breaking newsmoretrendingआर्टिकल

राजनीति में यह ‘बिन पेंदी के लो

दिनेश निगम ‘त्यागी’

– राजनीति में कुछ नेता हमेशा ऐसे रहे हैं, जिन्हें ‘बिन पेंदी का लोटा’ की संज्ञा दी जाती है। इनकी न कोई विचारधारा होती, न ही कोई राजनीतिक चरित्र। जहां स्वार्थ पूरा होता दिखा, ‘बिन पेंदी के लोटे’ की तरह लुढ़क जाते हैं। मप्र में भी ऐसे नेताओं की कमी नहीं है। विधानसभा के 6 सदस्यों को इस श्रेणी में गिना जा सकता है। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा-कांग्रेस ने इन्हें टिकट नहीं दिया तो विचारधारा ताक पर रखी और दूसरे दलों से या निर्दलीय तौर पर मैदान में उतर गए। जनता ने इन्हें जिता दिया। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी तो उसे समर्थन दे दिया। इनमें बसपा के संजीव कुशवाह, रामबाई, सपा के राजेश शुक्ला, निर्दलीय प्रदीप जायसवाल, सुरेंद्र सिंह शेरा भैया, विक्रम राणा एवं केदार डाबर शामिल हैं। कमलनाथ सरकार गिरी और भाजपा सरकार बन गई। केदार डाबर को छोड़कर शेष 6 फिर लुढ़के और भाजपा के पाले में चले गए। इनमें से राजेश शुक्ला को सपा नेतृत्व ने पार्टी से बाहर भी कर दिया। प्रदेश में ‘बिन पेंदी के ये लोटे’ चर्चा में हैं। उप चुनावों के बाद कमलनाथ सत्ता में वापसी कर लें तो ये फिर पलटी मार देंगे।

 कमलनाथ का कमाल कान्फिडेंस….

कमलनाथ स्वीकार नहीं करेंगे पर सच यही है कि प्रदेश की सत्ता से कांग्रेस बेदखल हुई तो इसके जवाबदार खुद कमलनाथ हैं। तीन कारण शीशे की तरह साफ हैं। एक, ज्योतिरादित्य के त्याग की बदौलत उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली थी, इसलिए सिंधिया को साध कर रखना पहली जवाबदारी थी। दो, बाहरी समर्थन पर सरकार टिकी थी, मंत्रिमंडल गठन के साथ उन्हें संतुष्ट करना था और तीन पार्टी के वरिष्ठ विधायकों को किनारे कर नए नवेले विधायकों को मंत्री बनाने से परहेज करना था। बिसाहूलाल सिंह ने कहा भी कि यदि सिंधिया और उनके समर्थक साथ न आते तब भी हम 12 विधायक सरकार गिरा देते। यह आरोप तो है ही, कि कमलनाथ के पास कभी मिलने का समय नहीं रहता था। बावजूद इसके कमलनाथ का कान्फिडेंस कमाल का है। उन्हें भरोसा है कि उप चुनावों के बाद वे फिर सत्ता में वापसी करेंगे। इस कान्फिडेंस का नतीजा है कि जब राज्यसभा चुनाव की मतगणना चल रही थी तब कमलनाथ अपने निवास में उप चुनाव की तैयारी को लेकर बैठक कर रहे थे। उनका यह कान्फिडेंस चर्चा में है।

कुनबा बढ़ा तो कलह से नींद हराम….

