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सवर्णों को आरक्षण से ज्यादा जरूरत रोजगार के अवसरों की है..!

Posted on: 09 Jan 2019 09:17 by Ravindra Singh Rana
सवर्णों को आरक्षण से ज्यादा जरूरत रोजगार के अवसरों की है..!

अजय बोकिल

मोदी सरकार द्वारा सामान्य वर्ग को सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण को भाजपा और सहयोगी दल भले लोकसभा चुनाव की दृष्टि से भले ‘गेम चेंजर’ मान रहे हों, लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से यह दांव ‘गेम चेंजर’ साबित होगा या ‘गेम एंडर’, यह अभी तय होना है। हालांकि इसके लिए सरकार आरक्षण के साथ-साथ ताबड़तोड़ संविधान संशोधन बिल भी लाई है। चूंकि ज्यादातर राजनीतिक दल अपने सियासी हितों को ध्यान में रखते हुए इस बिल का समर्थन कर रहे हैं, इसलिए इसका लोकसभा में पारित होना तय था। गहराई से देखें तो राजनीतिक लाभ के लिए इस ‍बिल को सवर्ण आरक्षण के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन वास्तव में यह उन सभी वर्गों के लिए है, जो अनारक्षित या सामान्य श्रेणी में है।

अर्थात हिंदू सवर्णों के अलावा मुसलमान, ईसाई, सिख, जैन, बौद्धो, पारसी आदि। देश में आबादी के लिहाज से इनकी कुल संख्या करीब 30 करोड़ होती है। दूसरे, यह आरक्षण आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर है न कि जातीय आधार पर। हो सकता है कि इस कदम से सामान्य और खासकर हिंदू सवर्ण फिर भाजपा की ओर आकर्षित हों, लेकिन असली राजनीतिक और सामाजिक लड़ाई तो इस गढ़ी को सर करने के बाद ही शुरू होने वाली है। इसके लक्षण अभी से दिख रहे हैं। इसके पीछे कुछ ठोस और वस्तुनिष्ठ कारण हैं।

पहला सवाल तो यही है ‍कि क्या यह आर्थिक आरक्षण कोर्ट में टिकेगा? इसको लेकर यह बिल लाने वाली सरकार खुद आशंकित है। फिर भी उसे विश्वास है कि यह कोर्ट में टिकेगा, क्योंकि यह बिल संविधान संशोधन के साथ लाया जा रहा है, जिसमे नौकरियों में आरक्षण की सीमा वर्तमान में 49.5 से बढ़ाकर 59.5 फीसदी करने का प्रावधान है। लेकिन अभी तक संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान नहीं है। थोड़ी देर के लिए मान लें कि यह आरक्षण कोर्ट में टिकेगा, उसके बाद भी यह सवाल बाकी है कि इस आरक्षण से सवर्णों व अन्य अनारक्षितों को वास्तव में कितना लाभ मिलेगा? सरकार ने बिल में 10 फीसदी आरक्षण के लिए जो सीमा तय की है, वह है 8 लाख रू. वार्षिक आय और 5 एकड़ कृषि भूमि।

अर्थात इससे कम वाले ही आरक्षण के हकदार होंगे। परिवार की वार्षिक आय 8 लाख रू. होने का मतलब है कि सवर्णों सहित सभी अनारक्षितों की 90 फीसदी आबादी का आरक्षण के दायरे में आ जाना। मजे की बात यह है कि सरकार 3 से 5 लाख रू. तक की वार्षिक आय वालों को 5 फीसदी आयकरदाता मानती है। जिस 8 लाख इनकम की सीमा बांधी गई है, उस श्रेणी के करदाता तो 20 फीसदी इनकम टैक्स देते हैं। इन लोगों को आरक्षण की क्या जरूरत? इसी प्रकार 5 एकड़ कृषि भूमि की सीमा का भी ज्यादा फायदा इसलिए नहीं है कि सवर्णों और मुस्लिम आबादी के कुछ हिस्से को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर अनारक्षित वर्ग या तो नौकरीपेशा है या फिर अपना छोटा-मोटा कारोबार करता है। देश में ज्यादातर जमीने जिनके पास हैं, वो ओबीसी में आते हैं।

