नड्डा की गाइडलाइन पर अडिग नहीं रही भाजपा

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भोपाल प्रवास के दौरान टिकट के लिए गाइडलाइन का ऐलान यह कहते हुए किया था कि पार्टी हार भले जाए लेकिन इस पर अमल किया जाएगा। तीन बिंदु प्रमुख थे।

दिनश निगम ‘त्यागी’

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भोपाल प्रवास के दौरान टिकट के लिए गाइडलाइन का ऐलान यह कहते हुए किया था कि पार्टी हार भले जाए लेकिन इस पर अमल किया जाएगा। तीन बिंदु प्रमुख थे। पहला, निकाय चुनाव में किसी विधायक को टिकट नहीं दिया जाएगा। दूसरा, नेताओं के परिजनों को टिकट नहीं मिलेगा और अपराध के मामले में जीरो टॉलरेंस अपनाया जाएगा अर्थात आपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्ति को भी मौका नहीं मिलेगा। भाजपा नेतृत्व अपने अध्यक्ष की इस गाइडलान पर पहले स्थानीय चुनाव में ही अडिग नहीं रह सका।

अलबत्ता, विधायकों को टिकट न देने के नियम का जरूर सख्ती से पालन हुआ। आरोप है कि इस गाइडलाइन का पालन भी इसलिए हो गया क्योंकि इंदौर में भाजपा महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय के खास विधायक रमेश मैंदोला को महापौर का टिकट देने से रोकना था। इंदौर के एक माफिया की पत्नी का टिकट देने के बाद जरूर बदल दिया गया वर्ना कई आपराधिक प्रवृत्ति के लोग टिकट पा गए। नेताओं के परिजनों को भी जमकर रेवड़ियां बंटी। जब गाइडलाइन टूटना ही थी तो इंदौर से मैंदोला और भोपाल में विधायक कृष्णा गौर में क्या बुराई थी। इतना ही होता कि यह गाइडलाइन भी टूट जाती।

लीजिए, ज्योतिरादित्य पर भारी पड़ गए नरेंद्र

भाजपा में जो होता है, उसकी झलक स्थानीय चुनाव से ही देखने को मिलने लगी। आमतौर पर पार्टी नेतृत्व बाहर से आए नेताओं की तुलना में अपने पुराने निष्ठावान नेताओं को ज्यादा तवज्जो देता है। इस मसले पर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपवाद के तौर पर देखा जा रहा था। वे बड़ा चेहरा हैं। उन्हें चाहने वाले काफी हैं। उम्मीद थी कि कम से कम चंबल-ग्वालियर अंचल में उनकी पसंद को तरजीह दी जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुरैना तो छोड़िए, ग्वालियर में भी वे महापौर प्रत्याशी के लिए अपनी पसंद पर मुहर नहीं लगवा पाए।

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यहां पार्टी के स्थापित नेता केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर सिंधिया पर भारी पड़ गए और अपनी पसंद की सुमन शर्मा को महापौर प्रत्याशी बनवा दिया। मजेदार बात यह है कि सुमन को जिताने की जवाबदारी सिंधिया के कंधों पर डाली जा रही है। बता दें, यहां सिंधिया अपनी रिश्तेदार माया सिंह के लिए टिकट चाहते थे। सवाल यह है कि क्या भविष्य में आने वाले चुनावों में वे अपने समर्थकों का संरक्षण कर पाएंगे? समझौता सिर्फ मौजूदा सरकार के मंत्रमंडल और निगम मंडल अध्यक्षों तक ही सीमित तो नहीं था? इसे लेकर अटकलें शुरू हो गई हैं।

कुछ मामलों में भाजपा पर इक्कीस हैं कमलनाथ

प्रबधंन, साधन और सुविधाओं की दृष्टि से कांग्रेस भले भाजपा की तुलना में उन्नीस दिखाई पड़े लेकिन टिकट वितरण और गाइडलाइन के पालन में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ समूची भाजपा पर इक्कीस साबित हो रहे हैं। जैसे, नगर निगमों के महापौर प्रत्याशियों की घोषणा पहले कर कांग्रेस ने बाजी मार ली। दूसरा, गाइडलाइन का पालन करते हुए एक वार्ड के नेता को दूसरे वार्ड से टिकट नहीं दिया। हालांकि इसकी वजह से कुछ नेता पार्टी छोड़ गए। कांग्रेस द्वारा घोषित प्रत्याशी हारें या जीतें, लेकिन उन्हें कमजोर नहीं कहा जा सकता।