भाजपा ने कांग्रेस में पैदा असंतोष को हवा देकर अपना कुनबा ही नहीं बढ़ाया, कांग्रेस से सत्ता भी हथिया ली। ऐसी सत्ता का संचालन पहले जैसा आसान नहीं रहा, जैसा 15 साल तक रहा। कुनबा बढ़ने और सत्ता हासिल करने के साथ भाजपा के कलह बढ़ गई। कलह से पार्टी नेतृत्व हलाकान है। अब कांग्रेस ‘जैसे का तैसा’ स्टाइल में भाजपा के अंदर के असंतोष को हवा देकर भुना रही है। नतीजे में कांग्रेस के बागियों का मुकाबला करने के लिए अब तक भाजपा के चार बागी तैयार हो चुके हैं। पहले प्रेमचंद गुड्डू, दूसरे बालेंदु शुक्ल, तीसरे अजब सिंह कुशवाह भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आ चुके हैं। चौधरी राकेश सिंह का आना तय है। भाजपा के ये चारों बागी कांग्रेस के बागियों के मुकाबले होंगे। राजनीति के संत स्वर्गीय कैलाश जोशी के बेटे दीपक जोशी एवं संतोष साहू की बेटी पूर्व विधायक पारुल साहू भी नाराज हैं। ये भाजपा को झटका दे सकते हैं। भाजपा के कुछ और नेता जो कांग्रेस के बागियों के आने से अपना भविष्य असुरक्षित देख रहे हैं, कांग्रेस की रडार में हैं। कलह इस कदर बढ़ रही है कि कब कौन पार्टी छोड़ दे, कोई नहीं बता सकता।

और भारी पड़ सकता था असंतोष….

राज्यसभा चुनाव से साबित हो गया कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान यदि मंत्रिमंडल विस्तार न टालते तो पैदा असांतोष पार्टी पर और भारी पड़ सकता था। विस्तार को टालने में भाजपा को खासी मसक्कत करना पड़ी। ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ आए बागियों को मनाने के लिए केंद्रीय नेतृत्व तक को हस्तक्षेप करना पड़ा। भाजपा बचाव में कोई भी तर्क दे, पर सच यही है कि पार्टी को अपने ही दो विधायकों के वोट नहीं मिले। उनके जो कई बार के विधायक हैं। पहले मंत्री भी रह चुके हैं। उन्हें पता था कि वे इस बार मंत्री नहीं बनने वाले। भाजपा के अंदर मंत्री पद के दावेदार विधायकों की संख्या 50 के आसपास है। इनमें से लगभग एक दर्जन मंत्री ही बनाए जा सकते हैं। मंत्रिमंडल में शेष संख्या कांग्रेस के बागियों एवं बाहर से समर्थन दे रहे सपा, बसपा एवं निर्दलीय विधायकों की रहने वाली है। भाजपा के अंदर मार-काट के हालात हैं। भाजपा नेतृत्व को मालूम है जो मंत्री नहीं बनेंगे, वे असंतुष्ट एवं नाराज होंगे। राज्यसभा चुनाव में इसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ सकता था। इसीलिए कहा जा रहा है कि मंत्रिमंडल विस्तार टाल कर पार्टी ने सही निर्णय लिया था।

अपना घर दुरुस्त नहीं रख सकी भाजपा….

पार्टी अनुशासन एवं चुनाव प्रबंधन के लिए पहचानी जाने वाली भाजपा की पोल राज्यसभा चुनाव में खुल गई। पार्टी के नेता कांग्रेस पर तंज कस रहे थे लेकिन वे अपना ही घर दुरुस्त नहीं रख सके। ऐसा कम देखने को मिलता है जब भाजपा टूटी हो या प्रबंधन के मामले में किसी से कमजोर साबित हुई हो। राज्यसभा चुनाव में यह दिख गया कि वह कमजोर पड़ी और कांग्रेस बाजी मार ले गई। कांग्रेस ने अपना कुनबा बचाया ही नहीं, भाजपा के भी वोट हासिल कर लिए। एक विधायक द्वारा क्रास वोटिंग करने एवं एक का वोट निरस्त होने से भाजपा की किरकिरी हुई। यह हाल तब हुआ जब पार्टी ने राष्ट्रीय नेताओं की मौजूदगी में 3 दिन तक विधायकों को अनुशासन का पाठ पढ़ाया। वोट डालना इस तरह सिखाया गया जैसे प्राइमरी के बच्चों को ककहरा सिखाया जाता है। बावजूद इसके पार्टी के दो विधायक गलती कर बैठे। ये विधायक पहले से असंतुष्टों में भी शुमार थे। ताजा राजनीतिक हालात ऐसे हैं कि इनके खिलाफ कार्रवाई करना तो दूर, भाजपा नेतृत्व नोटिस जारी करने तक की हिम्मत नहीं जुटा सकता। आखिर, सरकार बाहर की वैशाखियों के सहारे जो टिकी है।