मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में जिले का एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में दुल्हन घोड़ी पर बैठकर बाजे गाजे के साथ दूल्हे पास पहुंची, तो सबको हैरान कर दिया और लोगों न इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया।

दरअसल मध्यप्रदेश के बुरहानपुर में गाडरी परंपरा के अंतर्गत गुजराती समाज की दुल्हन घोड़े पर बैठकर बाजे गाजे के साथ अपने होने वाले दूल्हे को न्यौता देने के लिए पहुंचती है। इस प्राचीन परंपरा के अनुसार दुल्हन अपने होने वाले दूल्हे से कहती है कि कल आप मुझे ब्याहने के लिए आना।

आपको बता दें गुजराती समाज में यह परंपरा काफी वर्षों से चली आ रही है, लेकिन कुछ समय से यह परंपरा विलुप्त हो गई थी जो कि अब फिर से अपना नया स्वरूप लेकर सामने आ रही है। इसी परंपरा के अनुसार देर रात बुरहानपुर के सीलमपुर की रहने वाली रक्षा शाह जो कि पोस्ट ग्रेजुएट है घोड़े पर बैठकर बाजे गाजे के साथ शहर की सड़कों से होते हुए शनवारा में स्थित गुजराती समाज की धर्मशाला में पहुंची। यहां दुल्हन ने अपने होने वाले दूल्हे सनी शाह को न्योता देने के लिए बाजे गाजे के साथ पहुंची. दूल्हा सनी शाह जो कंप्यूटर इंजीनियर हैं।

वहीं दुल्हन रक्षा शाह के चाचा धर्मेंद्र सुगंधी बताते हैं कि गुजराती मोड़ वाणिकी समाज की यह प्राचीन परंपरा है जिसमें शादी के ठीक 1 दिन पहले दुल्हन की बारात निकाली जाती है। दुल्हन घोड़े पर बैठकर अपने होली वाले दूल्हे को शादी का न्योता देने के लिए उसके घर पहुंचती थी। लेकिन पुराने समय में जब मुगलों का राज था तो मुगलों ने यह परंपरा बंद करवा दी गई थी।

मुगलों ने बंद कराई थी प्रथा

जिसके बाद अब मुगलों का कोई आतंक या भय नहीं है तो यह प्राचीन परंपरा फिर से शुरू हो रही है। युवाओं को हमारी प्राचीन संस्कृति और परंपरा से परिचित करने एवं जोड़ने के लिए फिर से समाज द्वारा यह परंपरा शुरू की गई है। इससे समाज में एक संदेश भी जाता है कि लड़का लड़की एक समान हैं। इनमें कोई अंतर नहीं है। अगर लड़का घोड़े पर बैठकर बारात निकाल सकता है तो लड़की क्यों नहीं।

वहीं जब रक्षा शाह की घोड़े पर बैठकर बारात उनके निवास सीलमपुर से निकली तो रक्षा शाह के सहेलियों ने और बारातियों ने भी बरात का खूब आनंद लेते हुए ठुमके लगाए। यह नजारा देख हर कोई थम सा गया और इस नजारे के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिए जो कि अब सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहे हैं। हर कोई इस परंपरा की प्रशंसा करते हुए नहीं थक रहा है।