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कोढ़ से ज्यादा खाज जानलेवा हो रही

नितेश पाल

2020 का साल जिंदा रहने के लिए है, लाभ-हानि की चिंता न करें। ये कोट सोशल मीडिया पर रतन टाटा के हवाले से चल रहा हैं, हालांकि टाटा ने इसका खंडन कर दिया है। लेकिन ये कोट मध्यप्रदेश के नागरिकों और खासतौर पर मध्यमवर्गीय परिवारों की दास्तां बयां कर रहा है। क्योंकि 2020 वाकई में मध्यवर्गीय परिवारों के लिए धीमी मौत बनता जा रहा है। ओर इसमें सरकारें भी कोई कम कसर नहीं छोड़ रही हैं। कोरोना के चलते पहले से ही काम-धंधे बंद है। लोगों के पास में नई आवक तो जहां रूकी हुई है वहीं जो पैसा है वो भी सीमित ही है। ऐसे में मध्यमवर्गीय परिवारों का मासिक बजट ही बिगडा हुआ है।

प्रदेश के लाखों परिवार एक-एक रुपए को भी खर्चा करने के पहले सोच रहे है। जहां जरूरत है वहां भी पैसे में कटौत्री कर रहा है। लेकिन दूसरी ओर मध्यमवर्गीय परिवारों के इस संकट में उसकी सबसे बड़ी दुश्मन कोई है तो वो है, जहां वोटों से बनी सरकार। जहां मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए घर में राशन की बढ़ी कीमतों ने उनके पूरे बजट को बिगाड़ रखा है, वहीं दूसरी ओर उनके घरों के बिजली के बिलों ने उन्हें बड़ा झटका दे दिया है। लॉकडाउन के पहले उनके घरों में जो बिजली के बिल 100 से लेकर 500 रुपए तक आ रहा था वो अचानक बढ़कर 2500 से 3500 तक पहुंच गया है। घर में आम दिनों में आने वाली आमदनी का 25 फिसदी पैसो बिल की भेंट चढ़ रहा है।

कोरोना संकट में जान बचाने के लिए लोग घरों में दुबके बैठे हैं। पूरे परिवार के घरों में ही रहने ओर गर्मी से बचने के लिए कुलर और पंखों का इस्तेमाल किया जा रहा है जो बिजली के बिलों को भी बढ़ा रहा है। ऐसे में कोरोना से बचने वाले परिवारों के लिए बिजली का बिल किसी बड़ी बीमारी से कम नहीं है। बिजली के बिलों के कम होने की गुंजाइश भी नहीं है, क्योंकि जो बिल भेजे गए हैं उनमें अधिकांश बगैर रीडिंग के हैं और जो खपत बताई गई है उसको चैलेंज भी नहीं किया जा सकता है। लॉकडाउन में बिजली कंपनी ने जो खेल किया है वो गरीबों को मारने से कम नहीं है। बिजली के बिलों के लिए जो आईडी बिलों में आती थी वो भी अब बदल गई है।

बिजली कंपनियों ने जो बढ़े हुए बिल भेजे हैं उसमें ग्राहकों की आईडी ही बदल दी गई है ऐसे में अब क्लेम करने का भी कोई रास्ता नहीं है। ऐसे समय में जब स्कूलों के खुलने की तैयारियां हो रही हैं तब इस बिजली के हाईवोल्टेज झटके ने कई परिवारों को पूरी तरह से निचोड़ कर रख दिया है। स्कूल खुलने का मतलब हर मध्यमवर्गीय परिवार के लिए सालाना होने वाले एक आर्थिक भूकंप से कम नहीं होता है। स्कूल खुलते ही बच्चों की फीस से लेकर उनकी किताबें, ड्रेस के लिए हर परिवार सालभर थोड़े-थोड़े कर पैसे जमा करता है। लेकिन इस बार इसमें से बड़ी राशि कई परिवार जिंदा रहने के लिए पहले ही बर्चा कर चुके हैं ओर अब बिजली के बिल उनकी बची हुई बचत को भी लूट रही है।

जनता को किसी तरह की तकलीफ न हो उनका जीवन दिक्कतों के बगैर चलता रहे इसके लिए हर पांच साल में जनता अपने जनप्रतिनिधि को चुनती है, लेकिन प्रदेश के सबसे बड़े वोट बैंक की कमर तोडऩे वाले इन बिलों पर इन जनप्रतिनिधियों की खामोशी से साफ है कि आम लोगों के दर्द की बात करने वाले इन खास लोगों के लिए आम व्यक्ति उस आम के समान है जिसे चुनावों में चूसा तो जाता है, लेकिन बाद में डस्टबीन में फेंक दिया जाता है। सारे नेता सोशल मीडिया पर अपनी पार्टियों की छवि गढऩे में लगा है। कोई हिंदूत्व तो कोई सद्भावना को खतरे में बता रहा है, कोई देश के ऊंचाईयों पर पहुंचने के नाम पर दंभ भर रहा है तो कोई मजदूरों को लेकर दुबला हुआ जा रहा है, लेकिन अपने घरों में बैठे उस आम मध्यमवर्गीय जिनमें मजदूर, छोटे व्यापारी, अपनी दुकानों के जरिए कईयों को रोजगार देने वाले लोग शामिल हैं, उनकी इस पीडा को समझने की फुर्सत किसी के पास नहीं है।

नेताओं ने जनता को अफसरों के उपर छोड़ दिया है और ये अफसर जनता को गन्ना और खुद को गन्ने की रस की चर्खी समझकर उसे निचोडऩे में लगे हैं। लेकिन जनता नाम का ये गन्ना बूरी तरह से निचोड़े जाने के बाद भी इनके हाथों से नहीं छूट रहा है। क्योंकि इन्हें एक बात मालूम है कि जिन्हें ये गन्ने (जनता) चुनती है वो आते जाते रहते हैं, लेकिन वे शास्वत हैं। और इन कथित जनप्रतिनिधियों को वे जैसा चलाएंगे वे वैसा ही चलेंगे क्योंकि उनके उपर वाले जो हैं, उनकी पसंद और नापसंद को वे जानते है और जनता को निचोड़कर निकले रस से उनका अभिषेक समय-समय पर ये करते रहते हैं।

कोरोना महामारी एक ऐसा कोढ़ बनकर सामने आई है जिसने बर्बादी की नई महागाथा लिख दी, लेकिन उसमें बिजली के बिल के नाम पर मिला ये झटका जनता के लिए किसी खाज से कम नहीं है। जनता कोढ़ के इलाज के लिए तो टकटकी लगाए इंतजार कर रही है लेकिन तब तक ये बिजली के बिल की खाज उसका जीना मुहाल किए हुए हैं। यदि नेताओं को जनता की इस दिक्कत की समझ नहीं आ रही है तो शायद जनता 24 सीटों के चुनावों में ही अपनी खाज अच्छे से मिटा सकती है ये लोग भूल गए हैं।