दूसरा सवाल यह है कि जब अनारक्षित श्रेणी के 90 फीसदी लोग आरक्षित श्रेणी में चले जाएंगे तो आरक्षण के बावजूद जरूरतमंदों को नौकरियां कितनी मिल पाएंगी ? क्योंकि प्रतिस्पर्द्धा का स्तर लगभग वही रहेगा। आज सवर्ण और अन्य अनारक्षित वर्ग के बच्चों को मेरिट के आधार पर ही शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश और सरकारी नौकरियां मिलती हैं। नई परिस्थिति में हालात कमोबेश वही रहना है, क्योंकि तकरीबन सभी लोग आरक्षित वर्ग में आ चुके होंगे। इसका अर्थ यही है कि आरक्षित वर्ग में भी सर्वाधिक अंक पाने वाला ही नौकरी का हकदार होगा। इसी स्थिति का सामना तो आज भी सवर्ण और अनारक्षित वर्ग के बच्चे कर रहे हैं तो फिर फर्क क्या पड़ेगा?

बेहतर होता कि सरकार या तो नाॅन इनकम टैक्स पेयी अथवा बीपीएल सवर्णों और अनारक्षितों को इस आरक्षण का लाभ देती। आरक्षण की असली जरूरत इसी वर्ग को है। लेकिन लगता है कि सरकार सवर्णों को केवल वोट बैंक के रूप में तौल रही है, इसलिए यह रेवड़ी सभी को बांट दी। लेकिन उसे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सवर्णों का वोट बैंक कोई भेड़ चाल की तरह वोट नहीं देता और न ही वह केवल आरक्षण से अपने हितों और अस्मिता को तौलता है।

इससे भी बड़ा सवाल यह है ‍कि आरक्षण अगर मिल भी जाए तो नौक‍िरयां कहां हैं? यही सवाल केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने पिछले दिनों बेबाकी से किया था तो वो ट्रोल हुए थे। क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि भारत में जहां एकतरफ बेरोजगारी की दर लगातार बढ़ रही है, दूसरी तरफ रोजगार की दर निरंतर घट रही है। सीएमई ग्रुप की रिपोर्ट के मुताबिक देश में वर्ष 2017 में जहां 40 करोड़ 67 लाख रोजगार नि‍र्मित हुए, वहीं 2018 में यह संख्या बढ़ने के बजाए घटकर 40 करोड़ 60 लाख रह गई। इसका सीधा अर्थ है ‍कि सरकार की आर्थिक नीतियां ऐसी नहीं है, जो नए और बड़े पैमाने पर रोजगार ‍निर्माण को बढ़ावा दें। आज भारत में बेरोजगारी की दर 3.52 प्रतिशत है और बेकारों की संख्या करीब 18 करोड़ है। यूं आर्थिक दृष्टि से देश प्रगयति कर रहा है, लेकिन यह वृद्धि रोजगार विहीन ( जाॅब लेस ग्रोथ) है।

एक अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2030 तक भारत में हर साल 10 करोड़ रोजगार सृजन की जरूरत होगी। जबकि भारत सरकार की संस्था ईपीएफओ की वर्ष 2017-18 की रिपोर्ट बताती है कि देश में 3.96 नौकरियां ही सृजित हुईं। इसी से जरूरत और आपूर्ति के फर्क का अंदाजा लगाया जा सकता है।

कहने का तात्पर्य यह कि आरक्षण दे भी दिया गया तो नौकरियां हैं कहां? और नौकरियां ही नहीं हैं या फिर ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं, तो 10 फीसदी तो क्या 100 फीसदी आरक्षण भी दे दिया जाए तो भी उसका व्यावहारिक अर्थ शून्य ही है। जाहिर है कि यह भाजपा का चुनावी टोटका ज्यादा है, जो सवर्ण वोट बैंक को फिर से झोली में समेटने की नीयत से लाया गया है। कोई राजनीतिक दल इसका खुलकर विरोध इसलिए नहीं कर रहा, क्योंकि सबको मालूम है कि धरातल पर इसे लागू करना आसान नहीं है। इसे लागू करने के बाद भी सवर्णों और अनारक्षितों को कोई खास राहत नहीं मिली तो यह कदम राजनीतिक दृष्टि से बूमरेंग भी साबित हो सकता है। दरअसल अनारक्षितों और खासकर सवर्णो को आरक्षण से ज्यादा जरूरत रोजगार के अवसरों की है, खुद की काबिलियत साबित करने का माद्दा तो उनमे जन्मत: है। क्या आपको नहीं ऐसा नहीं लगता?

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