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दौड़

अदिति सिंह भदौरिया

मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि जल्दी उठा करो, स्कूल हमेशा समय पर पहुंचना चाहिए । मैंने लगभग खींचते हुए अपनी 6 साल की बेटी को उठाया और साथ ही उसे तैयार करते हुए समय की पाबंदी पर भी बोले जा रही थी । जब उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो मैंने उसे डांटते पूछा तुम सुनती रही हो कि मैं क्या कह रही हूं? उस ने बड़ी मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए कहा, “माँ” आप तो कहती थी कि बचपन के दिन बहुत सुहावने होते हैं, हमने बचपन में यह मस्ती कि वह मस्ती की ऐसी शरारती की, पर माँ मुझे तो लगता है कि बचपन स्कूल और कोचिंग के बीच भागने को कहते हैं । अपनी बात कह कर उसने अपना बैग लिया और स्कूल के लिए निकल गई और मैं बेबसी उसके मासूम सवालों सोच रही थी कि क्या मैं इसे बचपन जीने दूं या इसका भविष्य बनने दूँ…….

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