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लो प्यारे हमारे बंधुआ एमएलए आपके साथ है बना लो सरकार

Posted on: 08 Jan 2019 15:45 by Ravindra Singh Rana
लो प्यारे हमारे बंधुआ एमएलए आपके साथ है बना लो सरकार

गोपाल चतुर्वेदी का व्यंग

आजादी के बाद देश की तेजी से तरक्की लाजमी है। गुलामी के दिनों का नजरिया ही गलत था। उसमें बदलाव आया है। त्योहारों से शुरू करें। एक जमाना था कि होली साल में एक दिन होती थी। लोग रंग, अबीर, गुलाल में पैसे बर्बाद करते थे। भला एक दिन का उत्सव भी कोई उत्सव है? मौज-मस्ती तो रोजमर्रा होनी चाहिए। लिहाजा अब हम हर दिन होली और रात दीवाली मनाते हैं। पूरे साल हम एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं। सिर्फ एक रात दिया जलाने की बजाए बिला-नागा रात-दिन आतंक के बम-पटाखे चलाते हैं।

चंद्रगुप्त से चक्रवर्ती राजा चाणक्य जैसे सलाहकारों की सलाह सुनते थे। अंगे्रज अपने अधिकारियों की। आजकल मंत्री सिर्फ सही सोचते हैं। उनके आला अफसर वही सच बोलते हैं। सियासत और सत्ता का यह सहकारी प्रयास प्रजातांत्रिक व्यवस्था में हमारा अनूठा योगदान है। साइंस में और आगे होंगे। पर है कोई ऐसा विज्ञान जो हमारे ब्रह्म-ज्ञान का मुकाबला करे। जग हैरान है। नेताओं ने प्रजातंत्र को जेबी जनतंत्र बना लिया है। एक भाई जेब खाली करते हैं-‘लो प्यारे! हमारे बंधुआ एमपी आपके साथ हैं। बना लो सरकार’। थोड़े दिन बाद इसको हटाओ, उसको बैठाओ की शर्तें लगाकर फर्माते हैं ‘आपका टर्न हो गया। हमें भी तो मौका दो।’

एक-दूसरे की जेब से सांसद निकालने की नायाब जादूगरी का एक ही लक्ष्य था। कहीं चुनाव न हो जाए! जब तक मुमकिन था, दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र का कामकाज तंत्र-मंत्र के सहारे सूक्ष्म-मत से चलता रहा। ऐसे नेताओं में गजब का आपसी सौहार्द है। एक-दूसरे के पाले में अक्सर टहलने चले आते हैं। इसी संदर्भ में एक कवि ने कहा था –
आत्मा ने धरे,
कई कई चोले हैं-
हमने सिद्धांत नहीं
केवल दल बदले हैं।

विश्व में कहीं कोई देश इस तरह सतत आवागमन से प्रजातंत्र की विश्वसनीयता में चार चांद लगाकर के तो दिखाए।
मैं सुबह उठकर सबसे पहले मुल्क की महानता को शीश झुकाता हूं। फिर राम-राम जपता हूं। अखबार पढऩे के पहले भगवान का ध्यान अनिवार्य है। जानें जाने का जितना औसत खाड़ी की लड़ाई का है, उतना अपने यहां अमन चैन के नार्मल दिनों का है। कहीं चोर-डाकू, दुर्घटना रेल-बस की टक्कर है, कहीं सांप्रदायिक सौहार्द के पक्षधरों का जानलेवा चक्कर। यह हमारे सामूहिक दृष्टिकोण के सुखद परिवर्तन का खुशनुमा नमूना है कि इंसान की जान का दर्द जैसे दकियानूसी जजबात हमने बहुत पहले से तज दिए हैं। हमने उसे जाति और धर्म में बांट दिया है। लोग बहस करते हैं कि अपना टें बोला कि पराया। हमारी जाति का, कि दूसरी का। हिंदू कि मुसलमान। संतों और नेताओं की प्रतियोगिता है कि माहौल में नफरत का जहर कौन ज्यादा भरे।

