स्कूली बच्चों की डगर, जान हथेली पर

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देवास। जहां पचास बच्चों के लिए स्कूल पहुंचाना किसी सर्कस की कलाबाजी की तरह होता है। जब बच्चे घर लौट आते हैं, तब घर के लोगों की जान में जान आती है। उन्हें हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर रस्सियों और ड्रम के सहारे उफनती हुई लबालब नदी को पार कर स्कूल तक जाना पड़ता है। गांव के लोग बरसों से यहां मिडिल स्कूल खोलने या नदी पर पुल बनाने की मांग करते रहे हैं, किंतु अब तक न तो स्कूल खुला और न ही नदी पर पुल बना। कभी महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज का सपना देखा था, लेकिन आजादी के 72 सालों बाद भी कई गांव आज तक बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरस रहे हैं। चमचमाती सड़क से भीतर यह ऐसा ही एक गांव है, जहां अभी विकास की रौशनी नहीं पहुंच सकी है।

इंदौर और देवास जिले की सीमा पर बसे छोटे-से गांव हिरली के बच्चे दो प्लास्टिक ड्रमों पर जाली लगाकर उसका नाव की तरह इस्तेमाल कर उफनती हुई नदी को पार कर स्कूल पहुंचते हैं। गांव में पांचवी से आगे का स्कूल नहीं है और आगे पढने के लिए तीन किमी दूर इंदौर जिले के सांवेर ब्लाक के सिमरोल गांव जाना पड़ता है, लेकिन इसी रास्ते पर क्षिप्रा नदी पड़ती है। बाकी महीनों में तो बच्चे नदी की रपट से जैसे तैसे स्कूल तक का सफर पूरा कर लेते हैं पर बारिश और उसके कुछ महीनों बाद तक रपट के ऊपर पानी बहता रहता है। ऐसे में यह वैकल्पिक नाव ही उनके लिए एकमात्र सहारा होती है। करीब एक हजार की आबादी वाले इस गांव के ज्यादातर लोग किसान हैं।

वे खेतीबाड़ी में व्यस्त होते हैं। स्कूल जाने वाले बच्चों की परेशानी को देखते हुए गांव वालों ने चंदा इकट्ठा किया और बच्चों के लिए प्लास्टिक ड्रम और उस पर लोहे की जाली से तैरती हुई नाव की तरह जुगाड़ की है। नदी के दोनों छोरों पर रस्सी बांधी जाती है और इसी के सहारे या जुगाड़ की नाव एक से दूसरे किनारे तक पंहुचती है। क्षिप्रा नदी देवास से उज्जैन के बीच बहने वाली बड़ी नदी है और उज्जैन में सिंहस्थ भी इसी नदी के किनारे भरता है। यहां नदी 20 फीट तक गहरी है। जुगाड़ में एक बार में 10-12 लोग सवार हो सकते हैं।

उज्जैन जाने वाले रास्ते पर देवास जिला मुख्यालय से मात्र 18 किमी दूर गांव हिरली के पास नदी बहती है। नदी के इस पार है हिरली और उस पार है इंदौर जिले का गांव सिमरोल। हिरली में प्राथमिक स्कूल ही है और आगे पढ़ने के लिए बच्चों को या तो पांच किमी दूर बैरागढ़ जाना पड़ता है या नदी पार कर सिमरोल। अधिक सुविधाजनक होने से बच्चे बैरागढ़ की जगह सिमरोल जाना ही पसंद करते हैं। दोनों गांवों के बीच की दूरी तीन किमी से कम होने से शासन के नियम अनुसार हिरली में मिडिल स्कूल नहीं हो सकता।

