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पूर्व केंद्रीय मंत्री अनिल दवे की पुण्यतिथि पर गोविन्द मालू ने ऐसे किया याद

गोविन्द मालू

काम तो सभी करते हैं, लेकिन काम को कैसे सलीके से करना और क्रियान्वयन के अंजाम तक पहुँचाना अनिलजी की विशेषता थी , योजकता के साथ कुशल योजनाकार तो थे ही हर कार्य में संवेदनशीलता और मानवीय गुणों का समावेश कर उसे जीवंतता और प्राण प्रतिष्ठा करने में उनकी कोई सानी नही थी।वे असमय हमसे दूर चले गए, लेकिन एक पध्दति जो बता गए वह “डाक्ट्रिन ऑफ अनिल दवे” के रूप में हमारे मानस पर दर्ज है।

अनिलजी ने जिस पाठशाला से जीवन कर्म और क्रम का श्री गणेश किया वह कार्यकर्ता ही नहीं मनुष्य गढ़ने वाला संगठन है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।
बात 80 के दशक के अंत की है जब राम जन्म भूमि आंदोलन चरम पर था। इंदौर में तब उस शान्त क्लांत युवा को विस्तारक के रूप में काम करते हुए हमने देखा, साथ अनेक अभियानों में और प्रकल्पों में साथ रहे, क्योंकि तब मैं भी उसी व्यवस्था का पुर्जा था।हम काम के साथ हास्य विनोद भी करते तो लगता कि अनिलजी कठिन दौर में भी कितनी सहजता ला देते हैं और काम की थकान अभियान की परिश्रमी और मानसिक मशक्कत की पराकाष्ठा से उपजी उदासी और यूँ कहें कि चिंता और भय को भी किस्से कहानी और प्रेरणा प्रसंग सुनाकर वे हम असहज स्वयंसेवकों को भी सहज कर देते थे।

यह गुण धर्म अंत तक रहा। एक व्यवहारिक व्यक्ति को कैसा होना चाहिए, लचीलेपन के साथ अपने अधिष्ठान को गंतव्य तक ले जाने का माद्दा उनकी विशेषता थी।इंदौर के अर्चना कार्यालय के साथ के बाद 2003 में भाजपा चुनाव प्रबंधन की टीम में इंदौर क्षेत्र की कई जिम्मेदारी मुझ पर उन्होंने बड़े विश्वास से सौपीं। काम को कितने करीने और माइक्रो लेवल पर विचार कर उसकी प्रभावोत्पादकता को बहुगुणित करने की अद्भुत उर्वरा और कृतित्व उनमें था।

अध्ययन शील होने के कारण वे चिंतक बन उभरे, संकट मोचक वे पार्टी के तो थे ही, अपने साथियों के भी थे। काम के साथ उनके रहन सहन के सलीके का मैं कायल था। कई बार मेरे कुर्ते और जैकेट की स्टिचिंग (सिलाई) की खामियां निकालते और कहते मेरे साथ चलना फिर कपड़ा कैसा सिलना चाहिए बटन कैसे लगना यह बताता हूँ।मै भी विनोद में कह देता कि “अनिलजी अपन एक बुटीक खोल लेते हैं”। हर काम में परफेक्शन देखना और परफेक्ट रहना यह उनके जीवन का हिस्सा था।

जब मुझे प्रदेश की मीडिया की जिम्मेदारी के लिए बुलाया जा रहा था और मैं असमंजस में था कि इंदौर छोड़ूँ या मना कर दूँ, ऐसे समय इस असमंजस और दुविधा को उन्होंने दूर कर कुछ ऐसा मन्त्र दिया जिससे मेरा जीवन मंत्रमुग्ध हो गया। यूँ तो मुझसे असीम स्नेह की कई बानगी औऱ प्रसंग है, लेकिन कुछ ऐसे स्थाई अंकित है जिन्हें मैं स्वामी विवेकानंद के बोध वाक्य की तरह सदैव स्मरण करता हूँ। वे अच्छे शिक्षक, सखा और सहयोगी थे। अदम्य साहस उस मासूमियत में छिपा था।

उनका असमय जाना हमारा ही नहीं अब जिस मुकाम पर वे थे उसमें राष्ट्र का अपूरणीय नुकसान है।पर्यावरण को लेकर उनकी प्रतिबद्धता उसमे नवीनतम प्रयोग और सुधार पर उन्होंने जिस दिशा में काम शुरू किया था वह उनकी नदी और पर्यावरण पर लगातार साधना परिश्रम और ईमानदार चिंता का परिणाम था।उनका जाना भारत को प्रदूषण से निजात दिला पर्यावरण दुरुस्त करने के बड़े माद्दा और संकल्प की क्षति है, जिसकी पूर्ति ईश्वर भी नहीं कर पायेगा। वे जँहा गए वँहा से देश के वायुमंडल, जल, धरा और राजनीति के भी पर्यावरण को सुधार करने का बल, साहस और उर्वरा हम सभी साथियों सहयोगियों और हितचिंतकों को प्रदान करते रहें । यही प्रार्थना। उनके व्यक्तित्व से सीखने के लिए ये पंक्तियां काफी हैं।

चलने के लिए पैर ही काफी नहीं हुज़ूर

छालों से मोहब्बत हो,ये हुनर भी सीखिये…।

श्रद्धा की एक अंजुरी हम सबकी