धर्मव्रत / त्यौहार

नर्मदा परिक्रमा के प्रकाशा में उत्तर काशी जितना पुण्य यहाँ भी स्नान और दर्शन से मिलता है

भाग 2

नर्मदा परिक्रमा दूसरा दिन…

सुबह 5 बजे उठ गया। 6 बजे मंदिर में आरती होती है इसलिए जल्दी नहाने का सोचा। राजघाट पर अभी भी कीचड़ था इसलिए मंदिर में ही नहाने का निश्चय किया। सुबह 5:30 नहाना और वो भी इतनी ठंड में… घर पर तो मस्त गरम पानी से नहाता था लेकिन अब रोज़ ठंडे पानी से ही नहाना है वो भी सुबह जल्दी। मन कट्ठा कर ठंडे पानी का पुरा टब अपने ऊपर उड़ेल लिया। स्नान के बाद भी 15 मिनट तक दाँत किटकिटाते रहे। राजघाट जा कर नर्मदा जी के दर्शन कर यात्रा शुरू की। पैदल जाने वाले घाटी होते हुए खेतिया पहुँचने वाले थे। मैं सिलावद, पलसूद, नेवली, पानसेमल होते हुए खेतिया पंहुचा। इन आदिवासी गाँवों में सुबह जल्दी हो जाती है और सूर्यास्त तक नीरवता पसर जाती है। ये गाँव अभी भी पिछड़े हुए है लेकिन जैसा लोग बताते है लूटपाट का डर अकेले होते हुए भी नही लगा। बल्कि रास्ता पूछने पर बड़े प्रेम से बताया। खेतिया में गाड़ी को आराम देने और चाय के लिए रुका।

यहां से महाराष्ट्र की सीमा प्रारम्भ होती है। कुछ देर बाद शहादा(महाराष्ट्र) पहुँचा। रास्ता थोड़ा खराब होना शुरू हो गया। प्रकाश आने तक रोड की हालत और खराब हो गयी। तापी, गोमती और पुलिंदा के त्रिवेणी संगम पर स्थित प्रकाशा को दक्षिण काशी कहा जाता है। उत्तर काशी जितना पुण्य यहाँ भी स्नान और दर्शन से मिलता है। कार्तिक स्वामी और मुक्तेश्वर महादेव के दर्शन कर आगे बढ़ा। आगे मुझे अक्कलकुआ होते हुए गुजरात में प्रविष्ट होना था पर रास्ता और बदतर होता गया। इतना खराब की 100 किमी चलने में मुझे साढ़े पाँच घंटे लग गए। शूलपाणि के जंगल किनारे होते हुए गुजरात शुरू हो गया पर रोड अभी भी खराब ही था। शाम होने आयी…. जंगली रास्ता और रुकने का ठिकाना कही दिखाई नही दे रहा था। गुजरात के बेडियापाड़ा के पहले मुझे सदाव्रत लिखा बोर्ड और कुटिया नज़र आयी। मन प्रसन्न हो गया। रुकने की जगह मिल गयी। परिक्रमा में सदाव्रत लिखा कही भी मिल जाए तो समझो परिक्रमवासियों के रुकने या भोजन की व्यवस्था जरूर मिलेगी। ये सब कैसे और किसके सहयोग से होता है पता नही।

narmada parikrama

कोई विज्ञापन, प्रचार या चंदा नही। एकमात्र ध्येय सेवा। अंदर पंहुचा। तो एक माताजी ने नमस्कार कर कहा आप हॉल में आराम करें। 7 बजे भोजन मिल जाएगा। अकेला ही था और कोई नही। नहाकर भोजन कर कल के रास्ते की योजना बनाने लगा और सोचने लगा कोई और भी साथ होता तो अच्छा होता। करीब 15 मिनट बाद ही दो गाड़ियां आकर रुकी और करीब 25 लोग हॉल में आ गए। अकेले सोने के सिर्फ विचार करने मात्र से नर्मदाजी ने 25 लोगो का साथ दे दिया। उनका भोजन बनने तक सभी ने करीब एक घण्टे तक भजन कीर्तन किया। पूरी थकान मिट गयी। बातचीत करने पर उन्होंने बताया की वापसी में आपको लखनादौन आएगा। हम वहीं के रहने वाले है। वहाँ पहुँच कर आप फ़ोन कर देना। आपकी पूरी व्यवस्था हो जाएगी। अगले दिन जल्दी निकलने का सोचा था इसलिए गुडमुड होकर सो गया। आसपास घना जंगल.. ठंड बहुत थी और जमीन पर बिछाने को सिर्फ एक चादर….