माटी के श्री गणेश ने बढ़ाया शहर का मान, अब विसर्जन में भी रखना प्रकृति का ध्यान- महापौर पुष्यमित्र भार्गव

महापौर पुष्यमित्र भार्गव, इंदौर। मित्रों विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश के आगमन से सम्पूर्ण नगर के घर, आंगन, सड़क के वातावरण में भक्ति, शक्ति और आनंद की अनुभूति का संचार हो गया। घर के छोटे-छोटे श्री गणेश से लेकर पंडालों की विशाल प्रतिमा तक मन को आनंदित कर रही है। लेकिन मित्रों इस साल श्री गणेश महोत्सव में, विशेष बात है इंदौर के नागरिकों द्वारा पर्यावरण की रक्षा के लिए माटी के श्री गणेश विराजमान करने की क्रांतिकारी पहल।

एक ऐसी कोशिश जिसने ना केवल हमारे जल और थल को संरक्षण प्रदान किया, बल्कि छोटे-छोटे मूर्तिकार जो माटी के गजानन बनाते है, उनकी मेहनत का सम्मान कर उन्हें रोज़गार भी दिया। परन्तु दोस्तों भगवान के आगमन के पश्चात हमारी असली परीक्षा अब आ रही है और वो है मूर्ति विसर्जन। जिसमे एक तरफ हमे प्रेम-सोहाद्र के साथ गणपति बप्पा को विदा करना है, तो दूसरी तरफ़ ईश्वर की बनाई प्रकृति की रक्षा भी करना है।

अतः मेरा आपसे अनुरोध है कि जिस तरह श्री गणेश जी के आगमन पर आपने पर्यावरण संरक्षण का ध्यान रखा वैसे ही विदाई के समय भी प्रकृति का मान रखें।

सबसे पहली बात कई बार ये देखा गया है कि 10 दिन तक हम जिन गजानन भगवान का गुणगान करते है। पूजन करते है। विसर्जन के समय उन्ही आराध्य को मैले स्थानों पर फैंक देते है। थैलों में भरकर किशनपुरा, पंढरीनाथ या अन्य स्थानों के ब्रिजों से कचरे के समान फैंक देते है। ये दृश्य आपने-मैंने कई बार देखा है। जो व्यक्तिगत रूप से मुझे बेहद व्याकुल और द्रवित करता है। इसलिए मेरा आपसे अनुरोध है कि आप ऐसा बिल्कुल ना करें। अगर आप विसर्जन करने नहीं जा सकते तो नियत स्थानों पर जहाँ प्रशासनिक या व्यक्तिगत या अन्य संस्थाओं द्वारा मूर्तियों को एकत्रित किया जा रहा है, आप वहां मूर्तियों को पहुँचा दे। जिससे निश्चित स्थान पर विधवत समस्त मूर्तियों का विसर्जन हो सके।

साथियों दूसरी बात हमारे शहर के तालाब या जलाशय, जो ना केवल हमारी और अन्य जीव-जंतुओं की प्यास बुझाते है, बल्कि हमारे लिए अन्न पैदा करने वाले खेतों की भूमि को सींचते भी है, उनमें विसर्जन कर जल को प्रदूषित या विषाक्त ना करें। बल्कि कोशिश करें कि चिन्हित स्थानों पर ही मूर्ति विसर्जन किया जाए।

सबसे अच्छा तो ये है, कि हम अपने बप्पा को अपने घर मे ही एक बर्तन में पानी भरकर उसमें ही विसर्जित करें और बाद में उस जल को पौधों में डाल दे। जिससे जल संरक्षण के साथ जल का पुनः उपयोग भी हो जाएगा और मूर्ति के रंग या अन्य तत्वों से प्राकतिक जल स्त्रोतों को नुकसान भी नहीं होगा।

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एक विशेष ओर ध्यान देने योग्य बात कि हर वर्ष मूर्ति विसर्जन के समय अति उत्साह, किसी ना किसी व्यक्ति विशेषकर युवाओं को किसी अप्रिय दुर्घटना का शिकार बनाता है।

कई बार हमारी गलती भी किसी और व्यक्ति के जीवन को संकट में डाल देती है। विसर्जन के माहौल में मधपान कर वाहन चलाना जो दुर्घटनाओं को बढ़ाता है या जलाशय में गहरे पानी मे उतरना जो ना केवल हमे बल्कि हमसे जुड़े लोगों के लिए भी एक त्रासदी बन जाता है, जो त्योहार की खुशियों को मातम में बदल देता है।

इसलिए महापौर के रूप में नहीं बल्कि एक मित्र, एक भाई, एक पुत्र के रूप में मेरा आप सभी इंदौर वासियों से करबद्ध निवेदन है कि अति उत्साह में अपना या दूसरों का जीवन जोखिम में ना डाले। अनंतचतुर्दशी के चल समारोह में भी आप सभी नियमों का पालन करते हुए ही पूरी सुरक्षा, सतर्कता, सहजता और समन्वय के साथ इंदौर झांकियों का आनंद ले।
ये याद रखें कि त्योहार मनाना है पर अभी भी हमें कोरोना को हराना है इसलिए मास्क और निश्चित दूरी के साथ आनंद ले।
मित्रों हमारी यही छोटी-छोटी कोशिशें हमें भारत ही नहीं विश्व के सबसे व्यवस्थित, सुशासित इंदौर का नागरिक बनायेगी इन्ही मंगलकामनाओं के साथ
जय श्री गणेश
जय हिंद

आपका पुष्यमित्र भार्गव
महापौर इंदौर