आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत को चुनौती देने वाले महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह नहीं रहे

महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन 14 नवंबर 2019 को पटना के पीएमसीएच में हो गया लेकिन उन्हें निधन के बाद भी सरकारी उपेक्षा का सामना करना पड़ा और एंबुलेंस के इंतजार में काफी देर तक उनका शव वहीं रखा गया।

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महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह

नई दिल्ली : महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन 14 नवंबर 2019 को पटना के पीएमसीएच में हो गया। लेकिन उन्हें निधन के बाद भी सरकारी उपेक्षा का सामना करना पड़ा और एंबुलेंस के इंतजार में काफी देर तक उनका शव वहीं रखा गया। वशिष्ठ नारायण सिंह परिजनों के साथ पटना के कुल्हरिया कांप्लेक्स के पास रहते थे। उनकी तबीयत आज सुबह अचानक खराब हो गई। बताया जा रहा है कि आज सुबह सुबह उनके मुंह से खून निकलने लगा जिसके बाद परिजन उन्हें तत्काल पीएमसीएच लेकर गए जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

परिजनों का कहना हैं उनकी मृत्यु के 2 घंटे तक उनकी लाश अस्पताल के बाहर ही पड़ी रही और पुरे 2 घंटे के बाद एबुंलेंस बुलवाया गया। बता दें वशिष्ठ नारायण सिंह पिछले कई दिनों से बीमार थे। जब वह पीएमसीएच में भर्ती थे तो उनकी तबियत के सिलसिले में बात करने के लिए वहा नेताओं की भीड़ लगी रही। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर केंद्रीय मंत्री तक उन्हें देखने गए थे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनके निधन पर शोक जता चुके हैं।

बता दें वशिष्ठ नारायण सिंह ने महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत को चुनौती दी थी। उनके बारे में यह बात भी काफी मशहूर है कि नासा में अपोलो की लांचिंग से पहले जब 31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए तो कंप्यूटर ठीक होने पर उनका और कंप्यूटर्स का कैलकुलेशन एक जैसा ही रहा था। उनकी ग्रेजुएशन की बात की जाए तो उन्होंने 1969 में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री हासिल की। इसके बाद वह वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर बन गए। वशिष्ठ नारायण ने नासा में भी काम किया, लेकिन वह 1971 में भारत लौट आए।

भारत लौट आने के बाद उन्होंने नौकरी की और वह आईआईटी कानपुर, आईआईटी बंबई और आईएसआई कोलकाता में नौकरी करते थे। 1973 में उनकी शादी वंदना रानी से हो गई। शादी के कुछ समय बाद 1974 में उन्हें मानसिक दौरे आने लगे। 1975 में वह मानसिक बीमारी सिजोफ्रेनिया रोग से पीड़ित हो गए। इस बीमारी के होने की बात सुनते ही उनकी पत्नी ने उनसे तलाक ले लिया। कहा जाता है कि 1976 में इलाज और उनकी सारी जिम्मेदारी लेने को अमेरिका तैयार था, लेकिन परिजनों का कहना है कि सरकार ने उन्हें अमेरिका जाने नहीं दिया और राजनीति के तहत 1976 से 1987 तक रांची के मेंटल हास्पिटल में भर्ती कराकर उनकी प्रतिभा को कुचल दिया गया।

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