उत्तम स्वामी जी: घर को राम-राम कर किया मठ मे वास

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नाथ संप्रदाय का एक मठ पंढरपुर में में भी था. पंढरपुर मठ में पहुंचने तक उत्तम पैंट शर्ट पहने हुआ था. मठ में जाते ही उसने महाराज से कहा मैं साधु बनने आया हूं अब यह पैंट शर्ट नहीं पहनूंगा, मुझे साधुओं के कपड़े दो.  महाराज के मन में संशय था यह रहेगा अथवा नहीं यह प्रकार से टालने के लिए  उन्होंने कहा “एक बार सन्यासी के वस्त्र स्वीकार करने के बाद छोड़ नहीं पाओगे अभी रहने दो” उत्तम अपनी बात पर दृढ़ था उत्तम के हट को देखते हुए महाराज ने पहनने के लिए एक अपनी बनियान तुलसी की माला दी .

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उत्तम ने मठ में मन लगा कर सेवा की. पूजा पाठ की व्यवस्था तो देखता ही था साफ-सफाई के साथ भोजन भी बनाता था.  मठ में सामान्यतः 12-15 लोग रहा करते थे . छोटा सा बालक प्रसन्न है वदन सब काम करता.  मठ में लगी हुई काफी भूमि थी . बड़ी मात्रा में फूल के पौधे लगे हुए थे प्रतिदिन फूल तोड़कर बाजार जाकर उन्हें बेचकर मठ के नित्य खर्चे के लिए धन जुटाता .

अलौकिक अध्ययन की इतिश्री तो घर छोड़ने के साथ ही हो गई थी.  घर से निकला तब सातवीं कक्षा में पढ़ता था. मठ में न तो अध्ययन की व्यवस्था थी ना कोई पढ़ाने वाला पढ़ाने में किसी की विशेष रुचि भी नहीं थी. मठ में कोई पढ़ा था नहीं था और प्रगति विद्या के प्रति उत्तम के मन में चाह नहीं थी संगीत से प्रेम बचपन से ही था. वेदाध्ययन करना भी चाहता था. शांतिनाथ महाराज की इच्छा के विरुद्ध शास्त्र अध्ययन के लिए पंढरपुर के विद्वान रानडे शास्त्री तथा संगीत शिक्षा के लिए दोंदेकर गुरुजी के पास जाने लगा उत्तम के प्रति अधिक स्नेह के कारण शांतिनाथ महाराज ने प्रत्यक्ष विरोध नहीं किया. पढ़ने जाने के कारण मठ किसी कार्य में कमी अथवा आलस नहीं करता था फिर भी मटके बाकी लोग उत्तम के पढ़ने जाने से अप्रसन्न रहते थे तरह तरह की बाधा उपस्थित करते रहते थे.

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उत्तम की योग सीखने की इच्छा हुई एक योग गुरु भी ढूंढ लिया लेकिन समय कहां था. दिन भर तो मठके काम में निकल जाता भोजन के पश्चात विश्राम करने के स्थान पर वेदाध्ययन व संगीत सीखने जाता शाम होते ही मठ के काम में लगना पड़ता इसलिए सुबह 2:30 बजे उठ जाता और मुहं अँधेरे योग सीखने जाता . इस पर मठ वासियों ने इतना हल्ला मचाया किया गया उसे तुरंत बंद करना पड़ा इस प्रकार सेवा अध्ययन करते 3 वर्ष की ते पंढरपूर में किसान मेला था उत्तम का बड़ा भाई मधुकर मेले में सम्मिलित होने पंढरपुर आया था. अतः स्वाभाविक एक छोटे भाई से मिलता मेले के कार्यक्रम से निवृत हो वह भाई से मिलने मठ में उन दिनों आश्रम में निर्माण कार्य चल रहा था बाकी कामों के साथ-साथ उत्तम निर्माण कार्य में भी सहयोग करता जब मधुकर आश्रम आया उस समय उत्तम सामान ढोकर ले जा रहा था.छोटे भाई को इस प्रकार काम करते देख उसे बड़ा दुख हुआ गांव वापस लौट उसने माता-पिता से आग्रह किया कि भाई को वापस लाना चाहिए उसका जीवन है मुझसे देखा नहीं गया

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बड़े पुत्र का अपने स्थान पर ठीक था परंतु माता-पिता जानते थे पंढरपुर जाने का उपयोग नहीं होगा दृढ़ निश्चय पुत्र लौटेगा नहीं.

3 वर्ष कड़ा परिश्रम कर वेद उपनिषद पुराण गीता भागवत शिक्षा शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा प्राप्त की वेदाध्ययन पूर्ण होने के पश्चात आगे की पढ़ाई के लिए संत ज्ञानेश्वर के जन्म स्थान आलंदी में आ गया. आनंदी में वारकरी संप्रदाय संस्थान की अच्छी पाठशाला है. यहां 3 वर्ष रह कर उसने व्याकरण छंद संगीत तथा प्रचलन करना सिखा यहां भी शांति नाथ महाराज का मंथन जिले के पाटन ग्राम के समीप जंगल में भीमा नदी के तट पर एक सुंदर स्थान है. चिंतन मराठी में इमली को चेंज कहां जाता है चारों और बड़ी संख्या में इमली के पेड़ है इसलिए इस स्थान का नाम चेंज वन बड़ा शांतिनाथ महाराज का यहां पर छोटा सा स्थान है. आज भी उस निर्जन में अकेले रहना आसान नहीं है अध्ययन पूर्ण हो चुका था इसलिए चिंतन मनन के निमित्त उत्तम चिंचवड के निर्जन में रह रहा था. आज में ग्रामवासी खाने पीने का सामान दे जाते थे चिंचवड का ही एक अंग है एक दिन रात को नदी में बाढ़ आई उत्तम तखत पर गहरी निद्रा में था नदी का पानी बढ़ते-बढ़ते मठ में घुस आया सारा सामान पानी में तैरने लगा जब पानी ने शरीर को छुआ के कारण हुई लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और पानी भरा हुआ था आसपास सांप घूम रहे थे. तैरना नहीं था फिर भी साहस कर तखत से उतर कुटिया के बाहर निकला तब तक बाढ़ का समाचार आज तक पहुंच चुका था लोग बाल योगी की  खोज में आए और अपने साथ ले गए.

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