इधर टोपी सिंह ने टोपी उतार दी है। उनका वादा है कि सामाजिक न्याय के नाम पर देश को टुकड़े-टुकड़े करके ही टोपी पहनेंगे। बिन मंडल सब सून। कहने वाले उन्हें चाहें मंडल सिंह कहें या होली सिन! कहीं ‘भाषण व्यापारी’, ‘रामकृष्ण वाणी’ के सहयोग से रामराज्य ला रहे हैं। कहीं मोटी-खाल मंद बेपर के साथ तारे तोडऩे का घोटाला रच रहे हैं। अजीब बांदी का दावा है कि शासन का बच्चा पालना उन्हीं को आता है। इतने सूरमा आए बाद में, गए पहले। जाहिर है, इस पारिवारिक जागीर में किसी और का प्रवेश वर्जित है। जनता जिए-मरे। सबका अरमान है कि सत्ता की गद्दी सिर्फ उन्हें मिले। कुर्सी पर ऐसे एकटक निशाना लगाने वाले हैं कहीं। हम अपने बुद्धिजीवियों के मौलिक चिंतन के कायल हैं। वह हर स्थिति को उचित ठहराने में माहिर हैं। हमारे कम-अक्ल साथी चिंता करते हैं-‘संसार में संकट है। हमारे यहां सरकार ही नहीं है। क्या होगा।’

‘आप परेशान न हों। ‘सर’ भी हैं और ‘कार’ भी’, समझदार दिलासा देते हैं।
‘हर चौराहे पर बेकारों की लंबी कतारें हैं।’
‘इसीलिए तो हम चुनाव करवा रहे हैं।
थैली खुली है। रैली चली है। अब रोजगार की क्या कमी।’

हम आश्वस्त हैं। पैसे वालों के पास सब है। गरीब को खाने-पहनने की दरकार ही क्या है। ऐसे हर नेता को आजकल फिक्र है। वह मंच से गरजता है, ‘कीमतें कम करो। हमारा करबद्ध निवेदन है कि जमाखोरी बंद करो।’ अब व्यापारी नहीं मानें तो वह क्या करे। उसका कर्तव्य था, उसने किया। व्यापारी अपना धर्म निभा रहे हैं। पहले लोग कितने आज्ञाकारी थे। गांधीजी ने नमक बनाया। सबने अनुसरण किया। अब जमाना ही अवज्ञा का है। कीमतें कम करने के नेता के निर्देश की सुनवाई ही नहीं है। यों यह उल्टी खोपड़ी वाले नेता की हर चीज में नकल करते हैं। नैतिकता झाड़ते हैं। विलासिता की जिंदगी जीते हैं। बुरा देखते, सुनते और करते हैं। हमारे दोस्त ने शिकायत की- ‘नेता क्या सोचते हैं कि सिर्फ तकरीर से मुल्क की तकदीर बदल देंगे।’

‘वह तो सिर्फ परंपरा निभा रहे हैं। आजादी के बाद की नेता-पीढ़ी ने भाषण झाडऩे के अलावा किया ही क्या है!’
‘कथनी को करने में बदलें। उदाहरण पेश करें।’
‘हमेशा कहते हैं, गरीबी हटाओ। करके भी दिखा दिया। अपनी गरीबी हटा ली। आपने क्यों नहीं हटाई।’
‘द्वंद्व-फंद में इतनी महारत होती तो हम नेता न होते।’
‘किसने रोका है। न किसी योग्यता की जरूरत है, न अनुभव की। आप भी मैदान में आ जाइए।’
‘हमसे इतना भ्रष्टाचार न होगा।’
‘भ्रष्टाचार बिचौलियों का था। वह हट गए। अब हर डील डायरेक्ट है।’
‘पर करप्शन तो है।’

‘वह तो आधुनिकता का तकाजा है। हम कब तक कूप-मंडूक बनें। दुनिया से क्यों पिछड़ें।’
उस चर्चा से हम शंकित हो गए। कहीं हम दुनिया से पिछड़ तो नहीं गए। सिर्फ करप्शन का किला फतह करना ही तो काफी नहीं है। स्वनाम-धन्य विद्वान आतताई ने हमें ज्ञान दिया ‘आबादी की रफ्तार में चीन क्या, हम पूरे विश्व से आगे हैं।’
‘यह कौन सी प्रगति का मानक है!
अधिक आबादी, भूख, कुपोषण, बीमारी, बेरोजगारी की जनक है।’
‘हमारे जैसे साधु-संत संसार में कहीं हैं क्या!’

