूरे भारत में केवल गया ही एक ऐसा तीर्थ है, जहां सात गोत्रों में १२१ पीढिय़ों का पिंडदान और तर्पण किया जाता है। यहां कुल ४८ स्थानों पर पिंडदान होता है। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण विष्णुपद मंदिर है, जिसे इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने सन् १७६६ में बनवाया था। फल्गु और मधुश्रुवा नदी के मुहाने पर स्थित इस मंदिर में विष्णु भगवान का पद्चिह्न मौजूद हैं। इसके अलावा अन्य प्रमुख पिंडदान के स्थल हैं – फल्गू घाट, नाकुट, ब्रह्मयोनि, बेतरणी, मंगलागौरी, सीताकुंड, रामकुंड, नागकुंड, ब्रह्म कुंड, पांडुशिला, रामशिला प्रेत शिला, कागबलि आदि।

पिंडदान करने वाला हर स्त्री-पुरुषपहले विष्णु पद, जो फल्गु के तट पर स्थित है, जाते हैं तथा पुरुष मुंडन करवा कर फल्गु में स्नान करने के बाद तर्पण करता है। पिंडदान और तर्पण का कार्य अपने पीढ़ी गत पंडों द्वारा कराया जाता है। इस दरम्यान किसी भी श्राद्धकर्ता को कम से कम विष्णु पद, फल्गु और अक्षयवट में पिंडदान करना अनिवार्य माना गया है। पिंडदान के लिए किए गए धार्मिक अनुष्ठान के अंतर्गत देवताओं और पितरों के लिए चावल और जौ के आटे का पिंड बनाया जाता है। दोनों के लिए अलग-अलग मिट्टी और तांबे के बर्तन, तिल, घी, फल-फूल आदि सामग्री जुटाई जाती है। कुशों पर बैठकर पूजा की जाती है। पिंडदान के बाद पिंडों को दान-दक्षिणा देकर अपने-अपने निवास की ओर प्रस्थान करते हैं।

पौराणिक विश्वासों के अनुसार इसी जगह भगवान राम की पत्नी सीता ने भी अपने ससुर राजा दशरथ का पिंडदान का अनुष्ठान किया था। यहीं फल्गू के तट पर सीता कुंड है, जहां बालू का पिंड देने की प्रथा है। इसके बारे में कहते हैं कि वनवास के दौरान राम, लक्ष्मण और सीता जब दशरथ जी का पिंडदान करने आए, तो सीता को फल्गू तट पर छोडक़र दोनों भाई पिंड की सामग्री जुटाने चले गए। उनके आने में देरी होने पर आकाशवाणी हुई कि पिंडदान का शुभमुहूर्त निकलता जा रहा है। तब सीता जी ने सामने प्रवाहित फल्गु नदी, पास में चरती गाएं, निकट के केतकी पुष्पों और वट वृक्षों को साक्षी मानकर बालू से निर्मित पिंडों का दान करर्य पूरा किया।

इसके बाद श्री राम और लक्ष्मण के वापस लौटने पर जब सीता जी ने पिंडकर्म का अनुष्ठान पूरा हो जाने की बात कही, तो उन दो भाइयों को विश्वास न हुआ। इस पर प्रत्येक साक्षी से पिंडदान की पुष्टि करने को कहा, लेकिन वटवृक्ष को छोडक़र किसी ने गवाही नहीं दी।

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