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कमलनाथ के रेड्डी प्रेम के चलते मोहंती ने गवाया पद : तिवारी

अरविंद तिवारी

कमलनाथ के रेड्डी प्रेम के कारण एसआर मोहंती को अपनी सेवानिवृत्ति के कुछ समय पहले ही मुख्य सचिव पद से बेदखल होना पड़ा। फिर सत्ता गई तो राज्य विद्युत नियामक आयोग का चेयरमैन भी नहीं बन पाए पर नए निजाम में उनकी परेशानी जरूर बढ़ गई है। दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री काल में हुए इंटर कारपोरेट डिपॉजिट मामले की फाइल फिर खुल गयी है और महिला और बाल विकास विभाग मैं ताबड़तोड़ मोबाइल खरीदी के मामले में भी उन्हें जांच के दायरे में लाया जा रहा है।

जब दौर आपदा का हो और स्थितियां ऐसी हो जिनसे निपटना बहुत कठिन हो तब यदि कोई व्यक्ति समन्वयक की भूमिका में आ जाए तो उसकी पूछ परख बढ जाती है। इंदौर के सांसद शंकर लालवानी की स्थिति अभी कुछ ऐसी ही है। स्थानीय स्तर पर वे संघ, भाजपा, जनता और प्रशासन के बीच समन्वयक की भूमिका में है तो सरकार की आंख नाक और कान। चुंकि कैलाश विजयवर्गीय का अपना एक दायरा है, मंत्री तुलसी सिलावट भाजपा के लिए अभी नए नवेले हैं इसका सीधा फायदा लालवानी को मिल रहा है। पार्टी के ही कुछ लोगों जरूर इस बात से चौंके हुए हैं आखिर मुख्यमंत्री दिन में तीन बार लालवानी से ही फीडबैक क्यों लेते हैं ?

बीएम यानी बृजमोहन शर्मा मुख्यमंत्री सचिवालय में किस रास्ते से विराजित हुए यह खोजबीन अभी भी चल रही है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि बारास्ता नरोत्तम मिश्रा बीएम वल्लभ भवन एनेक्सी की पांचवी मंजिल पर पहुंचे। इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि शर्मा और मिश्रा एक दूसरे को खूब निभाते रहे है। कुछ लोग इसमें नरेंद्र सिंह तोमर का योगदान भी बता रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि बीएम को यहां पहुंचाने में सबसे अहम भूमिका एक समय में मुख्यमंत्री सचिवालय के मुख्य कर्ताधर्ता रहे एसके मिश्रा की रही है। पांचवी मंजिल पर शर्मा का वजन कितना रहेगा यह उन को सौपे जाने वाली जिम्मेदारी से तय होगा।

अपने लंबे प्रशासनिक कैरियर में मनु श्रीवास्तव को पहली बार लूप लाइन के पोस्टिंग मिली है और इसका सीधा कारण है 60 करोड़ के मोबाइल खरीदी मामले में उनकी संदिग्ध भूमिका। कांग्रेस सरकार के दौर में अहम भूमिका में रहे मनु उन अफसरों में गिने जाते हैं जो समय के साथ खुद को एडजस्ट करने मे माहिर माने जाते हैं। इस बार भी वैसा ही चल रहा था लेकिन अचानक मोबाइल खरीदी के जिन्न बोतल से बाहर आ गया और जब मामला मुख्य सचिव इकबाल सिंह बेस के सामने पहुंचा तो उन्होंने बिना मुरव्वत के मनु को वल्लभ भवन से बाहर भेजने का निर्णय कर डाला।

इंदौर का नए आईजी का फैसला आखिर क्यों नहीं हो पा रहा है? दरअसल एक अनार और सौ बीमार की स्थिति है। हालात को देखते हुए स्वभाविक पसंद माने जा रहे ए साईं मनोहर के आदेश जारी होते होते रुक गए। डीजीपी विवेक जोहरी की पसंद भी वही है। बारास्ता संघ राकेश गुप्ता के लिए दबाव बना लेकिन उनका कमजोर पक्ष कांग्रेस के राज में भी सबको साधे रखना बना। मुख्यमंत्री के इर्द-गिर्द सक्रिय लोगों की पसंद जयदीप प्रसाद है। संघ की ही एक लॉबी की पसंद एक एडीजी हैं। ऐसे में निर्णय में विलंब तो होना ही है। इस विलंब का फायदा बारास्ता तुलसी सिलावट वर्तमान आईजी विवेक शर्मा भी उठाने में लगे हैं। वैसे इंदौर में हमेशा उसे ही मौका मिलता है जो चर्चा में कम रहता है।

