जयराम शुक्ला

विन्ध्य क्षेत्र के युवा महात्मा गांधी (Mahatma gandhi) से ज्यादा सुभाषचंद्र बोस (Subhash chandra bose) से प्रभावित थे व उन्हें ही अपना आदर्श मानते थे यही सब बाद में समाजवादी युवा तुर्क बने। 1942 में आजाद हिन्द फौज INA के गठन के बाद रीवा और पड़ोसी जिलों में इसकी शिविरें लगती थीं। जगदीश चंन्द्र जोशी के कमान्डरशिप में रीवा के पद्मधरपार्क मे नियमित परेड होती थी।

त्योंथर,मऊगंज जैसे कस्बों के युवा भी वहाँ शिविरें लगाते थे। कई युवा आजाद हिन्द फौज में गए भी। आजादी के बाद यही युवा कांग्रेस में जाने की बजाय सोशलिस्ट पार्टी में गये औऱ लोहिया,नरेन्द्र देव को अपना नेता माना। विन्ध्य में समाजवाद के आधार के पीछे सुभाष चंन्द्र बोस की ही प्रेरणा थी, यद्यपि नेता जी कभी यहाँ नहीं आए।

त्रिपुरी कांग्रेस में नेता जी के समर्थक युवाओं का सबसे बड़ा दल विन्ध्य से ही था। त्रिपुरी कांग्रेस में नेता जी ने महात्मा गांधी के उम्मीदवार सीतारमैय्या को हराया था बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया क्योंकि गांधी जी यही चाहते थे।

यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन के प्रस्ताव और मसवदे गोपनीय तरीके से रीवा के मार्तण्ड प्रेस में छपवाए गए थे। नेता जी के विजय जुलूस के लिए रीवा महाराज गुलाब सिंह ने यहाँ से हाँथी, घोड़े और बग्गघियाँ भेजी थी। नेताजी के प्रति इस पक्षधरता का खामियाजा महाराज गुलाब सिंह को उठाना पड़ा।

समूची बघेलखण्ड कांग्रेस महाराज के खिलाफ हो गई। 1942 में ही उत्तरदायी शासन की घोषणा ‘रीमा रिमहों का है’ करने के बाद अँग्रेज और भी कुपित हो गए। गुलाब सिंह पर कई हत्याओं के प्रकरण दर्ज किए गए। इंदौर की रेसीडेंसी कोठी में मुकदमे चले और अंततः अँग्रेजों की सह पर कांग्रेस के नेताओं ने युवराज मार्तण्ड सिंह व उनकी माता जी को मोहरा बनाया। गुलाब सिंह को उनके ही राज्य से आजीवन निर्वासित कर दिया गया।

यही एक प्रमुख वजह थी कि नेताजी और कांग्रेस के सोशलिस्ट गुट से प्रेरित विन्ध्य के सभी छात्र-युवानेता गुलाब सिंह के समर्थक बन गए व कांग्रेस तथा अँग्रेजों के खिलाफ समय-समय पर आंदोलन छेड़ते रहे। जगदीश जोशी, सिद्धविनायक द्विवेदी और बैजनाथ दुबे आदि के नेतृत्व में महाराज गुलाब सिंह की राज्य वापसी को लेकर ऐतिहासिक आंदोलन छेड़ा गया था जोशी जी बताते थे कि लक्ष्मणबाग के विशाल मैदान में कोई एक लाख से ज्यादा युवा जुटे थे। जगदीश जोशी ने ‘नेता- गुलाब’ नाम से एक लंबी काव्य रचना भी लिखी थी।

जगदीश जोशी जी अपने संस्मरणों में बताते थे कि उनदिनों युवाओं के आइकन नेता जी थे। आजादी के बाद विन्ध्य के युवाओं की आक्रमकता की ऊर्जा का स्त्रोत नेताजी का ही आदर्श था।

चार वर्ष पूर्व जगदीश जोशी जी की पुण्यतिथि पर आयोजित एक समारोह में समाजवादी युवा ब्रिगेड के अगुआ रहे महाबीर सिंह सोलंकी, ऋषभदेव सिंह ने जोशी जी से जुड़े संस्मरणों में कई ऐसे प्रसंग सुनाए जिनमें आजाद हिन्द फौज की शिविरों को लेकर जोशी जी भूमिका थी जिससे हम सर्वथा अनजान थे।

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एक पाठक की प्रतिक्रिया-

“गांधी नही नेता जी थे विन्ध्य के युवाओ के आदर्श ”
महोदय उपरोक्त वाक्य से आपने अपने लेख की शुरुआत की
आप गांधी को छोटा किये बिना भी नेता जी को बड़ा बता सकते थे
आज के समय मे जबकि युवा वर्ग के मन मे लगातार गाधी के प्रति जहर बोया जा रहा है ऐसे मे आप जैसा बुद्धिजीवी भी अगर शब्दो मे सावधानी नही बरतेगा तो लोग कुछ का कुछ समझ लेगे
-सुनील कुमार

और उसका जवाब

सुनील कुमार जी इसमें बड़ा या छोटा देखना आपकी दृष्टिदोष के सिवाए और कुछ नहीं..।
यदि आप इतिहास से वाकिफ होंगे तो यह भी मालूम होगा कि 1936 में काँग्रेस के भीतर ही सोशलिस्ट गुट गठित हो गया था और इसके प्रेरक सुभाष बाबू और नेताओं में आचार्य नरेन्द्र देव, डा.लोहिया, अशोक मेहता, अच्युत पटवर्द्धन, कमला चट्टोपाध्याय आदि थे।

त्रिपुरी कांग्रेस में ये सब गाँधीजी के प्रत्याशी पट्टाभि सीतारमैय्या के खिलाफ नेताजी सुभाष के पक्ष में खड़े थे। सुभाष बाबू के कांग्रेस छोड़ने बाद यही समूह सोशलिस्ट पार्टी के रूप में स्थापित हुआ..।

विन्ध्य के ज्यादातर छात्र और युवा, कांग्रेस की वजाय सोशलिस्ट से जुड़े..। रीमा राज्य के गाँधीवादी कांग्रेसियों ने ही अँग्रेजों से मिलकर महाराज गुलाब सिंह को देशनिकाला करवाया..। गाँधीजी कभी अतुलनीय नहीं रहे। नेताजी के प्रसंग में उन्हें संदर्भित करना उन्हें छोटा करना नहीं है.. मेरे भाई..।

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