नितिनमोहन शर्मा

“नगर सरकार” के लिए इंदौर में हुए शांत और शालीन चुनाव का फैसला रविवार को हो जाएगा। वन मेन आर्मी के तौर पर चुनाव लड़ी ” टीम शुक्ला” बेहद उत्साहित है और वो अपने नेता संजय शुक्ला को नतीजे आने से पहले ही महापौर मान चुकी है। महापौर लिखी नाम पट्टिका तक शुक्ला को भेट कर दी गई है। पार्टी का हाल जुदा है। कांग्रेस में नतीजों ओर मतगणना को लेकर संशय बरकरार है। पार्टी को मतगणना में गड़बड़ी होने की आशंका है। नतीजतन पार्टी ने पूरा फोकस मतगणना प्रक्रिया पर कर दिया है।

पंकज संघवी वाले चुनाव के नतीजों से झुलसी कांग्रेस ने इस बार अभी से फूंक फूंक कर कदम उठाना शुरू कर दिया है। लिहाजा सुरेश पचौरी जैसे पुराने नेता की तैनाती इंदौर में की गई है और उनकी निगरानी में इंदौर की मतगणना होगी। कांग्रेस ने इंदौर की तर्ज पर पार्टी के सभी बड़े नेताओं की तैनाती सभी नगर निगमो के लिए की है। दूसरी तरफ भाजपा पूरी तरह अपनी जीत के प्रति आश्वस्त है।

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पार्टी नेताओं की माने तो भाजपा को इंदौर पर पूरा भरोसा है कि वह विकास का साथ नही छोड़ेगा। अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रदेश संगठन महामंत्री रहे शहर के पूर्व महापौर कृष्णमुरारी मोघे ने पार्टी की बड़ी जीत का दावा करते हुए महापौर उम्मीदवार पुष्यमित्र भार्गव की बड़े अंतर से विजय व दो तिहाई बहुमत से पार्टी की फिर से निगम परिषद बनने का दांवा किया।

” पंच ” लगेगा या बदलाव, चंद घण्टे शेष

सफाई में पंच यानी पांच बार देशभर में सिरमौर रहने वाली भाजपा की निगम परिषद क्या पांचवी बार भी पार्टी का महापौर जीताकर पंच लगाएगी? या शहर इस बार बदलाव का साथ देगा। बस अब चंद घण्टे शेष है। नतीजे सामने आ जाएंगे। साफ हो जाएगा कि भाजपा की पुण्याई अभी बाकी है या कांग्रेस का दुर्भाग्य अभी और शेष है. इस बार के निगम चुनाव ने शहर में वैसी गर्मी नही भरी, जैसी इस छोटे चुनाव में रहा करती थी लेकिन संजय शुक्ला के मैदान में होने से पूरे समय सरगर्मी बनी रही।

“अपने दम” पर भाजपाई हुए इस शहर में दमदारी दिखाने मैदान में उतरे शुक्ला ने अहिल्यानगरी के गली मोहल्लों कालोनी ओर बाजारों में खूब पसीना बहाया। चुनाव के दौरान वे पूरे समय चर्चा के केंद्र बिंदु रहे। दो साल पहले से चल रही उनकी तैयारियों ने उनके चूनावी अभियान को रफ्तार भी दी और बढ़त भी। 85 वार्डो में फैले शहर के एक बड़े हिस्से में उनकी कदमताल हुई। पैदल ही उन्होंने 80 फीसदी वार्डो को नाप दिया। अपने दल और दल के नेताओ को पूरे चुनाव से परे रखते हुए शुक्ला ने पूरे चुनाव को भाजपा वर्सेस संजय रखने की रणनीतिक कोशिश की।

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एक हद तक वे इसमें सफल भी रहे और पूरी कांग्रेस शुक्ला की मैदानी मशक्कत को टुकुर टुकुर देखती रही। पार्टी नेताओं की “जादूगरी” से बचने के लिए टीम शुक्ला ने सभी 85 वार्ड को निजी टीम की निगरानी में कर दिया। हर वार्ड का एक प्रभारी बनाया गया और किसी भी तरह की तोड़फोड़ को टालने की कोशिशें की। उदयपुर ओर नूपुर जैसे प्रकरणों ने उनकी साँसे ऊपर नीचे की लेकिन सधे कदमो से इस माहौल को साधकर उन्होंने चुनाव को फिर मेन ट्रेक पर लिया। अब शुक्ला की सब मेहनत मशीन में बन्द है ओर सब कुछ अब किस्मत भरोसे है।

आरएसएस के हाथ खड़े करने के बाद भाजपा में इस बार का चुनाव एक चुनोती लेकर आया। पार्टी संगठन पर काबिज युवा टीम ओर महापौर उम्मीदवार का नया होना उसके खाते में आया। पार्टी विधायकों और बड़े नेताओं की टिकट वितरण में हुई मनमानी ने परेशानियों में और इजाफा किया। पहली बार बड़ी संख्या में बगावत हुई और निर्दलीय परचे भरे गए। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के एकाकी प्रयासों को छोड़ दिया जाए तो पूरा चुनावी प्रबंधन ढीला ढीला ओर बिखरा बिखरा रहा।