इकबाल सिंह बैंस का मिजाज कभी भी ऐसा नहीं रहा जैसा इस बार दिख रहा। पिछले 20- 25 साल में उन्हें एक से बढ़कर एक पदस्थापना मिली और जब उन्हें ऐसा लगा था कि प्रदेश में स्थितियां उनके अनुकूल नहीं है तो वे प्रतिनियुक्ति पर केंद्र में चले गए थे। यहां उनकी ज्यादा अहमियत महसूस की गई और समय से पहले बुलाकर अहम भूमिका में लाए गए। लेकिन एस.आर. मोहंती के मुख्य सचिव रहते अफसरों की एक लॉबी ने जिस तरह बेस की घेराबंदी करवायी उसने उन्हें रवैया बदलने को मजबूर कर दिया। 50 आईएएस अफसरों की तबादला सूची पर बारीकी से गौर किया जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि इस बार बेस ने उनसे दूरी बनाने वाले किसी को नहीं बख्शा। _।

कमलनाथ जब मुख्यमंत्री थे तब एक लाबी ने उनके और सज्जन सिंह वर्मा के बीच दूरी बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। यह लॉबी कुछ हद तक सफल भी रही। वर्मा जिन्हें मध्यप्रदेश में कमलनाथ का नंबर वन सिपहसालार माना जाता था हालात को देखते हुए चुप रहे। अब जब कमलनाथ मुख्यमंत्री नही है और इस दौर में जो लोग इमानदारी से उनका साथ दे रहे हैं उनमें वर्मा नंबर वन पर है। एक श्यामला हिल्स पर इन दिनों वर्मा और एनपी प्रजापति की जोड़ी रोज देखी जाती है और हर अहम निर्णय में इनकी भागीदारी भी रहती है।

संभागायुक्त आकाश त्रिपाठी कैसे इंदौर से बेदखल हो जाए इसकी कवायद बहुत तेजी से चल रही है। कुछ लोग मुख्य सचिव तो कुछ मुख्यमंत्री को इसके लिए तैयार करने में लगे हैं। मतलब साफ है कि अफसरों और नेताओं के तालमेल से यह शुरूआत हुई है इसे अंजाम पर पहुंचाने का माध्यम एक नेता बने हुए है। कमिश्नर और कलेक्टर के बीच तालमेल ना होने और मेडिकल फ्रंट पर कमिश्नर की कथित विफलता को भी इसी के चलते सुनियोजित तरीके से हवा दी जा रही है। अपने काम से मतलब रखने वाले त्रिपाठी भी हैरान हैं आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और इसके पीछे मकसद क्या है।

राकेश दुबे,विनोद बिरला और गोपाल गोयल को एक समय में इंदौर में संघ की धूरी माना जाता था। इनकी तूती बोलती थी। उसके बाद उपजे समीकरण में पिछले कई वर्षों से यह पार्श्व में चले गए और सेवा कार्य में लगा दिए गए। कोरोना संक्रमण के इस दौर में जब मध्यप्रदेश में भाजपा की सत्ता है और राहत कार्य में स्वयंसेवक संघ अहम भूमिका में हैं यह तीनों फिर बेहद सक्रिय हैं। इनकी सक्रियता को प्रशासनिक अधिकारी भी समझ नहीं पा रहे हैं क्योंकि आदेशात्मक लहजे में होने वाला इनका संवाद उन्हें भी चौंका रहा है। अफसर तो यही मान रहे हैं कि संघ से मिले संकेत के बाद ही यह तिकड़ी सक्रिय हुई है।

अब बात मीडिया की

  • सिंधिया खेमे से जुड़े एक मंत्री से संबंधित खबर के मामले में दैनिक भास्कर के स्टेट एडिटर अवनीश जैन परेशानी बढी हुई है।
  • आईएएस अश्विनी राय के परिजनों से जुड़ा अखबार का प्रोजेक्ट फेल होने के बाद अब सुशील बजाज की अगुवाई में एक आईपीएस अफसर के परिजनों का चैनल जल्दी ही आने की चर्चा है।
  •   प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में समान दखल रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और इंदौर प्रेस क्लब के उपाध्यक्ष प्रदीप जोशी ने गुड इवनिंग अखबार को अलविदा कह दिया है। वह अब दैनिक जागरण के इंदौर ब्यूरो प्रमुख होंगे।
  • जग्गा निकनेम से मशहूर पत्रकार हिदायतुल्ला खान जल्दी ही एक यूट्यूब चैनल लेकर आ रहे हैं। इसके नाम को लेकर से लोगों की राय ले रहे हैं।
  •  भाजपा की सत्ता में वापसी के साथ ही उन सभी भाजपा नेताओं के पास अधिमान्यता कार्ड पहुंचा दिए गए हैं जिनकी अधिमान्यता का नवीनीकरण कमलनाथ सरकार ने रोक दिया था।
  •  वरिष्ठ पत्रकार तेज कुमार सेन ने दैनिक अग्निबाण को अलविदा कह दिया है इसके पहले मेघश्याम अगाशे भी ऐसा निर्णय ले चुके हैं।