लोग यहां बीते तीस सालों से स्कूल या पुल की मांग करते रहे हैं, लेकिन आज तक न तो पुल बना और न ही स्कूल। कई बार बाढ़ आ जाने की स्थिति में बच्चों की भारी फजीहत हो जाती है। कई बार जुगाड़ की नाव पलटने और रस्सी टूटने के हादसे भी हो चुके हैं। जब बारिश तेज होती है और नदी में बाढ़ के हालात होते हैं तो छोटे-छोटे बच्चे इस जुगाड़ से नदी पार करते हुए डरते भी हैं। छठवीं में पढ़ने वाले दस साल के रेहमत पिता शब्बीर अली ने बताया कि इस बार जब पहली बार उसने अपने सहपाठियों के साथ जुगाड़ पर खड़े होकर नदी पार की तब बीच मझधार में आते वक्त उसकी जान अटक गई थी। उसने बताया कि अंकल बहुत डर लगता है। मुझे तैरना भी नहीं आता है।

नदी उफान पर होती है तो लहरें उठती है, कहीं लहरों में पलट न जाए, इसका डर हमेशा बना रहता है। मेरे मम्मी-पापा भी स्कूल से मेरे लौटने तक नदी तरफ ही मेरा इंतजार करते रहते हैं। 11साल की अफसाना पिता अय्यूब खान कहती है कि कभी मन में आता है कि पढना ही छोड़ दूं, किंतु पढ़ना अच्छा लगता है। पढ़ाई करना है तो हर दिन यह खतरा तो उठाना ही पड़ेगा। पालक लियाकत खां और परवेज खां के मुताबिक हमारे बच्चे पढ़ना चाहते हैं, लेकिन स्कूल तक जाने में नदी आती है। मन तो नहीं करता कि अपने बच्चों की जान रोज खतरे में डालें, किन्तु मजबूरी है कि न तो हमारे यहां पुल है और न ही स्कूल। हमें बच्चों को जुगाड़ के भरोसे ही भेजना पड़ता है।

जब नदी रौद्र रूप में होती है तो जान सूख जाती है। जब तक शाम को बच्चे सही सलामत घर नहीं पहुंच जाते, तब तक किसी काम में मन नहीं लगता। आठवीं में पढ़ने वाली शबाना पिता रईस खान बताती है कि इसका सबसे बड़ा खामियाजा उठाना पड़ता है लड़कियों को। यहां लड़के तो फिर भी जैसे-तैसे आगे पढ़ने चले जाते हैं, किंतु ज्यादातर लड़कियों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है। गांव के लोग बताते हैं कि यहां हर साल 20 से 25 लड़कियों की पढ़ाई इसी कारण छूट जाती है। दसवीं की छात्रा सुल्ताना ने बताया कि उसकी सहेलियों और उनके घर वालों ने इसी डर की वजह से पांचवीं के बाद स्कूल ही छोड़ दिया। यह गांव मप्र के पूर्व शिक्षा मंत्री दीपक जोशी के विधानसभा क्षेत्र हाटपीपल्या में आता है। उन्होंने अपने मंत्री कार्यकाल में यहां जल्दी ही स्कूल और नदी पर पुल बनाने का आश्वासन ग्रामीणों को दिया था, लेकिन पांच साल में उनका यह वादा पूरा नहीं हुआ।

इस बार वे चुनाव हार चुके हैं। हिरली के सरपंच राजेश परमार बताते हैं कि जिले के वरिष्ठ अधिकारीयों से लेकर राजधानी तक कई बार हमने इस आशय का प्रस्ताव ग्राम पंचायत की ओर से भेजा, लेकिन कभी कहीं से कोई सुनवाई नहीं हुई। यदि आठवीं तक स्कूल खुल जाए तो बच्चों को खतरे की सवारी का जोखिम नहीं उठाना पड़े। शिक्षा मंत्री से भी बात हुई है, उन्होंने पुल के लिए पंचायत के प्रस्ताव को भोपाल भेजा है। जनपद प्रतिनिधि इश्तियाक शेख बताते हैं कि हमारे बच्चे रोज जोखिम उठाते हैं, मगर कोई सुनने वाला नहीं है। बच्चों का पूरा दिन इसी मशक्कत में चला जाता है पर पढ़ना भी जरूरी है। 30 साल से शिकायत कर रहे हैं। नेता सिर्फ वोट लेने आते हैं, कोई काम नहीं करता।

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