उन्होंने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया। हमारे यहां मु_ी से भभूत, रसगुल्ला, इलायची, मिठाई आदि निकालने के कारनामे साधू प्रतिदिन प्रदर्शित करते हैं। अन्य देशों में यह कमाल जादूगर के जिम्मे है। ऐसे टू-इन-वन प्राणी कहां होंगे, चोले से संत-प्रवर, जादू में जादूगर! यों भी कि अब एजेंटों की अहमियत अपने पल्ले पड़ी है। कुछ अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संस्थान के हैं, कुछ भगवान के। हमें गलतफहमी थी। दूर हो गई। पहले संसार से संन्यास लेकर प्रभु के ध्यान में लीन महापुरुष साधू कहलाते थे। आज भोग-विलास में लिप्त, पांच सितारा होटलों में वास करने वाले अजीबो-गरीब पोशाकधारी ही असली संत हैं। आतताई ने चर्चा चालू रखी। ‘हमारे बराबर बे-कार कहीं हैं क्या।’

‘यह तो बेबसी है, उपबल्धि नहीं।’
‘सवाल संसार में आला होने का है।’
‘दुनिया में इतने देवी-देवता कहां हैं।’
‘आप दुरुस्त फरमाते हैं।’ हमने हथियार डाल दिए। पूरे योरोप की जनसंख्या हमारे देवी-देवताओं की संख्या से कम होगी।
‘इतने राजनैतिक दल किस देश का है।’
‘हमारे जैसे विशाल मुल्क ही कितने हैं’,
हमने उत्तर दिया।

‘इतने अखबार कहीं हैं क्या!’
‘तीन-चार ही अच्छे पेपर हैं। उन्हीं भी कौन पढ़ता है।’
‘आपको क्या पता। हर छोटे शहर में गटर कम, पेपर ज्यादा हैं।’
‘अज्ञान के बावजूद यह हाल है!’ हम चौंके।
‘हमारे निरक्षर संसार के साक्षरों से बेहतर हैं।’
‘वह कैसे’, हमने जिज्ञासा जताई।
‘हम पैदायशी ज्ञानी हैं वरना् सार्थक प्रजातंत्र की पहली शर्त शिक्षा है।’
‘हमारे जितने कवि, लेखक दुनिया में नहीं हैं।’
‘यह नामुमकिन है’, हमने विरोध किया।
‘भारत का हर असफल लैक्चरर, अफसर और प्रेमी कवि-लेखक है। हर दस कदम पर निजी याथ सरकारी अक्षर-ज्ञान की दुकान है। आप खुद हिसाब लगा लें।

हम प्रभावित हुए। हमारे आजाद अदब ने बेहद प्रगति की है। छपा लिटरेचर तो है ही। उससे सौ गुना अधिक साहित्य प्रकाशक की तलाश में है। अध्ययन के मामले में हम परंपरावादी हैं। वेद की विरावत सुनने-सुनाने की है। हम पढऩे-पढ़ाने में यकीन नहीं रखते। कवि-सम्मेलन में लोग काका और के.पी. को सुनते हैं। दूरदर्शन में पटाखा और धमाका को देखते हैं। ऐसे साहित्य-प्रेम की मिसाल कहीं है क्या!’
दर्शन के वर्तमान युग में भाईचारे से मशहूर होते हैं। एक प्राध्यापक पड़ोसी लैक्चरर से प्रश्न करते हैं-‘भाईजी! आपकी किताब छप गई क्या! मेरा ‘रिव्यू’ तैयार है।’

‘आप भी संकलन जल्दी निकालिए। मैंने समालोचना छापने के लिए संपादक को पटा लिया है।’
यह पारस्परिक पीठ-खुजाई हमारी सबसे अहम साहित्यिक कमाई है। इसलिए हम ‘लिटरेचर’ के शिखर पर हैं।
‘हमारी महानता के और कौन से लक्षण हैं’, हमने जानना चाहा।
‘इतने कम हैं क्या! साहित्य, राजनीति, नैतिकता, भ्रष्टाचार, आबादी, महंगाई, प्रशासन हम सब में टॉप पर हैं।’
‘प्रशासन की शान का तो आपने बखान ही नहीं किया।’

‘इतने बड़े देश को एकता के सूत्र में हमारे अधिकारियों ने ही तो जकड़ा है।’
‘हमारा ख्याल था कि यह हमारी संस्कृति, रेल और डाक-तार का नतीजा है।’
‘जी नहीं! पूरा वतन प्रशासनिक निकम्मेपन की डोर में गिरफ्तार है। हमारी लालफीताशाही दुनिया में बेमिसाल है।
हम इस निष्कर्ष से कृतार्थ हो गए। कुछ ही दिन पहले हमारे एक कंजूस दोस्त ने चाय-पार्टी की थी। इस अनपेक्षित उदारता की वजह पूछने पर उन्होंने सबब बताया-‘सरकारी दफ्तर से तीन साल और तीस रिमाइंडर बाद मेरे पत्र की स्वीकृति आ गई है। उसी का जश्न है।’
हम मान गए। हमारे भारत का प्रशासन महान है। आगे मर्जी आपकी है। आप मानें या न मानें। यों हमने सच्चाई बयान की है, आज की सियासत नहीं।

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