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इसीलिए इस बार निकाय चुनावों में कांग्रेस को पहले से अच्छा करने की उम्मीद है। कमलनाथ की योजना विधानसभा चुनाव भी इसी तर्ज पर लड़ने की है। खबर है कि लगभग सौ विधानसभा सीटों के कांग्रेस प्रत्याशी तय हो चुके हैं। चुनाव की घोषणा के साथ इनके नामों का ऐलान कर दिया जाएगा। शेष सीटों पर जीतने की क्षमता वाले प्रत्याशियों के लिए सर्वे जारी है। एनजीओ के माध्यम से हर सीट में कुछ लोग पेड वर्कर के तौर पर भी इस काम में लगाए गए हैं। निकाय की तर्ज पर विधानसभा चुनाव के लिए भी गाइडलाइन होगी, जिस पर सख्ती से अमल किया जाने की योजना है।

दलबदलू विधायकों से ज्यादा दमदार तो ‘सिद्धार्थ’

प्रदेश के स्थानीय चुनावों के दौरान और राष्ट्रपति चुनाव की घोषणा के बीच दो राजनीतिक घटनाओं पर गौर फरमाने लायक हैं। दोनों दलबदल से जुड़ी हैं। पहली घटना में सपा के राजेश शुक्ला, बसपा के संजीव कुशवाह और निर्दलीय राणा विक्रम सिंह ने भाजपा ज्वाइन कर ली। खास बात यह है कि प्रदेश में जब कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी, तब ये तीनों विधायक कांग्रेस के पाले में खड़े थे। सत्ता बदली तो इनकी आस्था भी बदल गई।

इससे पहले विधानसभा चुनाव के दौरान भी आस्था बदलकर ही ये चुनाव लड़े और जीते थे। तय है कि इन विधायकों को विचारधारा अथवा किसी दल की नीतियों से कोई लेना देना नहीं है। इन्हें वहां रहना है जहां सत्ता का सुख भोगने को मिले। दूसरी घटना में भाजपा के कद्दावर नेता रहे पूर्व मंत्री जयंत मलैया के बेटे सिद्धार्थ ने भाजपा को अलविदा कहा लेकिन उन्होंने किसी दल में जाने की घोषणा नहीं की। उन्होंने कहा कि वे विचारधारा नहीं छोड़ सकते। वे उस पार्टी से अलग हुए जो सत्ता में है। अब आप ही बताईए, तीनों विधायकों की तुलना में दमदार तो सिद्धार्थ ही निकले न। इन विधायकों को मौकापरस्त के अलावा और किस शब्द से नवाजा जा सकता है?

‘गोविंद’ की बदौलत अब ‘किंग’ बनेंगे ‘किंगमेकर’

राजनीति में कब क्या हो जाए, कोई नहीं जानता। ‘प्रेम और जंग’ की तरह राजनीति में भी सब जायज है। सागर की राजनीति को ही लीजिए, यहां गोविंद सिंह राजपूत के परिवार में उनके भाई हीरा सिंह राजपूत हमेशा किंगमेकर की भूमिका निभाते रहे हैं। गोविंद का चुनाव भी गोविंद से ज्यादा हीरा सिंह लड़ते हैं। पहली बार वे किंग बनने की ओर अग्रसर हैं। मध्यप्रदेश में हीरा सिंह ऐसे एकमात्र जिला पंचायत सदस्य हैं जो निर्विरोध चुने जा चुके हैं। इसमें मुख्य भूमिका निभाई है लंबे समय तक एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी रहे मंत्रियों गोविंद सिंह राजपूत एवं भूपेंद्र सिंह ने।

राजपूत केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के खास हैं और भूपेंद्र मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के। दोनों के बीच बातचीत का नतीजा यह हुआ कि भूपेंद्र के भतीजे अशोक सिंह और उनकी पत्नी निवृत्तमान जिला पंचायत अध्यक्ष ने अपने नामांकन वापस ले लिए। उधर पूर्व विधायक हरवंश सिंह राठौर का नामांकन भी वापस हो गया। है न आज की राजनीति का करिश्मा, पिछले चुनाव तक कांग्रेसी रहे गोविंद के आग्रह पर सभी भाजपा नेताओं ने नामांकन वापस ले लिए और हीरा सिंह के जिला पंचायत अध्यक्ष अर्थात किंग बनने कर रास्ता साफ हो गया।