शुरुआती सात दिन तो लगा ही नही की भाजपा जैसी पार्टी इंदौर जैसे भाजपाई गढ़ में चुनाव लड़ रही है। पार्टी गलियारों में सन्नाटा पसरा हुआ था और नेताओं के मुंह सीलबंद थे। चुनाव के नाम पर बूथ प्रबंधन का शोर तो बहुत था लेकिन इसकी पोल भी मतदान वाले दिन खुल गई। 6 जुलाई को भाजपा का चुनाव पूरी तरह लावारिस रहा। बावजूद इसके पार्टी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त है।

जीत का भरोसा शहर में हुए विकास कार्यो के साथ साथ शहरवासियों के मिजाज पर भी है। पार्टी नेताओं का मानना है की भाजपा ने इतना बुरा नही कर दिया कि पूरा शहर उसे खारिज कर दे। निगम में लगतार सत्ता में रहने और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में हुई तोड़फोड़ ने मतदाताओं को उद्वेलित तो किया लेकिन ये गुस्से में तब्दील कितना हुआ ये परिणाम बताएंगे। सबसे ज्यादा चर्चा पीली गैंग का रहा और कांग्रेस ने इस मुद्दे पर भाजपा को पूरे चुनाव में बैकफुट पर रखा।

नही तो ओर ऊंचाइया पाता “संजू” का चुनाव

टीम शुक्ला ने अपने नेता संजय शुक्ला का चुनाव पूरी मजबूती के साथ लड़ा लेकिन ये चुनाव ओर भी ऊंचाइया पाता बशर्तें शुक्ला के चुनाव का झंडाबरदार बने स्वयम्भू लोग उस दायरे से बाहर भी झांकते जो उन्होंने अपने निजी स्वार्थों के चलते बना रखा है। जिन लोगो के जिम्मे संजय की ब्रांडिंग ओर प्रचार प्रसार का काम शामिल था वे एक “कॉकस” से बाहर ही नही निकले और अपने अपने को “उपकृत” करने में जुटे रहे। जबकि ये ऐसा अवसर था कि शुक्ला की पहुंच ओर पहचान उस “कोटरी” से बाहर भी होना थी जो गाहे बंगाहे शुक्ला को सब्जबाग दिखाकर अपना काम निकलवाती रही है।

स्वयम को ” प्रशांत किशोर” समझ बैठे लोग पूरे चुनाव में शुक्ला के खिलाफ चुनावी लिहाज से चलते रहे उस प्रचार को भी सम्भाल नही पाये जो शुक्ला के लिए नुकसानदेह रहा ओर न “मोटा” मैनेजमेन्ट करने के बाद भी कोई बड़ा सकारात्मक प्रचार करवा पाये। इससे ज्यादा ओर बड़ा काम तो संजय शुक्ला के दोनों बेटों ओर टीम शुक्ला के उन युवा साथियों ने कर दिया जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भिड़े थे। स्वयम्भू झंडाबरदार के दिखाए सब्जबाग 17 जुलाई की रात तक सामने आ जाएंगे।

“उपर से बेलबुटा-अंदर से पेंदा फूटा”

भाजपा में ये चुनाव याद रखा जाएगा कि किस तरह एक काडर आधारित पार्टी ने ढीला ढाला चुनाव लड़ा। एक तरफ कांग्रेस पूरे चुनाव में हमलावर रही और भाजपा पलटवार तो दूर बचाव भी ठीक से नही कर पाई। युवा नगर संगठन के सामने ये चुनाव पहली चुनोती था। इसके पहले कोई बड़ा अनुभव भी नही था। लिहाजा युवा टीम को इसे गम्भीरता से लेना था ताकि पार्टी का पीढ़ी परिवर्तन का फैसला सही साबित होता। लेकीन हुआ इसके ठीक उलट। पूरे चुनाव में उसी पीढ़ी की रह रहकर कमी खली जिसके जरिये अब तक भाजपा का विजयी अश्व दौड़ता रहा।

अनुभवी नेताओ ओर कार्यकर्ताओं के बगेर ये चुनाव भाजपा की वैसी ” ठसक ” स्थापित नही कर पाया जैसी अब तक इस शहर में हुए तमाम चुनावो में रहती आई। पार्टी की एक बड़ी आमसभा तक इस बार नही हो पाई। मुख्यमंत्री के रोड शो भी फीके रहे और नेताओं के बयान भी। 20 सदस्यो वाली बूथ वार्ड समिति भी वक्त आने पर मैदान में दम तोड़ गई।जबकि इनके दम पर ही सुनिश्चित विजय का सपना बुना गया था। ” उपर से बेलबुटा-अंदर से पेंदा फूटा ” वाली कहावत इस बार भाजपा के स्थानीय संगठन की ” चार सितारा” चुनावी तैयारियों में सच साबित हो गई।